महायान में समाधि की अवधारणा : शमथ एवं विपश्यना के परिप्रेक्ष्य में

डॉ. रमेशचन्द्र नेगी

(सहा. प्रोफेसर / कार्यकारी प्रधान सम्पादक)

केन्द्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान सारनाथ, वाराणसी

मंगलाचरण :

सर्वातीताद्यबुद्धानां  जनकत्वात्  पितरौ  तथा ।

भक्त्या साधनधर्माश्च वाक्चित्ताभ्यां मुदा नतः ।।[1]

या सर्वज्ञतया  नयत्युपशमं शान्तैषिणः श्रावकान्

या मार्गज्ञतया  जगद्धित्कृतां  लोकार्थसम्पादिका ।

सर्वाकारमिदं  वदन्ति  मुनयो  विश्वं  यया संगता-स्तस्यै श्रावकबोधिसत्त्वगणिनो बुद्धस्य मात्रे नमः ।।[2]

भूमिका :

बौद्ध आचार्यों ने तथागत सम्यक् सम्बुद्ध के उपदेशानुसार ही बाह्य जगत् से आन्तरिक जगत् के सुधार पर ज्यादा बल दिया है। यदि हम आभासित जगत् का सूक्ष्म विवेचन करते हैं, तब वास्तव में 1. संसार एवं 2. निर्वाण की बात सामने आती है। संसार जागतिक आभास का स्थूल रूप है, जिसे शास्त्रों में 1. संवृति कहा गया है और 2. निर्वाण (परमार्थ) इसी का सूक्ष्म रूप है, जिसे सही रूप से सम्यक् साधना के विना नहीं जाना जा सकता।

भोटदेशीय महान् आचार्य गम्पोपा सोद्-नम्स रिन्छेन् (पुण्यरत्न) अपनी मोक्षालंकार (थर्-ग्यन्) नामक सुप्रसिद्ध ग्रन्थ की भूमिका में उपर्युक्त प्रसंग का विवरण निम्न प्रकार से सांगोपांग और बहुत ही सुन्दर रूप में प्रस्तुत करते हैं,

यथा–

 “सामान्यतया समस्त धर्म इन दो वर्गों मे संगृहीत होते हैं–(1) संसार और (2) निर्वाण। इन दोनों के (1) स्वभाव, (2) आकार और (3) लक्षण इस प्रकार हैं। यह जो संसार है, वह स्वभाव से शून्य है, भ्रान्ति उसका आकार है और लक्षण दुःखों का उदय है। यह जो निर्वाण है, वह स्वभाव से शून्य है, समस्त भ्रान्तियों की परिनिवृत्ति उसका आकार है और लक्षण समस्त दुःखों से मुक्ति है।

प्रश्नसंसार में कौन भ्रमित होते हैं?

उत्तरतीनों धातुओं[3] के समस्त प्राणी भ्रमित होते हैं।

प्रश्नकिस आधार में भ्रमित होते हैं?

उत्तरशून्यता[4] में भ्रमित होते हैं।

प्रश्नकिस कारण भ्रमित होते हैं?

उत्तरमहा-अविद्या (मोह = अज्ञान) के कारण भ्रमित होते हैं।

प्रश्नकिस प्रकार भ्रमित होते हैं?

उत्तरछः गतियों[5] (योनियों) के विषयों में आसक्त होकर भ्रमित होते हैं।

प्रश्नकिस दृष्टान्त की तरह भ्रमित होते हैं?

उत्तर–निद्राकाल में स्वप्न की तरह भ्रमित होते हैं।

प्रश्नकब से भ्रमित होते आ रहे हैं?

उत्तरअनादिकाल से भ्रमित होते आ रहे हैं।

प्रश्नभ्रमित होने से क्या हानि है?

उत्तर–(प्राणी) केवल दुखों में ही विचरण करते रहते हैं।

प्रश्नभ्रान्ति ज्ञान में कब परिवर्तित होगी (अर्थात् बदलेगी)?

उत्तर–अनुत्तर बोधि (बुद्धत्व) की प्राप्ति के अनन्तर होगी।

प्रश्नक्या भ्रान्ति का ज्ञानरूप में स्वतः प्रबोध संभव है?

उत्तर–नहीं, संसार अनन्त के लिए प्रसिद्ध है।

 (अगर भ्रान्ति का स्वतः प्रबोध सम्भव होता तो संसार के समस्त प्राणी बुद्धत्व प्राप्त कर चुके होते और संसार अनन्त न रह कर अन्तवान् होता।)

इस प्रकार यह संसार भ्रान्तिमय है, इसमें दुःख की मात्रा अधिक है, दीर्घकालिकता है और स्वतः मुक्ति सम्भव नहीं है। इसलिए अभी से ही अनुत्तर बोधि की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए।”[6]

यह अनुत्तर बोधि अर्थात् महासुख, जिसके लिये संसार के अनन्त सत्त्व अनन्तकाल से अहोरात्र प्रयत्नशील हैं, बिना प्रयास के प्राप्त नहीं हो सकती। इसी बोधि-प्राप्ति की विधि अर्थात् उपाय को बौद्धमत में त्रिशिक्षा, षट् पार-मिता, शून्यता, शमथ, विपश्यना, समता, महामुद्रा और महासम्पन्न आदि नाना नामों से प्रकट किये गये हैं।

इसी प्रसंग में भगवान् तथागत सम्यक् सम्बुद्ध ने सत्त्वों की वेदना के तीन स्वरूप कहे हैं, यथा–

 “तिस्सो इमा, भिक्खवे, वेदना। सुखा वेदना, दुक्खा वेदना, अदुक्खमसुखा वेदना–इमा खो, भिक्खवे, तिस्सो वेदना’ ति ।”[7]

संक्षेप में कहें तो इन वेदनाओं का हमारे सुख-दुःख आदि से बहुत ही गम्भीर सम्बन्ध है, यथा–सुख-वेदना से राग कीउत्पत्ति होती है और ऐसे ही दुःख-वेदना से द्वेष तथा अदुःख-असुख-वेदना से मोह अर्थात् अज्ञान रूपी त्रिविषों की उत्पत्ति होती है, जिनके कारण सम्पूर्ण असंख्य क्लेश सदा सत्त्वों की चित्त-सन्तति में उत्पन्न होते रहते हैं और इस प्रकार सत्त्व सांसारिक दुःखों से छुटकारा नहीं हो पाते।  

वास्तव में विपश्यना साधना इन्हीं तीनों वेदनाओं को सही ढंग से जानते हुए स्वयं को समता अर्थात् शून्यता में स्थापित करते हुये ज्ञान अर्थात् बोधि को प्राप्त करने की विद्या है, जिसके कारण दुःख-समुदय अर्थात् असंख्य क्लेशों का क्रमशः समूल नाश होता है और साधक क्रमिक रूप से स्रोतापत्ति-फल आदि को प्राप्त करता है, जो वास्तव में शान्त है, निर्वाण है और महासुख स्वरूप है। संक्षेप में, वास्तविक सुख को प्राप्त करने की सम्यक् विद्या अथवा उपाय का नाम ही विपश्यना साधना है।  

या क्लेशों को जड़ों से सम्पूर्ण रूप से उखाडने की विद्या का नाम ही विपश्यना विद्या है, जिसे यहाँ विपश्यना साधना के नाम से कहा गया है।

क्योंकि अज्ञान का विपरीत–ज्ञान है तथा अबोधि का विपरीत–बोधि है, यही कारण है कि इस विशिष्ट साधना के बल से उसे प्राप्त करने का प्रयास सभी बौद्ध परम्पराओं के साधक, अपनी-अपनी परम्परा के अनुसार करते आ रहे हैं और उसी के बल से सम्पूर्ण फलों[8] की प्राप्ति भी वर्तमान पर्यन्त साधकों में होती आ रही है, जिससे यह दुःखी संसार वास्तविक रूप से उस सुख से सम्बद्ध हो जाता है, जिसे वास्तविक सुख अर्थात् निर्वाण अथवा महासुख आदि कहा गया है।   

तथागत सम्यक् सम्बुद्ध की सम्पूर्ण शिक्षा जो वास्तव में साधना ही है, को सही ढंग से समझने के लिये प्रथम एक बौद्ध साधक को सर्वप्रथम मार्गक्रम के बारे में सम्यक् रूप से समझने का प्रयास करना चाहिये। इसके बिना साधक नाना मार्गों में भटकता रहता है और तथागत सम्यक् सम्बुद्ध के वास्तविक आशय स्वरूप मार्ग को नहीं जान पाता।

मार्गक्रम का अर्थ है–एक बोधि के मार्ग पर पड़ा साधक किस प्रकार के मार्गों से उत्तरोत्तर आगे बढते हुये वह अपने सम्यक् लक्ष्य संबोधि को प्राप्त करता है–इसकी सम्पूर्ण रूपरेखा।

इस मार्गक्रम की जानकारी के लिये आर्यदेश भारत के महान् आचार्य दीपंकरश्रीज्ञान (अतीश) द्वारा विरचित बोधिपथप्रदीप से अच्छा ग्रन्थ हमें प्राप्त नहीं हो सकता। उसमें मार्गक्रम को तीन भागों में बाँटा गया है, यथा–1. लघुपुरुषमार्ग, 2. मध्यमपुरुषमार्ग तथा 3. उत्तमपुरुषमार्ग

ये मार्गक्रम ऐसे ही हैं, जैसे एक सामान्य व्यक्ति विद्यालय में जाकर प्रथम कक्षा से अध्ययन करते हुये उच्च, उच्चतर तथा उच्चतम कक्षाओं तक पहुँच जाता है। अतः यही कारण है कि वास्तविक साधक के लिये इन मार्गों का उल्लंघन कदापि सम्भव नहीं होता। यह तो वास्तविक रूप से बीज से फल की यात्रा है।

ऐसा कदापि नहीं होता है कि साधक लघुपुरुषमार्ग को प्राप्त न कर सीधे मध्यमपुरुषमार्ग में पहुँच जाये और ऐसे ही मध्यमपुरुषमार्ग को प्राप्त न कर उत्तमपुरुषमार्ग में पहुँच जाये।

इन तीन प्रकार के पुरुषों के लक्षणों को आचार्य अतीश के उपर्युक्त कथित सुप्रसिद्ध ग्रन्थ में निम्न प्रकार से कहा गया है, यथा–

लघुपुरुष का लक्षण :

यस्य   केनाप्युपायेन   संसारसुखमात्रकम् ।

स्वस्यैवार्थाय चाभीष्टं स ज्ञेयः पुरुषोऽधमः ।।

मध्यमपुरुष का लक्षण :

विरतः पापकर्मभ्यो भवसौख्यात् पराङ्मुखः ।

आत्मोपशममात्रार्थी स उक्तो मध्यमः पुमान् ।।

उत्तमपुरुष का लक्षण :

स्वसन्तेर्यथा  दुःखं  दुःखं  सर्वं  हि   सर्वथा ।

अन्यस्य हातुमिच्छेद् य उत्तमः पुरुषस्तु सः ।।[9]

तथागत सम्यक् सम्बुद्ध की शिक्षा का स्वभाव प्रतीत्यसमुत्पाद पर आधारित है और इसी हेतुप्रत्ययवाद के आधार पर ही इस तरह वह मार्गीय पुद्गल शील से समाधि तथा इससे प्रज्ञा को प्राप्त करता हुआ अन्तिम फल बोधि को प्राप्त करता है, जो कि संसार के समस्त सत्त्वों का अन्तिम ध्येय है।

या दूसरे शब्दों में इस प्रकार कहा जा सकता है कि शिक्षाओं का स्वरूप

भी स्वयं में स्थूल से सूक्ष्मता की ओर जाने वाली है। अतः बोधिसत्त्वमार्ग के द्वारा जब बोधिसत्त्व बोधि (बुद्धत्व) की ओर आगे बढता है, तब वह सर्वप्रथम दानपारमिता का अभ्यास करता है और ऐसे ही क्रमशः शील, क्षान्ति, वीर्य, समाधि तथा अन्त में प्रज्ञापारमिता का सम्पूर्ण-अभ्यास करता हुआ महासुख रूपी अन्तिम लक्ष्य को प्राप्त करता है।

विपश्यना साधना इसी अन्तिम फल को प्राप्त करने का वास्तविक उपाय है, जिसके प्रयोग से बुद्ध से लेकर वर्तमान पर्यन्त के समस्त बुद्धानुयायी लोग इन सांसारिक दुःखों से विमुक्त होकर अन्तिम फल को प्राप्त हुये हैं।

या दूसरे शब्दों में उपर्युक्त गम्पोपा के वचनानुसार संसार से निर्वाण तक की यात्रा करने का नाम ही विपश्यना है, जिसके द्वारा सांसारिक सुख सहित लोकातीत सुखों की प्राप्ति इस साधना के द्वारा बहुत ही सरल तरीके से सम्भव हो पाती है।

अतः सर्वप्रथम साधना के मूल विषय को स्पष्ट करने से पहले उसके क्या लाभ है? इसको समझेंगे तो निश्चित रूप से साधना में आसानी से संलग्न हो जाया जा सकता है। लाभ को देखकर कार्य में जुटना सांसारिक लक्षण है।  

साधना की अनुशंसा :

तो सर्वप्रथम साधना की अनुशंसा को यहाँ सर्वप्रथम स्पष्ट किया जा रहा है। भारतीय आचार्य अतीश के गुरु बोधिभद्र ने समाधि-सम्भार-परिवर्त में समाधि के गुण अर्थात् अनुशंसा का वर्णन निम्न शब्दों में किया है, यथा–

 “इस प्रकार विपक्षों का परित्याग कर समाधि के गुणों का स्मरण करे। यहाँ इसके गुण दो प्रकार के हैं–

  1. दृष्टधर्मवेदनीय (इसी जन्म में प्राप्त होने वाले) तथा इसके

2. अतिरिक्त (अर्थात् अन्य जन्मों में प्राप्त होने वाले फल)।

वह कैसे?

1. (दृष्टधर्मवेदनीय गुण)

शरीर का सुखपूर्वक रहना, वाणी का सुखपूर्वक होना, चित्त की सुखपूर्वक स्थिति, धर्मपालकों का प्रसन्न होना, उसको प्राप्त मनुष्य-काय की सार्थकता, शास्ता, माता-पिता और गुरु के प्रति कृतज्ञ होना, मनुष्येतर से हानि न होना, रोगों की कमी, दीर्घायु, मरते समय पश्चात्ताप नहीं होना, विद्वानों के द्वारा प्रशंसित होना, खान, पान, गृह, शय्या, रोग की औषधि और वस्त्रों की सरलतापूर्वक प्राप्ति तथा क्लेश और (अकुशल) कर्म का नाश, ये प्रथम के गुण हैं।”[10]  

“2. ( अतिरिक्त अर्थात् द्वितीय गुण)

जहाँ इच्छित (यथेच्छ) बुद्ध क्षेत्र में जन्म, तीनों दुर्गतियों का प्रहाण

(नाश), शेष अक्षणों का प्रहाण, स्त्री रूप में जन्म की अप्राप्ति, तीक्ष्ण-इन्द्रियत्व तथा त्रिरत्न से अवियोग होता है, वहाँ पर भी समाधि का आनन्द तथा अभिसम्बोधि की प्राप्ति होती है। ये द्वितीय गुण है।”[11]

विपक्ष एवं समाध्यंग :

आचार्य बोधिभद्र ने समाधि के गुणों के वर्णन से पूर्व समाधि के विपक्षों के परित्याग करने की बात कही है। समाधि की उत्पत्ति में जो बातें बाधाओं के रूप में आती हैं, वही विपक्ष हैं और उनका परित्याग सम्यक् समाधि के लिये अनिवार्य मानी गई हैं। समाध्यंगों की विपरीत-अवस्था ही विपक्ष होती हैं।

समाध्यंग एवं उनके विपक्ष का वर्णन आचार्य दीपंकरश्रीज्ञान ने बहुत ही संक्षेप एवं सरल भाषा में अपने द्वारा लिखित समाधि-सम्भार-परवर्त नामक ग्रन्थ में किया है, यथा–

 “शील की सम्पन्नता, भोगों में निरपेक्षता, क्षान्ति, दृढ निश्चय, जन-संसर्ग का परित्याग, काय-वाक्-चित्त में सम्प्रजन्यता, बुद्ध प्रतिमा में अवलम्बित स्मृति के साथ सम्यक् कायानुस्मृति, जिस समय जो कार्य करना उसमें दृढ अनुस्मृति, पञ्चावरणों का प्रहाण, भोजन मात्रा का ज्ञान, उचित आचरण, सभी (प्रकार के) लोकधर्म के प्रति चित्त में सदा उपेक्षाभाव और (उपभोग्य) सामग्रियों की अल्पता–ये (सब) समाधि के अंग हैं।

 (इनके) विपरीतावस्था विपक्ष (कहलाती) हैं।”[12]

करुणा एवं बोधिचित्त :

समाधि के अभ्यास के लिये सर्वप्रथम इस परम्परा में करुणामूलक बोधि-

चित्त की भावना अनिवार्य है। आचार्य कमलशील द्वारा प्रणीत प्रथम भावना-क्रम के प्रारम्भ में ही इस बात को आर्यधर्मसंगीतिसूत्र आदि का उद्धरण देकर स्पष्ट किया गया है, यथा–

 “बुद्ध के अशेष धर्म-हेतुओं का मूल करुणा ही है, ऐसा जानकर सर्वप्रथम उसी की भावना करनी चाहिये। जैसा कि आर्यधर्मसंगीतिसूत्र में कहा गया है–तब बोधिसत्त्व, महासत्त्व आर्य-अवलोकितेश्वर ने भगवान् बुद्ध से यह कहा-भगवन्, बोधिसत्त्व को अनेक धर्मों की शिक्षा नहीं लेनी चाहिये। भगवन्, बोधिसत्त्व द्वारा एक ही धर्म को अच्छी तरह से आराधित और अच्छी तरह से प्रतिविद्ध (ज्ञात) करना चाहिये। (इससे) सभी बुद्ध-धर्म (उसके) करतल  पर विद्यमान हो जाते हैं।

वह एक धर्म कौन है?

वह है–महाकरुणा

भगवन्, महाकरुणा से सभी बुद्ध-धर्म बोधिसत्त्वों के करतल पर स्थित हो जाते हैं। भगवन्, जैसे चक्रवर्ती राजा का चक्ररत्न जहाँ जाता है, वहाँ (उसका) समस्त बलकाय (सेना समूह) जाता है। भगवन्, उसी तरह जहाँ बोधिसत्त्व की करुणा जाती है, वहाँ सभी बुद्ध-धर्म चले जाते हैं। भगवन्, जैसे जीविते-न्द्रिय के रहने पर अन्य इन्द्रियों की प्रवृत्ति होती है, भगवन्, उसी तरह महाकरुणा के होने पर बोधिसत्त्वों के अन्य धर्मों की भी प्रवृत्ति होती है।”[13]

अतः आचार्य अतीश ने भी समाधि-सम्भार-परिवर्त के प्रथम पाद में ही इस बात को बहुत ही स्पष्ट तौर पर कहा है, यथा–

 “प्रथमतया करुणा के बल से उत्पन्न संबोधिचित्त को दृढ करें। भव (सांसारिक) भोगसुखों में निर्लिप्त तथा परिग्रह से पराङ्मुख हों।

श्रद्धा आदि धन से सम्पन्न होकर गुरु को बुद्ध के समान समझें। उन (श्रद्धेय

गुरु) के द्वारा उपदिष्ट समयाचार (अर्थात् विशेष आचरण संहिता) के

परिपालन करने में (सदा) उद्यत रहें।”[14]

महायान शरणगमन एवं बोधिचित्तोत्पाद :

समाधि के लिये करुणापूर्वक सारे कृत्य बोधिसत्त्वों को इष्ट है। इसी करुणा से प्रेरित होकर एक बोधिसत्त्व अहोरात्र कम से कम तीन बार शरणगमन एवं बोधिचित्तोत्पाद में संलग्न होता है, यथा–

बुद्धं  च  धर्मञ्च  च गणोत्तमं च

यावद्धि बोधिं शरणं गतोऽस्मि ।

दानादि-कृत्यैश्च   कृतैर्मयैभिः

बुद्धो   भवेयं   जगतो   हिताय ।।[15]

शमथ अथवा समाधि :

शरणगमनपूर्वक बोधिचित्तोत्पाद सहित शीलों का सम्पूर्णतया पालन करते हुये समाधि अर्थात् शमथ के अभ्यास में लग जाना चाहिये।

समाधि के अभ्यास से ही धर्मपथ पर सम्यक् रूप से आगे बढा जा सकता है, क्योंकि 37 बोधिपक्षीय धर्मों का प्रारम्भ चार समृत्युपस्थान से ही होता है। इनके विना आगे के धर्म सम्यक्तया प्राप्त नहीं हो सकते। सम्पूर्ण गुण समाधि के बल पर ही उत्पन्न होते हैं। अतः परमपावन दलाई लामा जी बालमतिनयनोन्मीलक सुभाषित नामक ग्रन्थ में इस समाधि के प्रसंग में ऐसा कहते हैं, यथा–

 “अपनी चित्त सन्तति में सर्वप्रथम शमथ उत्पन्न करना चाहिये। और इसके बाद विपश्यना उत्पन्न करनी चाहिये। इसका कारण यह है कि श्रावक, प्रत्येकबुद्ध एवं बोधिसत्त्व इन तीनों यानों में जितने भी गुण कहे गये हैं, वे सब मूलशमथ और मूलविपश्यना भावना के फल हैं, अथवा उपचार शमथ और उपचार-विपश्यना भावना के फल हैं।”[16]

वास्तव में मूल साधना को तो गुरुमुख से ही जाना जा सकता है, किन्तु यहाँ परिचय के रूप में शमथ एवं विपश्यना के विषय को किञ्चिद् स्पष्ट करने प्रयास किया जा रहा है।

शमथ, समाधि, आनापान तथा एकाग्रता आदि नाम पर्याय हैं। चित्त की शम (शान्त) अवस्था में स्थापन शमथ कहलाता है। या बाह्य विषयों की ओर जाने वाले विक्षिप्त चित्तों को स्वयं में, भीतर की ओर मोड़ना या उसमें स्थित होना शमथ कहलाता है।

समाधि का अर्थ स्वमूल में चित्त का स्थापन है।

आनापान आलम्बनवश नामकरण किया गया है। सांस को आलम्बन में स्थापित कर चित्त-एकाग्र करने की साधना का नाम ही आनापान साधना कहलाता है।

एकाग्रता शमथ के वास्तविक स्वरूप का आठवाँ क्षण है। या इसे वास्तविक शमथ भी कह सकते हैं, क्योंकि कुशलचित्त की एकाग्रता को ही शमथ कहा गया है। इसी को आधार कर किन्हीं परम्पराओं में एकाग्रता–यह नामकरण बहुत ही प्रचलित है।

शमथ के विषय में आचार्य कमलशील ने भावनाक्रम में प्रज्ञापारमिता का उद्धरण देते हुए उसकी व्याख्या की है, यथा–

 “जब चित्त उसी आलम्बन में बिना प्रयत्न के जब तक चाहे तब तक प्रवृत्त होने लगे, तब शमथ निष्पन्न हो गया–ऐसे जानना चाहिये। यह सभी शमथों का सामान्य लक्षण है, क्योंकि शमथ का स्वभाव चित्त की एकाग्रता मात्र है। शमथ का आलम्बन तो अनियत ही होता है। शमथ के इस मार्ग का भगवान् ने प्रज्ञापारमिता आदि सूत्रों में निर्देश किया है, जैसा कि–“उस (आलम्बन) में चित्त को 1. स्थापित करता है, 2. संस्थापित करता है, 3. अवस्थापित करता है, 4. उपस्थापित करता है, 5. दमन करता है, 6. शान्त करता है, 7. उपशान्त करता है, 8. एकाग्र करता है, 9. समाहित करता है”–इन नौ पदों द्वारा कहा गया है।”[17]

“वहाँ 1. स्थापयति का तात्पर्य है–आलम्बन में चित्त का बाँधता है। 2, संस्थापयति का अर्थ है–उसी आलम्बन में चित्त को धारावाहिक रूप में प्रवृत्त करता है। 3. अवस्थापयति का तात्पर्य है–विक्षेप को जानकर उसका परिहार करता है। 4. उपस्थापयति का अर्थ है–विक्षेप का परिहार करके पुनः उसी आलम्बन में आगे-आगे (चित्त) को स्थापित करता है। 5. दमयति का तात्पर्य है–(आलम्बन) में रति (रुचि) को उत्पन्न करता है। 6. शमयति का तात्पर्य है–विक्षेप में दोष देखकर अरति को उपशान्त करता है। 7. व्युपशमयति का तात्पर्य है–उत्थित स्त्यान-मिद्ध आदि (दोषों) को उपशान्त करता है। 8. एकोतीकरोति का तात्पर्य है–आलम्बन में (चित्त को) विना प्रयत्न के प्रवृत्त होते रहने के लिये प्रयास करता है। 9. समादधति का तात्पर्य है–समता प्राप्त चित्त की उपेक्षा करता है, अर्थात् समन्वाहरण करता है।”[18]

बोधिसत्त्वभूमि के ध्याननिर्देश पटल में कहा गया है–“यह जो कुशल चित्त की एकाग्र स्थिति है, वह ध्यान का स्वभाव है।”[19]

गम्पोपा ने ध्यान की परिभाषा इस प्रकार कहा है, यथा–शमथ पक्षीय कुशल चित्त की अन्तर्मुख एकाग्रता।

आचार्य शान्तिदेव ने बोधिचर्यावतार में शमथ एवं विपश्यना के विषय को निम्नप्रकार से प्रतिपादित किया है, यथा–

शमथेन विपश्यनासुयुक्तः कुरुते क्लेशविनाशमित्यवेत्य ।

शमथः  प्रथमं गवेषणीयः स च लोके निरपेक्षयाभिरत्या ।।[20]

इस प्रसंग में भी लोकेनिरपेक्षयाभिरत्या अर्थात् लोक के प्रति निरपेक्ष भाव में अभिरति या रुचि उत्पन्न कर–इसका वास्तविक अर्थ कुशल चित्त की एकाग्रता ही है। यहाँ पर लोक का अर्थ काय है और काय में उत्पन्न जो भी सुख-दुःख आदि वेदनायें हैं, उनके प्रति निरपेक्ष भाव अर्थात् समता चित्त उत्पन्न करने की बात आचार्य जी ने की है। साथ ही शमथ एवं विपश्यना की सुयुक्त अवस्था अर्थात् युगनद्ध अवस्था को क्लेश के विनाश का सही कारण माना है, जो समस्त बौद्ध सम्प्रदायों में समान रूप से प्रचलित है।

अन्त में इस प्रकार के समाधि के छह दोष हैं और इनके आठ प्रतिपक्ष शास्त्रों में आये हैं। यहाँ पर भावनाक्रम का उद्धरण दिया जा रहा है, जो वास्तव में बहुत ही स्पष्ट एवं समझने योग्य है, यथा–

 “संक्षेप में सभी (प्रकार की) समाधियों के छह दोष होते हैं–1. कोसीद्य, 2. आलम्बन का सम्प्रमोष (विस्मृति), 3. लय, 4. औद्धत्य, 5. अनाभोग और 6. आभोग।

इनके प्रतिपक्ष के (रूप में) आठ प्रहाण संस्कारों की भावना करनी चाहिये। वे (इस प्रकार) हैं–1. श्रद्धा, 2. छन्द, 3. व्यायाम, 4. प्रश्रब्धि, 5. स्मृति, 6. सम्प्रजन्य, 7. चेतना और 8. उपेक्षा।

उन (आठ) में प्रथम चार कौसीद्य के प्रतिपक्ष हैं। …आलम्बन के सम्प्रमोष (भूल जाने) का प्रतिपक्ष स्मृति है। सम्प्रजन्य लय एवं औद्धत्य का प्रतिपक्ष है, क्योंकि उस (सम्प्रजन्य) के द्वारा लय और औद्धत्य का सम्यग् ठीक-ठीक परिज्ञान होता है। लय और औद्धत्य का प्रशमन न होने के काल में अनाभोग (प्रयत्न का अभाव) एक दोष है। उसके प्रतिपक्ष (के रूप में) चेतना की भावना करनी चाहिये। लय और औद्धत्य का प्रशमन हो जाने पर जब चित्त प्रशमवाही (अर्थात् शान्त रूप से प्रवृत्त) हो जाता है, तब आभोग (लय और औद्धत्य के प्रहाण के लिये प्रयत्न) एक दोष है, उस (आभोग दोष) के प्रतिपक्ष (के रूप) में उपेक्षा की भावना करनी चाहिये। इन आठ प्रहाण-संस्कारों से समन्वागत समाधि अत्यन्त कर्मण्य होती है और ऋद्धि आदि गुणों का निष्पादन करती है।”[21]

विपश्यना तो यथाभूतज्ञानदर्शन को कहा जाता है, जो वस्तुओं का वास्तविक स्वरूप है। यही शून्यता है और इसी पद की प्राप्ति पर बोधि सम्पूर्ण होती है। अन्त में, समाधि और साधना ही प्रमुख है, जिसका बहुत संक्षेप में ऊपर चर्चा की गई है। चन्द्रप्रदीपसूत्र का यह अंश साधकों को बहुत ही प्रेरित करता है, अतः इसका स्मरण मोक्षभागीय साधकों को सदा अपने मन में रखना चाहिये, यथा–

“अन्नेहि   पानेहि   च   चीवरेहि   पुष्पेहि   गन्धेहि   विलेपनेहि ।

नोपस्थिता भोन्ति नरोत्तमा जिना यथ प्रव्रजित्वा चर्याण धर्मम् ।।5.10।।

यश्चैव बोधिं प्रतिकाङ्क्षमाणः सत्त्वार्थ निर्विण्णु कुसंस्कृतातः ।

रण्यामुखः  सप्तपदानि  प्रक्रमे अयं  ततः  पुण्यविशिष्ट  भोति ।।5.11।।

खाद्य, पेय, वस्त्र, पुष्प, धूप, माला

आदि के द्वारा बुद्ध के उपासना की

अपेक्षा जो बोधि की कामना करके

कलुषित संस्कृत धर्मों से विरक्त हो

सत्त्वों के हित-सुख के लिय अरण्य में

वास करने के विचार से सात पग भी

बढाता है, वह उससे कही अधिक

विशिष्ट पुण्य का अर्जन करता है।।”[22]

।। भवतु सर्वमङ्गलम् ।।



[1].   अतीशविरचिता एकादशग्रन्थाः (महायानपथसाधनसङ्ग्रहाः); श्लोकसं0–1 །འདས་དང་ད་ལྟར་བདེ་གཤེགས་ཀུན། །སྐྱེད་པའི་ཡབ་དང་ཡུམ་གྱུར་པ། །སྒྲུབ་པའི་ཆོས་ལ་རབ་གུས་ཤིང། །ངག་ཡིད་དང་བས་ཕྱག་འཚལ་ལོ། །ཤོག ༢༣

[2].   अभिसमयालंकार 1.1

[3].   1. कामधातु, 2. रूपधातु और 3. अरूपधातु।

[4].   शून्यता = हेतुप्रत्ययवाद = कार्यकारणतावाद = कर्मफलवाद = प्रतीत्यसमुत्पाद

[5].   1. मनुष्यगति, 2. देवगति, 3. असुरगति, 4. नरकगति, 5. प्रेतगति एवं 6. तिर्यक्गति

[6].   सद्धर्मचिन्तामणिमोक्षरत्नालंकार,पृष्ठ–1-2

[7].   धम्मगीतं, पृ0–101, सङ्गहकारो–सत्य नारायण गोयन्का

[8].   1. स्रोतापत्ति, 2. सकृदागामी और 3. अनागामी एवं 4. अर्हत्फल

[9].   बोधिपथप्रदीप), (द्वितीय संस्करण); 3–5; पृ0 3–5

[10].   समाधिसम्भार-परिवर्त, पृ0–118; प्रकाशक–केन्द्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान, सारनाथ, वाराणसी।द्वितीय संस्करण 2004 ई.;་ དེ་ལྟར་མི་མཐུན་པའི་ཕྱོགས་སྤང་ནས་ཏིང་ངེ་འཛིན་གྱི་ཡོན་ཏན་དྲན་པར་བྱ་སྟེ། དེ་ལ་འདིར་ཡོན་ཏན་ནི་གཉིས་ཏེ། མཐོང་བའི་ཆོས་ཉམས་སུ་མྱོང་བར་འགྱུར་བ་དང་། དེ་ལས་གཞན་པའོ། །ཇི་ལྟར་ཞེ་ན། ལུས་བདེ་བར་གནས་པ་དང་། ངག་བདེ་བར་གནས་པ་དང་། སེམས་བདེ་བར་གནས་པ་དང་། ཆོས་སྐྱོང་བ་རྣམས་དགའ་བ་དང་། དེའི་མི་ལུས་འཐོབ་པ་དོན་ཡོད་པ་དང་། སྟོན་པ་དང་། ཕ་མ་དང་། བླ་མའི་དྲིན་བསབ་པ་དང་། མི་མ་ཡིན་པས་མི་ཚུགས་པ་དང་། ནད་ཉུང་བར་འགྱུར་བ་དང་། ཚེ་རིང་བར་འགྱུར་བ་དང་། འཆི་བའི་དུས་སུ་འགྱོད་པ་མེད་པ་དང་། མཁས་པ་རྣམས་ཀྱི་བསྔགས་པ་དང་། བཟའ་བ་དང་། བཏུང་བ་དང་། གནས་མལ་དང་། ནད་ཀྱི་རྐྱེན་རྩི་དང་གོས་རྣམས་བདེ་བླག་ཏུ་རྙེད་པ་དང་། ཉོན་མོངས་པ་དང་ལས་ལ་གནོད་པར་བྱེད་པ་སྟེ། འདི་དག་ནི་དང་པོའི་ཡོན་ཏན་ནོ། །

[11].   वही; पृ0–118; གང་དུ་འདོད་པའི་སངས་རྒྱས་ཀྱི་ཞིང་དུ་སྐྱེད་པ་དང་། ངག་སོང་གསུམ་སྤངས་པ་དང་། མི་ཁོམ་པའི་ལྷག་མ་སྤངས་པ་དང་། བུད་མེད་དུ་མི་སྐྱེ་བ་དང་། དབང་པོ་རྣོ་བ་དང་། དཀོན་མཆོག་གསུམ་དང་བྲལ་བར་མི་འགྱུར་བ་དང་། དེར་ཡང་ཏིང་ངེ་འཛིན་ལ་དགའ་བ་དང་། མངོན་པར་རྫོགས་པར་བྱང་ཆུབ་པར་འགྱུར་བ་སྟེ། འདི་ནི་ཡོན་ཏན་གཉིས་པའོ། །ཤོག ༦༠

[12]. अतीशविरचिता एकादशग्रन्थाः (समाधि-सम्भार-परिवर्त) ; पृ0–166

[13]. भावनाक्रमः; पृ0–275

[14]. अतीशविरचिता एकादशग्रन्थाः (समाधि-सम्भार-परिवर्त); पृ0–165

[15]. वही (बोधिसत्त्वादिकर्मिक-मार्गावतार-देशना); पृ0–82

[16]. बौद्धसिद्धान्तसार; पृ0–46; द्वितीय संस्करण (सन् 1997 ई.)

[17]. भावनाक्रमः; पृ0–292

[18]. वही; पृ0–292

[19]. कुशलं चित्तैकाग्र्यञ्चित्तस्थिति।; बोधिसत्त्वभूमि; पृ0–143

[20]. बोधिचर्यावतार; 9.70

[21]. भावनाक्रमः; पृ0–293

[22]. सद्धर्मचिन्तामणिमोक्षरत्नालंकार; पृ0–219

Comments

One response to “महायान में समाधि की अवधारणा : शमथ एवं विपश्यना के परिप्रेक्ष्य में”

  1. रमेश चन्द्र नेगी Avatar
    रमेश चन्द्र नेगी

    सद्धर्म का सार विपश्यना ही है । शील, समाधि एवं प्रज्ञा का दैनिक जीवन में सही आचरण ही सम्यक् सुख का मूल है । जीवन का सही उपयोग भी यही है । निर्वाण की प्राप्ति विपश्यना के विना सम्भव नहीं है । अभ्युदय एवं निःश्रेयस् की प्राप्ति विपश्यना पर ही निर्भर करती है । अतः विपश्यना साधना एक मनुष्य के लिए अनिवार्य है । जीवन दुर्लभ है और अनित्य भी है, इसका सदा ध्यान रखें । भवतु सब्ब मंगलं।।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *