डॉ. रमेशचन्द्र नेगी (सहा. प्रोफेसर)
केन्द्रीय तिब्बती अध्ययन विश्वविद्यालय सारनाथ, वाराणसी
“सर्वदुर्गतितो हीनं सर्वावरणवर्जितम् ।
बोधिचित्तं नमस्यामि सम्बुद्धपददायकम् ।।”[1]
“सभी दुर्गतियों से रहित और सभी आवरणों से मुक्त सम्बुद्ध-पद के दाता बोधिचित्त को प्रणाम करता हूँ।”[2]
“बुद्धं च धर्मंञ्च च गणोत्तमं च
यावद्धि बोधिं शरणं गतोऽस्मि ।
दानादि-कृत्यैश्च कृतैर्मयैभिः
बुद्धो भवेयं जगतो हिताय ।।”[3]
“बुद्ध, धर्म और गण में श्रेष्ठ (त्रिरत्न की मैं) यावद् बोधि(-मण्डावगम) पर्यन्त शरण में जाता हूँ। मेरे द्वारा किये गये इन दान आदि (पुण्यों) से जगत् के हित हेतु (मेरा) बुद्धत्व सिद्ध हो।”[4]
संसार में समस्त प्राणी सुख को चाहते हैं और दुःख को नहीं चाहते। इसके लिए सभी सत्त्व अपनी योग्यतानुसार सदा प्रयत्न करते रहते हैं। वे थोड़ा बहुत सांसारिक सुखों को प्राप्त कर भी लेते हैं, किन्तु वास्तविक सुखों से वे कोसों दूर रहते हैं। वास्तविक (असली) सुख तभी प्राप्त हो सकता है, जब आप उसे प्राप्त करने के जो उपाय हैं, उससे अवगत हों। ये उपाय शास्त्रों में भूमि एवं मार्ग आदि नामों से जाने जाते हैं।
आज इस विश्व में बहुत प्रकार के धर्म-सम्प्रदाय हैं, ऐसे ही प्राचीन काल में भी नाना सम्प्रदायों के अस्तित्व का बोध इतिहास से होता है। सभी धर्म-सम्प्रदाय अपने अनुयायियों को सुखों की प्राप्ति की ही बात करते हैं। लेकिन इतिहास साक्षी (गवाह) है कि इस धरती पर धर्म के नाम पर जितना रक्त बहा है, उतना रक्त किसी अन्य प्रकार से शायद ही बहा हो। अतः धर्म के नाम पर भी यदि उनके अनुयायियों को सुख की सही उपलब्धि नहीं हो, तब एक वास्तविक साधक के लिए निश्चित रूप से इन धर्मों के बारे में परीक्षा करना अनिवार्य हो जाता है।
तथागत शाक्यमुनि सम्यक् सम्बुद्ध द्वारा प्रवर्तित धर्म आज बौद्धधर्म, सद्धर्म आदि नामों से इस विश्व में प्रचलित है। इस 21वीं शती में यदि कोई धर्म विज्ञान के साथ कदम से कदम मिलाकर चल सकता है, तो वह धर्म बौद्धधर्म ही है। इस बात को आईन्सटीन आदि विश्व के कई महान् वैज्ञानिकों ने भी स्वीकार किया है। यह धर्म आज से 2500 वर्ष पूर्व भारत में जन्मा तथा बाद में यह सम्पूर्ण एशिया में फैल गया। यहाँ पर इस संक्षिप्त निबन्ध में तत्सम्बन्धित सद्धर्म के दो मुख्य बिन्दुओं, जो 1. शरणगमन एवं 2. बोधिचित्त के नाम से जाने जाते हैं, इन दोनों विषयों के बारे में संक्षिप्त में वर्णन किया जायेगा।
प्रथम विषय शरणगमन, परम (वास्तविक) सुख को प्राप्त करने की इच्छा वाले साधक के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। 1. बुद्ध, 2. धर्म और 3. संघ–त्रिरत्न के नाम से जाने जाते हैं। बुद्ध का स्वरूप धर्मकाय है। दूसरे शब्दों में बुद्ध वे हैं, जिन्होंने समस्त आवरणों का त्याग कर दिया है और समस्त गुणों में पारंगत हो गये हैं। समस्त अच्छे गुण धर्म के नाम से भी जाने जाते हैं और संघ का सामान्य अर्थ बुद्ध के ऐसे अनुयायी, जो शिष्यों को धर्म सिखा सकें। इसीलिए बुद्ध को वैद्य, धर्म को ओषध (दवा) तथा संघ को उपचार के समय सहायक के रूप में भी कहा गया है।
एक बौद्ध के लिए शरणगमन बौद्ध होने और नहीं होने की सीमारेखा भी है। एक व्यक्ति सही रूप से बौद्ध है या नहीं इसकी सीमारेखा के रूप में इन्हीं तीन रत्नों को कहा गया है। यदि कोई व्यक्ति इन तीन रत्नों को अच्छी तरह जानते हुए इनकी शरण में जाता है, वही वास्तविक रूप से बौद्ध कहलाता है।
अतः एक बौद्ध के लिए शरणगमनसंवर अनिवार्य है।
जैसे कि सर्वविदित है, बौद्ध–1. थेरवाद तथा 2. महायान के रूप में द्विविध हैं। अतः यह जानना भी बहुत ही आवश्यक है कि वास्तविक रूप से थेरवाद एवं महायान में भेद क्या है?
महायानी ग्रन्थों में थेरवाद तथा महायान के भेद को स्पष्ट करने के लिए बोधिचित्त के किसी व्यक्ति में होने और नहीं होने को कहा गया है। इसका अर्थ यह हुआ कि यदि किसी व्यक्ति ने महायानी शरणगमन सहित बोधिचित्त को ग्रहण किया है वह महायानी कहलाता है।
अर्थात् स्वयं को महायानी कहलाने के लिए स्वयं में बोधिचित्त का होना अनिवार्य है। दूसरे शब्दों में महायानी होने की सीमारेखा बोधिचित्त ही है। अतः डिगुङ् क्योब्-पा रिन्छेन-पल् का कहना है कि जैसे बौद्ध होने की सीमारेखा शरणगमन है, वैसे ही महायानी होने की सीमारेखा बोधिचित्त है।
उपर्युक्त बातों से यह बात स्पष्ट होती है कि थेरवादी शरणगमन और महायानी शरणगमन में किञ्चिद् भेद है। एक थेरवादी साधक जब शरणगमन-संवर लेता है, तब वह यावत् जीवन इस संवर को लेता है। परन्तु महायानी साधक यावत् बोधि पर्यन्त इस संवर को लेता है। यही बात ऊपर कहे गये अतीश द्वारा उद्धृत बुद्ध-धर्म-गणी (सङ्स-ग्यस् छोस्-छ़ोग्स-मा) के द्वितीय पाद द्वारा स्पष्ट हो जाती है, यथा–यावद्धि बोधिं शरणं गतोऽस्मि, अर्थात् यावत् बोधि पर्यन्त शरण में जाता हूँ।
आचार्य दीपङ्करश्रीज्ञान ने महायानीय त्रिरत्न के तीन भेद किये हैं, यथा–“यहाँ महायान शास्त्र के अनुसार (त्रि-)रत्न इस प्रकार हैं, (यथा–) (क) तथता त्रिरत्न, (ख) अभिसमय-त्रिरत्न और (ग) समुपस्थित-त्रिरत्न। वे भी क्रमशः इस प्रकार हैं–(क) ज्ञेय (वस्तु) का अविपर्यास (अर्थात् अविपरीत) ज्ञान, अविकल्प अद्वैत ज्ञान (और) धर्मधातु में अवस्थिति (बुद्धरत्न, वही विशुद्ध धर्मधातु प्रज्ञापारमिता (धर्मरत्न) और समाहित अवस्था में समस्त धर्मों को आकाश-तलवत् (साक्षात् जानने वाली महाभूमि पर अवस्थित बोधिसत्त्व (संघरत्न) ‘तथता-त्रिरत्न’ है।”[5]
“(ख) पुनः इस तरह कहा गया है–द्विविध रूपकाय (बुद्धरत्न), सन्ततिगत चार आर्यसत्य, सैंतीस बोधिपाक्षिक धर्म, भूमि एवं पारमिता आदि धर्म (धर्मरत्न) तथा प्रयोगमार्गीय बोधिसत्त्व (संघ-रत्न) है, (अभिसमय-त्रिरत्न हैं)।”[6]
“पुनः इस तरह कहा गया है–(सुगत-प्रतिमा आदि जो) चित्र (के रूप में) लिखित, (काष्ठ, शिला और पट आदि में) उभारी (उकेरी) गयी, (सोने-चाँदी आदि धातुओं की ढ़ली हुई और (इसी तरह) मृत्तिकामय आदि (मूर्ति, बुद्धरत्न), नौ अङ्गों वाले प्रवचन स्वरूप पोथी-पुस्तक आदि धर्मरत्न तथा सम्भारमार्गीय बोधिसत्त्व (संघरत्न) हैं।”[7]
थेरवादी मतानुसार त्रिरत्न के विषय में आचार्य वसुबन्धु ने अभिधर्मकोश में इस प्रकार कहा है–“जो त्रिशरणगमन करता है वह बुद्ध कारक अशैक्ष धर्मों, दो प्रकार के संघकारक धर्मों तथा निर्वाण की शरण लेता है”[8]
यदि शरणगमनसंवर का पालन सही रूप से होता है, तब आठ प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं, यथा–1. आप बुद्ध के अनुयायी कहलायेंगे, 2. यह शरणगमनसंवर समस्त ऊपर के अन्य संवरों का आश्रय बनता है, 3. पूर्व के किये गये समस्त पापों का क्षय होता है, 4. मनुष्य तथा अमनुष्य कोई भी बाधा नहीं पहुँचा सकते, 5. सभी इच्छाओं की पूर्ति होती है, 6. बोधि प्राप्ति हेतु यह एक महापुण्य का कारण बनता है, 7. इसके सम्यक् पालन से
दुर्गतियों से रक्षा होती है तथा 8. शीघ्र अभिसंबोधि की प्राप्ति होती है।
द्वितीय विषय बोधिचित्त बुद्धत्व प्राप्ति के हेतु के रूप में अनिवार्य है। बोधिचित्त के बिना भी श्रावक अर्हत् तथा प्रत्येकबुद्ध अर्हत् की प्राप्ति हो सकती है, किन्तु बुद्धत्व की प्राप्ति इसके बिना नहीं हो सकती।
इस बोधिचित्त के स्वरूप के विषय में आर्य मैत्रेयनाथ रचित अभिसमयालंकार में कहा गया है–
चित्तोत्पादः परार्थाय सम्यक्सम्बोधिकामता ।[9]
बोधिचित्त परार्थ हेतु सम्यक् सम्बुद्ध को प्राप्त करने की इच्छा है।
क्योंकि एक बोधिसत्त्व समस्त सत्त्वों के प्रति महाकरुणा का उत्पाद करता है, अतः वह समस्त प्राणियों के प्रति अपरिमित मैत्रीचित्त को उत्पन्न करता है, अपरिमित करुणाचित्त को उत्पन्न करता है, अपरिमित मुदिताचित्त को उत्पन्न करता है और अपरिमित उपेक्षा-चित्त को उत्पन्न करता है।
बोधिसत्त्व, सत्त्व-दुःख के प्रति अतिसंवेदनशील होने के कारण प्राणियों के दुःखों को देख नहीं सकता। स्वयं के चित्त में स्थित दुःखों को सम्यक् रूप से जानते हुए, स्वयं के जैसे ही, अन्य प्राणी भी उन-उन दुःखों को नहीं चाहते–ऐसी स्पष्ट प्रकार की अनुभूति करके, उन प्राणियों के सभी दुःखों को समाप्त करने की इच्छा से वह बोधिचित्त रूपी उस महान् चित्तरत्न को उत्पन्न करता है। अतः आचार्य दीपङ्करश्रीज्ञान रचित बोधिपथप्रदीप में कहा गया है–
“स्वसन्ततेर्यथा दुःखं दुःखं सर्वं हि सर्वथा ।
अन्यस्य हातुमिच्छेद् य उत्तमः पुरुषस्तु सः ।।”[10]
“स्वसन्तानगत दुःखों के समान जो दूसरों के समस्त दुःखों का सर्वथा
नाश करना चाहता हो, वही उत्तम पुरुष है।”[11]
आचार्य अतीश ने समस्त बुद्धानुयायियों को तीन वर्गों में विभाजित किया है, यथा–1. लघु पुरुष, 2. मध्यम पुरुष और 3. उत्तम पुरुष।
यदि एक साधक अभ्युदय-निःश्रेयस् को प्राप्त करना चाहता है, तब उसके ये तीन ही क्रम हो सकते हैं। इन तीन क्रमों से चलते हुए साधक अन्तिम निःश्रेयस्-पद को प्राप्त करता है। इसे ही मार्गक्रम कहा गया है, जो महायानियों का वास्तविक अभ्यास-क्रम है।
इनमें यहाँ जो तीसरा उत्तम-पुरुष कहा गया है, यही बोधिसत्त्व की स्थिति है और इसी उत्तम-पुरुष-मार्ग का मुख्य अभ्यास एक बोधिसत्त्व को करना पड़ता है।
बोधिचित्त को सामान्यतः दो भागों में विभाजित कर सकते हैं, यथा–1. पारमार्थिक बोधिचित्त तथा 2. सांवृतिक बोधिचित्त।
1. पारमार्थिक बोधिचित्त लोकातीत अवस्था है। यह शून्यता तथा करुणा के सार से युक्त होता है। यह प्रभास्वर है, अविक्षिप्त है और प्रपञ्च से रहित अवस्था है। जब एक साधक, प्रयोग मार्ग के अन्तिम पद को पार कर बोधि-सत्त्व की प्रथम प्रमुदिता भूमि को प्राप्त करता है, तब वह प्रथम बार इस पारमार्थिक बोधिचित्त की अनुभूति करता है।
2. सांवृतिक बोधिचित्त, सम्भार-मार्ग एवं प्रयोग-मार्ग की अवस्थाओं में होता है। यह दो प्रकार का है, यथा–1. बोधिप्रणिधिचित्त तथा 2. बोधि-प्रस्थानचित्त। आचार्य शान्तिदेव ने इन दो प्रकार के बोधिचित्तों का वर्णन
बोधिचर्यावतार में इस प्रकार किया है–
“तद्बोधिचित्तं द्विविधं विज्ञातव्यं समासतः ।
बोधिप्रणिधिचित्तं च बोधिप्रस्थानमेव च ।।”[12]
“संक्षेप में उस बोधिचित्त के दो भेद हैं–बोधिप्रणिधानचित्त और बोधि-प्रस्थानचित्त।”[13]
“गन्तुकामस्य गन्तुश्च यथा भेदः प्रतीयते ।
तथा भेदोऽनयोर्ज्ञेयो यथासंख्येन पंडितैः ।।”[14]
“जाने की इच्छावाले और जाते हुए (व्यक्तियों) में जैसे अन्तर होता है, वैसा ही अन्तर पंडितों को इनमें, क्रम से समझ लेना चाहिये।”[15]
मैं समस्त सत्त्वों के लिए बुद्धत्व को प्राप्त करूँगा, यह चिन्तन बोधि-प्रणिधिचित्त कहलाता है, यथा–मैं बोधगया जाऊँगा, इस प्रकार कहीं जाने की इच्छा करना।
प्रथम कोई भी भाव मन में उत्पन्न होता है और उसके बाद उसका प्रायोगिक रूप प्रकट हो सकता है। ऐसे ही वास्तव में जिसने बोधगया जाने के लिए प्रथम चिन्तन किया, उसके बाद वह पूरी तैयारी के साथ वहाँ के लिए प्रस्थान करता है–ऐसे ही बुद्धत्व को प्राप्त करने के लिए छह पारमिताओं के अभ्यास करने की प्रतिज्ञा करना बोधिप्रस्थानचित्त कहलाता है।
इसका दूसरा अर्थ यह हुआ कि यदि एक व्यक्ति बुद्धत्व रूपी अपने उद्देश्य की प्राप्ति हेतु प्रतिज्ञा करता है, तब वह बोधिप्रणिधिचित्त कहलाता है तथा उस उद्देश्य अर्थात् बोधि की प्राप्ति के लिए जो हेतु (कारण) हैं, उसके करने के लिए प्रतिज्ञा करता है, तब वह बोधिप्रस्थानचित्त कहलाता है।
इन्हीं दो प्रकार के चित्तोत्पाद को अभिधर्मसमुच्चय में 1. अविशिष्ट और
2. विशिष्ट नाम से भी सम्बोधित किया गया है। ‘मैं अनुत्तर सम्यक् संबोधि में अभिसम्बुद्ध होऊँ’–यह अविशिष्ट चित्तोत्पाद है तथा ‘दानपारमितादि परिपूर्ण हो’–ऐसी कामना करना विशिष्ट चित्तोत्पाद कहलाता है।
बोधिचित्तोत्पाद के आलम्बन भी द्विविध हैं, यथा–1. बोधि अर्थात् बुद्धत्व तथा 2. सत्त्व का कल्याण अर्थात् सत्त्वार्थ करना।
एक बोधिसत्त्व बोधि का अन्वेषण करता है। उसका मूल उद्देश्य बुद्धत्व को प्राप्त करना है। अतः बोधिसत्त्व का प्रथम आलम्बन तो बोधि ही होता है और द्वितीय आलम्बन सत्त्वों का कल्याण करना है। क्योंकि सत्त्व कल्याण के बिना बोधि की प्राप्ति कदापि सम्भव नहीं होती। अतः बोधिसत्त्व के आलम्बन मुख्यतः दो ही हैं, जिनको एक बोधिसत्त्व कदापि नहीं छोड़ सकता। इन दोनों आलम्बनों के अभाव में बुद्धत्व की कल्पना नहीं की जा सकती।
अब प्रश्न उठता है कि यह बोधिचित्तरत्न किन कारणों से उत्पन्न होता है। दशधर्मसूत्र में इसकी उत्पत्ति के चार हेतु बताये गये हैं, यथा–1. बोधिचित्त की अनुशंसा अर्थात् लाभ से अवगत होना, 2. तथागत बुद्ध के प्रति महान् श्रद्धा होना, 3. प्राणियों के दुःख से अभिभूत होना तथा 4. कल्याणमित्र अर्थात् गुरु की प्रेरणा का होना।
महायान परम्परा में बोधिचित्त प्राप्ति के लिए चित्तोत्पादसंवरविधिक्रमों का भी वर्णन हुआ है। यह विधि योग्य गुरु से लेनी पड़ती है। परिस्थितिवश यदि गुरु के पास जाने में बहुत बड़ा संकट हो, तब विना गुरु के ही इस संवर को स्वयं द्वारा लेने की विधि का भी वर्णन हुआ है। लेकिन यहाँ पर उन विधियों का विस्तृत वर्णन आवश्यक नहीं है।
किन्तु इसकी द्विविध परम्पराओं में भट्टारक मञ्जुश्री और आचार्य नागार्जुन से आने वाली परम्परा जो गम्भीर दर्शन-परम्परा के नाम से विख्यात है, वह सरल तथा संक्षिप्त है। इसी क्रम की विधि को प्रदर्शित करते हुए आचार्य शान्तिदेव ने भी उक्त बोधिचित्तोत्पादसमादान-विषय को प्रमुख रूप से तीन अध्यायों के माध्यम से स्पष्ट करने की चेष्टा की है, जिसमें प्रथम अध्याय तो बोधिचित्त-अनुशंसा से सम्बद्ध है।
इस बोधिचित्त की प्राप्ति के लिए चित्तोत्पादसंवरक्रम-विधि-क्रम के मुख्य अंशों को यहाँ बोधिचर्यावतार में कहे अनुसार प्रदर्शित किया जा रहा है।
उक्त विधि से बोधिचित्त को प्राप्त करने के लिए सर्वप्रथम एक आदिकर्मिक-बोधिसत्त्व को बोधिचित्तानुशंसा को ध्यान में रखते हुए इसके स्वरूप एवं भेद को जानना चाहिए तथा जब मन में इसके महत्त्व को समझते हैं, तब इस चित्तोत्पाद की प्राप्ति के लिए सर्वप्रथम सप्तांग-पूजा द्वारा पुण्य की प्राप्ति सहित अपने किये पापों की देशना अत्यन्त आवश्यक कही गयी है, क्योंकि बोधिचित्तरत्न अत्यन्त पवित्र चित्त का सार होने के कारण उसके लिए अल्प पुण्य तथा पुण्य चित्त के विपरीत अकुशलचित्त की अधिकता इसमें बाधा उपस्थित करती है।
यह बोधिचित्त तो एक बहुत ही शुद्ध चित्त है, जो एक सत्त्व को बुद्धत्व तक ले जाता है अर्थात् बुद्धत्व प्राप्त कराता है। यह पवित्र चित्त उस स्थान पर नहीं रह सकता, जहाँ क्लेश रूपी अत्यन्त गन्दगी पड़ी हो। इसीलिए बोधिचर्यावतार के प्रथम परिच्छेद में बोधिचित्त की अनुशंसा किये जाने के बाद द्वितीय परिच्छेद पापदेशना और तृतीय परिच्छेद बोधिचित्त परिग्रह के नाम से जोड़े गये हैं और बाद के इन दो परिच्छेदों में आचार्य ने 1. वन्दन, 2. पूजन, 3. शरणगमन, 4. पापदेशना, 5. पुण्यानुमोदन, 6. बुद्धाध्येषणा, 7. याचना तथा 8. परिणामना रूपी अष्टविध पुण्यसामग्रियों को प्रस्तुत कर अन्त में बोधिचित्त ग्रहण करने वाले पदों को प्रस्तुत किया है। पापदेशना परिच्छेद का प्रारम्भ करते हुए आचार्य शान्तिदेव का कहना है, यथा–
“तच्चित्तरत्नग्रहणाय सम्यक् पूजां करोम्येष तथागतानाम् ।
सद्धर्मरत्नस्य च निर्मलस्य बुद्धात्मजानां च गुणोदधीनाम् ।।”[16]
“उस बोधिचित्तरत्न को ग्रहण करने के लिए बुद्धों की, निर्मल सद्धर्मरत्न की और गुणसागर बुद्धपुत्रों की मैं पूजा करता हूँ।”[17]
सप्तविध पूजाओं के द्वारा पुण्यों का संचय तथा पाप की देशना करना बोधिचित्तोत्पाद के लिए अनिवार्य है।
महायानियों का मानना है कि बुद्धत्व प्राप्ति के लिए दो प्रकार के आवरणों तथा साथ ही द्विविध सम्भार की सम्पूर्णता आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है। अतः वन्दन एवं पूजन के पश्चात् देशना को प्रस्तुत करते हुए आचार्य शान्तिदेव का कहना है, यथा–
“अनादिमति संसारे जन्मन्यत्रैव वा पुनः ।
यन्मया पशुना पापं कृतं कारितमेव वा ।।”[18]
“आदि रहित संसार में अथवा इसी जन्म में मुझ पशु ने जो पाप किये और कराये हैं।”[19]
“यच्चानुमोदितं किञ्चिदात्मघाताय मोहतः ।
तदत्ययं देशयामि पश्चात्तापेन तापितः ।।”[20]
“और जो मोहवश जो आत्मघात का अनुमोदन किया है, उस अपराध के पश्चात्ताप से खिन्न होकर मैं देशना करता हूँ।”[21]
“रत्नत्रयेऽपकारो यो मातापितृषु वा मया ।
गुरुष्वन्येषु वा क्षेपात् कायवाग्बुद्धिभिः कृतः ।।”[22]
“त्रिरत्न के प्रति, माता-पिता के प्रति तथा अन्य गुरुजनों के प्रति मोहवश काय-वाग्-मन से जो अपकार हो गए हैं।”[23]
“अनेक दोषदुष्टेन मया पापेन नायकाः ।
यत्कृतं दारुणं पापं तत् सर्वं देशयाम्यहम् ।।”[24]
“ (अथवा जानबूझ कर) अनेक दोषों से दूषित मुझ पातकी ने जो दारुण पाप किए हैं, उन सबकी देशना करता हूँ।”[25]
“मया बालेन मूढेन यत् किंचित् पापमाचितम् ।
प्रकृत्या यच्च सावद्यं प्रज्ञप्त्यावद्यमेव च ।।”[26]
“जो भी (प्राणिहत्या-आदि) प्रकृतिसावद्य और (विकाल भोजन-आदि) प्रज्ञप्तिसावद्य पाप मुझ अबोध मूढ़ ने कमाए।”[27]
“तत्सर्वं देशयाम्येष नाथानामग्रतः स्थितः ।
कृताञ्जलिर्दुःखभीतः प्रणिपत्य पुनः पुनः ।।”[28]
“उन सबकी देशना, दुःख से घबराकर मैं, प्रभुओं के सामने हाथ जोड़, बारंबार प्रणाम कर, करता हूँ।[29]
अत्ययमत्ययत्वेन प्रतिगृह्णन्तु नायकाः ।
न भद्रकमिदं नाथा न कर्तव्यं पुनर्मया ।।”[30]
“हे नायकों! अपराध को अपराध के रूप में ग्रहण करो। हे प्रभुओं, मैं यह पाप फिर नहीं करूँगा।”[31]
इस पापदेशना के बाद तृतीय परिच्छेद में बोधिचित्तपरिग्रहण हेतु सप्ताङ्ग पूजाओं में शेष पुण्यानुमोदना, अध्येषणा एवं याचना के पश्चात् परिणामना को प्रस्तुत किया गया है।
तत्पश्चात् बोधिसत्त्वसंवर के ग्रहण के लिए निम्नलिखित दो पदों को कहा गया है, यथा–
“यथा गृहीतं सुगतैर्बोधिचित्तं पुरातनैः ।
ते बोधिसत्त्वशिक्षायामानुपूर्व्या यथा स्थिताः ।।”[32]
“जैसे अतीत (भूतकाल) के बुद्धों ने बोधिचित्त का ग्रहण किया, जैसे उन्होंने क्रम से बोधिसत्त्वों की शिक्षाओं का पालन किया।”[33]
“तद्वदुत्पादयाम्येष बोधिचित्तं जगद्धिते ।
तद्वदेव च ताः शिक्षाः शिक्षिष्यामि यथाक्रमम् ।।”[34]
“वैसे ही जगत्-कल्याण के लिए मैं बोधिचित्त उत्पन्न कर उन शिक्षाओं के वैसे ही क्रम से सीखूँगा।”[35]
बोधिसत्त्वसंवर को प्राप्त करने के बाद उसकी शिक्षाओं का पालन बहुत ही आवश्यक है। क्योंकि बोधिचित्त के बोधिप्रणिधिचित्त एवं बोधिप्रस्थान-चित्त दो भेद है, अतः दोनों के ही अलग-अलग शिक्षाओं का वर्णन मोक्षालंकार में हुआ है। प्रथम बोधिप्रणिधिचित्त की शिक्षाओं के अन्तर्गत 1. प्राणियों का त्याग नहीं करना, 2. बोधिचित्त की अनुशंसा, 3. दो सम्भारों का सञ्चय, 4. बोधिचित्त का अभ्यास और 5. चार कृष्ण धर्मों का परित्याग करते हुए चार शुक्ल धर्मों के ग्रहण करने पर विस्तृत चर्चा की गई है। इसमें प्रथम के द्वारा बोधिचित्त की हानि नहीं होती। द्वितीय के द्वारा बोधिचित्त परिक्षय नहीं होता। तृतीय के द्वारा बोधिचित्त बलवान् होता है। चतुर्थ के द्वारा बोधिचित्त की वृद्धि होती है और पञ्चम के द्वारा बोधिचित्त की स्मृति बनी रहती है।
चार कृष्ण धर्म के विषय में मोक्षालंकार में इस प्रकार कहा गया है, यथा–“1. गुरु एवं किसी पूज्य व्यक्ति को धोखा देना, 2. दूसरे व्यक्ति का कोई कृत्य पश्चात्ताप के योग्य नहीं होने पर भी उसके मन में पश्चात्ताप उत्पन्न करना, 3. बोधिचित्त से युक्त किसी बोधिसत्त्व को द्वेषवश दुर्वचन कहना और 4. सत्त्वों के साथ धूर्ततापूर्ण आचरण करना।”[36]
ऐसे ही चार शुक्ल धर्म के विषय में भी उसी ग्रन्थ में इस प्रकार कहा गया है, यथा–“1. प्राण के लिये भी जानबूझकर झूठ नहीं बोलना. 2. समस्त सत्त्वों को कुशल कार्य में नियोजित करते हुए उन्हें महायान अभिमत कुशल धर्मों में प्रतिष्ठित करना, 3. बोधिचित्त से युक्त बोधिसत्त्वों को बुद्ध के समान समझते हुए उनके गुणों का दसों दिशाओं में प्रचार करना और 4. समस्त सत्त्वों के साथ वञ्चना से रहित हो अध्याशयपूर्वक व्यवहार करना।”[37]
बोधिप्रस्थानचित्त के उत्पाद की शिक्षाओं के अन्तर्गत 1. अधिशील-शिक्षा, 2. अधिचित्त-शिक्षा और 3. अधिप्रज्ञ-शिक्षा तीन कहे गये हैं। ये त्रिशिक्षा के नाम से बौद्ध जगत् में अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। बोधिपथप्रदीप में कहा
गया है, यथा–
“स्वकायवाक्चित्तविशुद्धिहेतु-
प्रस्थानचित्तात्मयमस्थितेन ।
त्रिशीलशिक्षा परिशिक्ष्यते चेत्
त्रिशीलशिक्षासु महादरः स्यात् ।।”[38]
“अपने काय, वाक् और चित्त की विशुद्धि के कारणभूत प्रस्थानचित्तात्मक संवर में स्थित होकर त्रिशिक्षाओं का परिशीलन किया जाता है तो त्रि–शिक्षाओं में महान् आदर होगा।”[39]
त्रिशील शिक्षा के अन्तर्गत ही छह पारमिताओं का भी लय हो जाता है। प्रथम दान, शील एवं क्षान्ति पारमितायें अधिशील-शिक्षाओं के अन्तर्गत समाहित हो जाती हैं। ध्यान पारमिता अधिचित्त-शिक्षा है तथा प्रज्ञापारमिता अधिप्रज्ञ-शिक्षा है। वीर्यपारमिता को तो तीनों शिक्षाओं का सहयोगी माना गया है। इन शिक्षाओं का सही ज्ञान बोधिसत्त्वयान सम्बन्धित वाङ्मय के द्वारा जानने की कोशिश करनी चाहिए।
इस प्रकार एक बोधिसत्त्व किस प्रकार बोधिचित्त को उत्पन्न करता है तथा उसकी शिक्षाएँ कैसी हैं, यह उपर्युक्त संक्षिप्त शोधपत्र के द्वारा जाना जा सकता है। संक्षेप में बोधिसत्त्व समस्त सत्त्वों के कल्याण के लिए स्वयं बुद्धत्व को प्राप्त करना चाहता है तथा समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए ही छह पारमिताओं का संचय करता है। इसी कारण वह दो सम्भारों को प्रपूर्ण करते हुए इन्ही पारमिताओं के फल रूप में त्रिकाय सम्पन्न बुद्धत्व को प्राप्त करता है। आचार्य अतीश का उपर्युक्त बुद्धं च धर्मंञ्च गणोत्तमं च आदि पद भोटदेशीय महायानी साधकों को बोधि-सत्त्वाचरण के लिए सदियों से प्रेरणा देता रहा है और प्रत्येक बोधिसत्त्व को बोधिचित्त का सदा स्मरण कराता रहता है।
देवो वर्षतु कालेन सस्यसम्पत्तिरस्तु च ।
स्फीतो भवतु लोकश्च राजा भवतु धार्मिकः ।।[40]
मेघ समय से वर्षा करें, खेत धान्य से सुसम्पन्न हों, लोक समृद्ध हों एवं राजा धर्म का आचरण करने वाला हो।
मा कश्चिद् दुःखितः सत्त्वो मा पापी मा च रोगितः ।
मा हीनः परिभूतो वा मा भूत् कश्चिच्च दुर्मनाः ।।[41]
कोई प्राणी दुःखी न हो, न पापी हो, न रोगी हो, कोई भी हीन न हो, तिरस्कृत न हो और कोई भी प्राणी दुष्ट चित्त वाला न हो।
जगद् दुःखैकभैषज्यं सर्वसम्पत्सुखाकरम् ।
लाभसत्कारसहितं चिरं तिष्ठतु शासनम् ।।[42]
सत्त्वों की एकमात्र ओषधि, समस्त सुखों का आकर (कोष) लाभ-सत्कार सहित बुद्ध का शासन चिरकाल तक स्थित रहे।
।। भवतु सर्वमङ्गलम् ।।
[1]. अतीशविरचिता एकादशग्रन्थाः (चित्तोत्पादसंवरविधिक्रमः), पृ0–101
[2]. वही, पृ0–150
[3]. वही, पृ0–103
[4]. वही, पृ0–153
[5]. अतीशविरचिता एकादशग्रन्थाः (शरणगमनदेशना), पृ0–126-127
[6]. वही, पृ0–127
[7]. वही, पृ0–127
[8]. अभिधर्मकोश 4.32
[9]. अभिसमयालंकार, 1.19
[10]. बोधिपथप्रदीपः, पृ0–5, प्रका0–केन्द्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा-संस्थान सारनाथ, वाराणसी।सन् 1994 ई.
[11]. वही, पृ0–5
[12]. बोधिचर्यावतार, 1.15, प्रका0–केन्द्रीय बौद्ध-विद्या संस्थान लेह, लदाख।सन् 1989 ई.
[13]. बोधिचर्यावतार, पृ0–3
[14]. बोधिचर्यावतार, 1.16
[15]. बोधिचर्यावतार, पृ0–3
[16]. बोधिचर्यावतार, 2.1
[17]. बोधिचर्यावतार, पृ0–6
[18]. बोधिचर्यावतार, 2.28
[19]. बोधिचर्यावतार, पृ0–9
[20]. बोधिचर्यावतार, 2.29
[21]. बोधिचर्यावतार, पृ0–9
[22]. बोधिचर्यावतार, 2.30
[23]. बोधिचर्यावतार, पृ0–9
[24]. बोधिचर्यावतार, 2.31
[25]. बोधिचर्यावतार, पृ0–9
[26]. बोधिचर्यावतार, 2.64
[27]. बोधिचर्यावतार, पृ0–12
[28]. बोधिचर्यावतार, 2.65
[29]. बोधिचर्यावतार, पृ0–12
[30]. बोधिचर्यावतार, 2.66
[31]. बोधिचर्यावतार, पृ0–12
[32]. बोधिचर्यावतार, 3.22
[33]. बोधिचर्यावतार, पृ0–15
[34]. बोधिचर्यावतार, 3.23
[35]. बोधिचर्यावतार, पृ0–15
[36]. सद्धर्मचिन्तामणिमोक्षरत्नालङ्कार, पृ0–152, प्रका0–केन्द्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा-संस्थान सारनाथ, वाराणसी। सन् 2000ई.
[37]. वही, पृ0–152
[38]. बोधिपथप्रदीपः, पृ0–32,श्लो0–32
[39]. वही, पृ0–32
[40]. वही, 10.39
[41]. वही, 10.41
[42]. वही, 10.57
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