Author: Ramesh Chandra Negi Mathas

  • शरणगमन एवं बोधिचित्तोत्पाद

    डॉ. रमेशचन्द्र नेगी (सहा. प्रोफेसर)

    केन्द्रीय तिब्बती अध्ययन विश्वविद्यालय सारनाथ, वाराणसी

    सर्वदुर्गतितो हीनं सर्वावरणवर्जितम् ।

    बोधिचित्तं नमस्यामि सम्बुद्धपददायकम् ।।[1]

    “सभी दुर्गतियों से रहित और सभी आवरणों से मुक्त सम्बुद्ध-पद के दाता बोधिचित्त को प्रणाम करता हूँ।”[2]

    बुद्धं च  धर्मंञ्च च गणोत्तमं च

    यावद्धि बोधिं शरणं गतोऽस्मि ।

    दानादि-कृत्यैश्च कृतैर्मयैभिः

    बुद्धो   भवेयं  जगतो  हिताय ।।[3]

    “बुद्ध, धर्म और गण में श्रेष्ठ (त्रिरत्न की मैं) यावद् बोधि(-मण्डावगम) पर्यन्त शरण में जाता हूँ। मेरे द्वारा किये गये इन दान आदि (पुण्यों) से जगत् के हित हेतु (मेरा) बुद्धत्व सिद्ध हो।”[4]

    संसार में समस्त प्राणी सुख को चाहते हैं और दुःख को नहीं चाहते। इसके लिए सभी सत्त्व अपनी योग्यतानुसार सदा प्रयत्न करते रहते हैं। वे थोड़ा बहुत सांसारिक सुखों को प्राप्त कर भी लेते हैं, किन्तु वास्तविक सुखों से वे कोसों दूर रहते हैं। वास्तविक (असली) सुख तभी प्राप्त हो सकता है, जब आप उसे प्राप्त करने के जो उपाय हैं, उससे अवगत हों। ये उपाय शास्त्रों में भूमि एवं मार्ग आदि नामों से जाने जाते हैं।

    आज इस विश्व में बहुत प्रकार के धर्म-सम्प्रदाय हैं, ऐसे ही प्राचीन काल में भी नाना सम्प्रदायों के अस्तित्व का बोध इतिहास से होता है। सभी धर्म-सम्प्रदाय अपने अनुयायियों को सुखों की प्राप्ति की ही बात करते हैं। लेकिन इतिहास साक्षी (गवाह) है कि इस धरती पर धर्म के नाम पर जितना रक्त बहा है, उतना रक्त किसी अन्य प्रकार से शायद ही बहा हो। अतः धर्म के नाम पर भी यदि उनके अनुयायियों को सुख की सही उपलब्धि नहीं हो, तब एक वास्तविक साधक के लिए निश्चित रूप से इन धर्मों के बारे में परीक्षा करना अनिवार्य हो जाता है।

    तथागत शाक्यमुनि सम्यक् सम्बुद्ध द्वारा प्रवर्तित धर्म आज बौद्धधर्म, सद्धर्म आदि नामों से इस विश्व में प्रचलित है। इस 21वीं शती में यदि कोई धर्म विज्ञान के साथ कदम से कदम मिलाकर चल सकता है, तो वह धर्म बौद्धधर्म ही है। इस बात को आईन्सटीन आदि विश्व के कई महान् वैज्ञानिकों ने भी स्वीकार किया है। यह धर्म आज से 2500 वर्ष पूर्व भारत में जन्मा तथा बाद में यह सम्पूर्ण एशिया में फैल गया। यहाँ पर इस संक्षिप्त निबन्ध में तत्सम्बन्धित सद्धर्म के दो मुख्य बिन्दुओं, जो 1. शरणगमन एवं 2. बोधिचित्त के नाम से जाने जाते हैं, इन दोनों विषयों के बारे में संक्षिप्त में वर्णन किया जायेगा।

    प्रथम विषय शरणगमन, परम (वास्तविक) सुख को प्राप्त करने की इच्छा वाले साधक के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। 1. बुद्ध, 2. धर्म और 3. संघ–त्रिरत्न के नाम से जाने जाते हैं। बुद्ध का स्वरूप धर्मकाय है। दूसरे शब्दों में बुद्ध वे हैं, जिन्होंने समस्त आवरणों का त्याग कर दिया है और समस्त गुणों में पारंगत हो गये हैं। समस्त अच्छे गुण धर्म के नाम से भी जाने जाते हैं और संघ का सामान्य अर्थ बुद्ध के ऐसे अनुयायी, जो शिष्यों को धर्म सिखा सकें। इसीलिए बुद्ध को वैद्य, धर्म को ओषध (दवा) तथा संघ को उपचार के समय सहायक के रूप में भी कहा गया है।

    एक बौद्ध के लिए शरणगमन बौद्ध होने और नहीं होने की सीमारेखा भी है। एक व्यक्ति सही रूप से बौद्ध है या नहीं इसकी सीमारेखा के रूप में इन्हीं तीन रत्नों को कहा गया है। यदि कोई व्यक्ति इन तीन रत्नों को अच्छी तरह जानते हुए इनकी शरण में जाता है, वही वास्तविक रूप से बौद्ध कहलाता है।

    अतः एक बौद्ध के लिए शरणगमनसंवर अनिवार्य है।

    जैसे कि सर्वविदित है, बौद्ध–1. थेरवाद तथा 2. महायान के रूप में द्विविध हैं। अतः यह जानना भी बहुत ही आवश्यक है कि वास्तविक रूप से थेरवाद एवं महायान में भेद क्या है?

    महायानी ग्रन्थों में थेरवाद तथा महायान के भेद को स्पष्ट करने के लिए बोधिचित्त के किसी व्यक्ति में होने और नहीं होने को कहा गया है। इसका अर्थ यह हुआ कि यदि किसी व्यक्ति ने महायानी शरणगमन सहित बोधिचित्त को ग्रहण किया है वह महायानी कहलाता है।

    अर्थात् स्वयं को महायानी कहलाने के लिए स्वयं में बोधिचित्त का होना अनिवार्य है। दूसरे शब्दों में महायानी होने की सीमारेखा बोधिचित्त ही है। अतः डिगुङ् क्योब्-पा रिन्छेन-पल् का कहना है कि जैसे बौद्ध होने की सीमारेखा शरणगमन है, वैसे ही महायानी होने की सीमारेखा बोधिचित्त है।

    उपर्युक्त बातों से यह बात स्पष्ट होती है कि थेरवादी शरणगमन और महायानी शरणगमन में किञ्चिद् भेद है। एक थेरवादी साधक जब शरणगमन-संवर लेता है, तब वह यावत् जीवन इस संवर को लेता है। परन्तु महायानी साधक यावत् बोधि पर्यन्त इस संवर को लेता है। यही बात ऊपर कहे गये अतीश द्वारा उद्धृत बुद्ध-धर्म-गणी (सङ्स-ग्यस् छोस्-छ़ोग्स-मा) के द्वितीय पाद द्वारा स्पष्ट हो जाती है, यथा–यावद्धि बोधिं शरणं गतोऽस्मि, अर्थात् यावत् बोधि पर्यन्त शरण में जाता हूँ।

    आचार्य दीपङ्करश्रीज्ञान ने महायानीय त्रिरत्न के तीन भेद किये हैं, यथा–“यहाँ महायान शास्त्र के अनुसार (त्रि-)रत्न इस प्रकार हैं, (यथा–) (क) तथता त्रिरत्न, (ख) अभिसमय-त्रिरत्न और (ग) समुपस्थित-त्रिरत्न। वे भी क्रमशः इस प्रकार हैं–(क) ज्ञेय (वस्तु) का अविपर्यास (अर्थात् अविपरीत) ज्ञान, अविकल्प अद्वैत ज्ञान (और) धर्मधातु में अवस्थिति (बुद्धरत्न, वही विशुद्ध धर्मधातु प्रज्ञापारमिता (धर्मरत्न) और समाहित अवस्था में समस्त धर्मों को आकाश-तलवत् (साक्षात् जानने वाली महाभूमि पर अवस्थित बोधिसत्त्व (संघरत्न) ‘तथता-त्रिरत्न’ है।”[5]

     “(ख) पुनः इस तरह कहा गया है–द्विविध रूपकाय (बुद्धरत्न), सन्ततिगत चार आर्यसत्य, सैंतीस बोधिपाक्षिक धर्म, भूमि एवं पारमिता आदि धर्म (धर्मरत्न) तथा प्रयोगमार्गीय बोधिसत्त्व (संघ-रत्न) है, (अभिसमय-त्रिरत्न हैं)।”[6]

     “पुनः इस तरह कहा गया है–(सुगत-प्रतिमा आदि जो) चित्र (के रूप में) लिखित, (काष्ठ, शिला और पट आदि में) उभारी (उकेरी) गयी, (सोने-चाँदी आदि धातुओं की ढ़ली हुई और (इसी तरह) मृत्तिकामय आदि (मूर्ति, बुद्धरत्न), नौ अङ्गों वाले प्रवचन स्वरूप पोथी-पुस्तक आदि धर्मरत्न तथा सम्भारमार्गीय बोधिसत्त्व (संघरत्न) हैं।”[7]

    थेरवादी मतानुसार त्रिरत्न के विषय में आचार्य वसुबन्धु ने अभिधर्मकोश में इस प्रकार कहा है–“जो त्रिशरणगमन करता है वह बुद्ध कारक अशैक्ष धर्मों,  दो प्रकार के संघकारक धर्मों तथा निर्वाण की शरण लेता है”[8]

    यदि शरणगमनसंवर का पालन सही रूप से होता है, तब आठ प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं, यथा–1. आप बुद्ध के अनुयायी कहलायेंगे, 2. यह शरणगमनसंवर समस्त ऊपर के अन्य संवरों का आश्रय बनता है, 3. पूर्व के किये गये समस्त पापों का क्षय होता है, 4. मनुष्य तथा अमनुष्य कोई भी बाधा नहीं पहुँचा सकते, 5. सभी इच्छाओं की पूर्ति होती है, 6. बोधि प्राप्ति हेतु यह एक महापुण्य का कारण बनता है, 7. इसके सम्यक् पालन से

    दुर्गतियों से रक्षा होती है तथा 8. शीघ्र अभिसंबोधि की प्राप्ति होती है।

    द्वितीय विषय बोधिचित्त बुद्धत्व प्राप्ति के हेतु के रूप में अनिवार्य है। बोधिचित्त के बिना भी श्रावक अर्हत् तथा प्रत्येकबुद्ध अर्हत् की प्राप्ति हो सकती है, किन्तु बुद्धत्व की प्राप्ति इसके बिना नहीं हो सकती।

    इस बोधिचित्त के स्वरूप के विषय में आर्य मैत्रेयनाथ रचित अभिसमयालंकार में कहा गया है–

    चित्तोत्पादः परार्थाय सम्यक्सम्बोधिकामता[9]

    बोधिचित्त परार्थ हेतु सम्यक् सम्बुद्ध को प्राप्त करने की इच्छा है।

    क्योंकि एक बोधिसत्त्व समस्त सत्त्वों के प्रति महाकरुणा का उत्पाद करता है, अतः वह समस्त प्राणियों के प्रति अपरिमित मैत्रीचित्त को उत्पन्न करता है, अपरिमित करुणाचित्त को उत्पन्न करता है, अपरिमित मुदिताचित्त को उत्पन्न करता है और अपरिमित उपेक्षा-चित्त को उत्पन्न करता है।

    बोधिसत्त्व, सत्त्व-दुःख के प्रति अतिसंवेदनशील होने के कारण प्राणियों के दुःखों को देख नहीं सकता। स्वयं के चित्त में स्थित दुःखों को सम्यक् रूप से जानते हुए, स्वयं के जैसे ही, अन्य प्राणी भी उन-उन दुःखों को नहीं चाहते–ऐसी स्पष्ट प्रकार की अनुभूति करके, उन प्राणियों के सभी दुःखों को समाप्त करने की इच्छा से वह बोधिचित्त रूपी उस महान् चित्तरत्न को उत्पन्न करता है। अतः आचार्य दीपङ्करश्रीज्ञान रचित बोधिपथप्रदीप में कहा गया है–

     “स्वसन्ततेर्यथा दुःखं दुःखं सर्वं हि सर्वथा ।

    अन्यस्य हातुमिच्छेद् य उत्तमः पुरुषस्तु सः ।।[10]

     “स्वसन्तानगत दुःखों के समान जो दूसरों के समस्त दुःखों का सर्वथा

    नाश करना चाहता हो, वही उत्तम पुरुष है।”[11]

    आचार्य अतीश ने समस्त बुद्धानुयायियों को तीन वर्गों में विभाजित किया है, यथा–1. लघु पुरुष, 2. मध्यम पुरुष और 3. उत्तम पुरुष।

    यदि एक साधक अभ्युदय-निःश्रेयस् को प्राप्त करना चाहता है, तब उसके ये तीन ही क्रम हो सकते हैं। इन तीन क्रमों से चलते हुए साधक अन्तिम निःश्रेयस्-पद को प्राप्त करता है। इसे ही मार्गक्रम कहा गया है, जो महायानियों का वास्तविक अभ्यास-क्रम है।

    इनमें यहाँ जो तीसरा उत्तम-पुरुष कहा गया है, यही बोधिसत्त्व की स्थिति है और इसी उत्तम-पुरुष-मार्ग का मुख्य अभ्यास एक बोधिसत्त्व को करना पड़ता है।

    बोधिचित्त को सामान्यतः दो भागों में विभाजित कर सकते हैं, यथा–1. पारमार्थिक बोधिचित्त तथा 2. सांवृतिक बोधिचित्त

    1. पारमार्थिक बोधिचित्त लोकातीत अवस्था है। यह शून्यता तथा करुणा के सार से युक्त होता है। यह प्रभास्वर है, अविक्षिप्त है और प्रपञ्च से रहित अवस्था है। जब एक साधक, प्रयोग मार्ग के अन्तिम पद को पार कर बोधि-सत्त्व की प्रथम प्रमुदिता भूमि को प्राप्त करता है, तब वह प्रथम बार इस पारमार्थिक बोधिचित्त की अनुभूति करता है।

    2. सांवृतिक बोधिचित्त, सम्भार-मार्ग एवं प्रयोग-मार्ग की अवस्थाओं में होता है। यह दो प्रकार का है, यथा–1. बोधिप्रणिधिचित्त तथा 2. बोधि-प्रस्थानचित्त। आचार्य शान्तिदेव ने इन दो प्रकार के बोधिचित्तों का वर्णन

    बोधिचर्यावतार में इस प्रकार किया है–

    तद्बोधिचित्तं द्विविधं विज्ञातव्यं समासतः ।

    बोधिप्रणिधिचित्तं च बोधिप्रस्थानमेव च ।।[12]

    “संक्षेप में उस बोधिचित्त के दो भेद हैं–बोधिप्रणिधानचित्त और बोधि-प्रस्थानचित्त।”[13]

    गन्तुकामस्य गन्तुश्च यथा भेदः प्रतीयते ।

    तथा भेदोऽनयोर्ज्ञेयो यथासंख्येन पंडितैः ।।[14]

    “जाने की इच्छावाले और जाते हुए (व्यक्तियों) में जैसे अन्तर होता है, वैसा ही अन्तर पंडितों को इनमें, क्रम से समझ लेना चाहिये।”[15]

    मैं समस्त सत्त्वों के लिए बुद्धत्व को प्राप्त करूँगा, यह चिन्तन बोधि-प्रणिधिचित्त कहलाता है, यथा–मैं बोधगया जाऊँगा, इस प्रकार कहीं जाने की इच्छा करना।

    प्रथम कोई भी भाव मन में उत्पन्न होता है और उसके बाद उसका प्रायोगिक रूप प्रकट हो सकता है। ऐसे ही वास्तव में जिसने बोधगया जाने के लिए प्रथम चिन्तन किया, उसके बाद वह पूरी तैयारी के साथ वहाँ के लिए प्रस्थान करता है–ऐसे ही बुद्धत्व को प्राप्त करने के लिए छह पारमिताओं के अभ्यास करने की प्रतिज्ञा करना बोधिप्रस्थानचित्त कहलाता है।

    इसका दूसरा अर्थ यह हुआ कि यदि एक व्यक्ति बुद्धत्व रूपी अपने उद्देश्य की प्राप्ति हेतु प्रतिज्ञा करता है, तब वह बोधिप्रणिधिचित्त कहलाता है तथा उस उद्देश्य अर्थात् बोधि की प्राप्ति के लिए जो हेतु (कारण) हैं, उसके करने के लिए प्रतिज्ञा करता है, तब वह बोधिप्रस्थानचित्त कहलाता है।

    इन्हीं दो प्रकार के चित्तोत्पाद को अभिधर्मसमुच्चय में 1. अविशिष्ट और

    2. विशिष्ट नाम से भी सम्बोधित किया गया है। ‘मैं अनुत्तर सम्यक् संबोधि में अभिसम्बुद्ध होऊँ’–यह अविशिष्ट चित्तोत्पाद है तथा ‘दानपारमितादि परिपूर्ण हो’–ऐसी कामना करना विशिष्ट चित्तोत्पाद कहलाता है।

    बोधिचित्तोत्पाद के आलम्बन भी द्विविध हैं, यथा–1. बोधि अर्थात् बुद्धत्व तथा 2. सत्त्व का कल्याण अर्थात् सत्त्वार्थ करना।

    एक बोधिसत्त्व बोधि का अन्वेषण करता है। उसका मूल उद्देश्य बुद्धत्व को प्राप्त करना है। अतः बोधिसत्त्व का प्रथम आलम्बन तो बोधि ही होता है और द्वितीय आलम्बन सत्त्वों का कल्याण करना है। क्योंकि सत्त्व कल्याण के बिना बोधि की प्राप्ति कदापि सम्भव नहीं होती। अतः बोधिसत्त्व के आलम्बन मुख्यतः दो ही हैं, जिनको एक बोधिसत्त्व कदापि नहीं छोड़ सकता। इन दोनों आलम्बनों के अभाव में बुद्धत्व की कल्पना नहीं की जा सकती।

    अब प्रश्न उठता है कि यह बोधिचित्तरत्न किन कारणों से उत्पन्न होता है। दशधर्मसूत्र में इसकी उत्पत्ति के चार हेतु बताये गये हैं, यथा–1. बोधिचित्त की अनुशंसा अर्थात् लाभ से अवगत होना, 2. तथागत बुद्ध के प्रति महान् श्रद्धा होना, 3. प्राणियों के दुःख से अभिभूत होना तथा 4. कल्याणमित्र अर्थात् गुरु की प्रेरणा का होना।

    महायान परम्परा में बोधिचित्त प्राप्ति के लिए चित्तोत्पादसंवरविधिक्रमों का भी वर्णन हुआ है। यह विधि योग्य गुरु से लेनी पड़ती है। परिस्थितिवश यदि गुरु के पास जाने में बहुत बड़ा संकट हो, तब विना गुरु के ही इस संवर को स्वयं द्वारा लेने की विधि का भी वर्णन हुआ है। लेकिन यहाँ पर उन विधियों का विस्तृत वर्णन आवश्यक नहीं है।

    किन्तु इसकी द्विविध परम्पराओं में भट्टारक मञ्जुश्री और आचार्य नागार्जुन से आने वाली परम्परा जो गम्भीर दर्शन-परम्परा के नाम से विख्यात है, वह सरल तथा संक्षिप्त है। इसी क्रम की विधि को प्रदर्शित करते हुए आचार्य शान्तिदेव ने भी उक्त बोधिचित्तोत्पादसमादान-विषय को प्रमुख रूप से तीन अध्यायों के माध्यम से स्पष्ट करने की चेष्टा की है, जिसमें प्रथम अध्याय तो बोधिचित्त-अनुशंसा से सम्बद्ध है।

    इस बोधिचित्त की प्राप्ति के लिए चित्तोत्पादसंवरक्रम-विधि-क्रम के मुख्य अंशों को यहाँ बोधिचर्यावतार में कहे अनुसार प्रदर्शित किया जा रहा है।

    उक्त विधि से बोधिचित्त को प्राप्त करने के लिए सर्वप्रथम एक आदिकर्मिक-बोधिसत्त्व को बोधिचित्तानुशंसा को ध्यान में रखते हुए इसके स्वरूप एवं भेद को जानना चाहिए तथा जब मन में इसके महत्त्व को समझते हैं, तब इस चित्तोत्पाद की प्राप्ति के लिए सर्वप्रथम सप्तांग-पूजा द्वारा पुण्य की प्राप्ति सहित अपने किये पापों की देशना अत्यन्त आवश्यक कही गयी है, क्योंकि बोधिचित्तरत्न अत्यन्त पवित्र चित्त का सार होने के कारण उसके लिए अल्प पुण्य तथा पुण्य चित्त के विपरीत अकुशलचित्त की अधिकता इसमें बाधा उपस्थित करती है।

    यह बोधिचित्त तो एक बहुत ही शुद्ध चित्त है, जो एक सत्त्व को बुद्धत्व तक ले जाता है अर्थात् बुद्धत्व प्राप्त कराता है। यह पवित्र चित्त उस स्थान पर नहीं रह सकता, जहाँ क्लेश रूपी अत्यन्त गन्दगी पड़ी हो। इसीलिए बोधिचर्यावतार के प्रथम परिच्छेद में बोधिचित्त की अनुशंसा किये जाने के बाद द्वितीय परिच्छेद पापदेशना और तृतीय परिच्छेद बोधिचित्त परिग्रह के नाम से जोड़े गये हैं और बाद के इन दो परिच्छेदों में आचार्य ने 1. वन्दन, 2. पूजन, 3. शरणगमन, 4. पापदेशना, 5. पुण्यानुमोदन, 6. बुद्धाध्येषणा, 7. याचना तथा 8. परिणामना रूपी अष्टविध पुण्यसामग्रियों को प्रस्तुत कर अन्त में बोधिचित्त ग्रहण करने वाले पदों को प्रस्तुत किया है। पापदेशना परिच्छेद का प्रारम्भ करते हुए आचार्य शान्तिदेव का कहना है, यथा–

    तच्चित्तरत्नग्रहणाय सम्यक् पूजां करोम्येष तथागतानाम् ।

    सद्धर्मरत्नस्य च निर्मलस्य बुद्धात्मजानां च गुणोदधीनाम् ।।[16]

    “उस बोधिचित्तरत्न को ग्रहण करने के लिए बुद्धों की, निर्मल सद्धर्मरत्न की और गुणसागर बुद्धपुत्रों की मैं पूजा करता हूँ।”[17]

    सप्तविध पूजाओं के द्वारा पुण्यों का संचय तथा पाप की देशना करना बोधिचित्तोत्पाद के लिए अनिवार्य है।

    महायानियों का मानना है कि बुद्धत्व प्राप्ति के लिए दो प्रकार के आवरणों तथा साथ ही द्विविध सम्भार की सम्पूर्णता आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है। अतः वन्दन एवं पूजन के पश्चात् देशना को प्रस्तुत करते हुए आचार्य शान्तिदेव का कहना है, यथा–

    “अनादिमति संसारे जन्मन्यत्रैव वा पुनः ।

    यन्मया पशुना पापं कृतं कारितमेव वा ।।”[18]

    आदि रहित संसार में अथवा इसी जन्म में मुझ पशु ने जो पाप किये और कराये हैं।[19]

    “यच्चानुमोदितं किञ्चिदात्मघाताय मोहतः ।

    तदत्ययं देशयामि पश्चात्तापेन तापितः ।।”[20]

    और जो मोहवश जो आत्मघात का अनुमोदन किया है, उस अपराध के पश्चात्ताप से खिन्न होकर मैं देशना करता हूँ।[21]

    “रत्नत्रयेऽपकारो यो मातापितृषु वा मया ।

    गुरुष्वन्येषु वा क्षेपात् कायवाग्बुद्धिभिः कृतः ।।”[22]

    त्रिरत्न के प्रति, माता-पिता के प्रति तथा अन्य गुरुजनों के प्रति मोहवश काय-वाग्-मन से जो अपकार हो गए हैं।[23]

    “अनेक दोषदुष्टेन मया पापेन नायकाः ।

    यत्कृतं दारुणं पापं तत् सर्वं देशयाम्यहम् ।।”[24]

    (अथवा जानबूझ कर) अनेक दोषों से दूषित मुझ पातकी ने जो दारुण पाप किए हैं, उन सबकी देशना करता हूँ।[25] 

    “मया बालेन मूढेन यत् किंचित् पापमाचितम् ।

    प्रकृत्या यच्च सावद्यं प्रज्ञप्त्यावद्यमेव च ।।”[26]

    जो भी (प्राणिहत्या-आदि) प्रकृतिसावद्य और (विकाल भोजन-आदि) प्रज्ञप्तिसावद्य पाप मुझ अबोध मूढ़ ने कमाए।[27]

    “तत्सर्वं देशयाम्येष नाथानामग्रतः स्थितः ।

    कृताञ्जलिर्दुःखभीतः प्रणिपत्य पुनः पुनः ।।”[28]

    उन सबकी देशना, दुःख से घबराकर मैं, प्रभुओं के सामने हाथ जोड़, बारंबार प्रणाम कर, करता हूँ।[29]

    अत्ययमत्ययत्वेन प्रतिगृह्णन्तु नायकाः ।

    न भद्रकमिदं नाथा न कर्तव्यं पुनर्मया ।।”[30]

    हे नायकों! अपराध को अपराध के रूप में ग्रहण करो। हे प्रभुओं, मैं यह पाप फिर नहीं करूँगा।[31]

    इस पापदेशना के बाद तृतीय परिच्छेद में बोधिचित्तपरिग्रहण हेतु सप्ताङ्ग पूजाओं में शेष पुण्यानुमोदना, अध्येषणा एवं याचना के पश्चात् परिणामना को प्रस्तुत किया गया है।

    तत्पश्चात् बोधिसत्त्वसंवर के ग्रहण के लिए निम्नलिखित दो पदों को कहा गया है, यथा–

    यथा गृहीतं सुगतैर्बोधिचित्तं पुरातनैः ।

    ते बोधिसत्त्वशिक्षायामानुपूर्व्या यथा स्थिताः ।।[32]

    “जैसे अतीत (भूतकाल) के बुद्धों ने बोधिचित्त का ग्रहण किया, जैसे उन्होंने क्रम से बोधिसत्त्वों की शिक्षाओं का पालन किया।”[33]

    तद्वदुत्पादयाम्येष बोधिचित्तं जगद्धिते ।

    तद्वदेव च ताः शिक्षाः शिक्षिष्यामि यथाक्रमम् ।।[34]

    “वैसे ही जगत्-कल्याण के लिए मैं बोधिचित्त उत्पन्न कर उन शिक्षाओं के वैसे ही क्रम से सीखूँगा।”[35]

    बोधिसत्त्वसंवर को प्राप्त करने के बाद उसकी शिक्षाओं का पालन बहुत ही आवश्यक है। क्योंकि बोधिचित्त के बोधिप्रणिधिचित्त एवं बोधिप्रस्थान-चित्त दो भेद है, अतः दोनों के ही अलग-अलग शिक्षाओं का वर्णन मोक्षालंकार में हुआ है। प्रथम बोधिप्रणिधिचित्त की शिक्षाओं के अन्तर्गत 1. प्राणियों का त्याग नहीं करना, 2. बोधिचित्त की अनुशंसा, 3. दो सम्भारों का सञ्चय, 4. बोधिचित्त का अभ्यास और 5. चार कृष्ण धर्मों का परित्याग करते हुए चार शुक्ल धर्मों के ग्रहण करने पर विस्तृत चर्चा की गई है। इसमें प्रथम के द्वारा बोधिचित्त की हानि नहीं होती। द्वितीय के द्वारा बोधिचित्त परिक्षय नहीं होता। तृतीय के द्वारा बोधिचित्त बलवान् होता है। चतुर्थ के द्वारा बोधिचित्त की वृद्धि होती है और पञ्चम के द्वारा बोधिचित्त की स्मृति बनी रहती है।

    चार कृष्ण धर्म के विषय में मोक्षालंकार में इस प्रकार कहा गया है, यथा–“1. गुरु एवं किसी पूज्य व्यक्ति को धोखा देना, 2. दूसरे व्यक्ति का कोई कृत्य पश्चात्ताप के योग्य नहीं होने पर भी उसके मन में पश्चात्ताप उत्पन्न करना, 3. बोधिचित्त से युक्त किसी बोधिसत्त्व को द्वेषवश दुर्वचन कहना और 4. सत्त्वों के साथ धूर्ततापूर्ण आचरण करना।”[36]

    ऐसे ही चार शुक्ल धर्म के विषय में भी उसी ग्रन्थ में इस प्रकार कहा गया है, यथा–“1. प्राण के लिये भी जानबूझकर झूठ नहीं बोलना. 2. समस्त सत्त्वों को कुशल कार्य में नियोजित करते हुए उन्हें महायान अभिमत कुशल धर्मों में प्रतिष्ठित करना, 3. बोधिचित्त से युक्त बोधिसत्त्वों को बुद्ध के समान समझते हुए उनके गुणों का दसों दिशाओं में प्रचार करना और 4. समस्त सत्त्वों के साथ वञ्चना से रहित हो अध्याशयपूर्वक व्यवहार करना।”[37]

    बोधिप्रस्थानचित्त के उत्पाद की शिक्षाओं के अन्तर्गत 1. अधिशील-शिक्षा, 2. अधिचित्त-शिक्षा और 3. अधिप्रज्ञ-शिक्षा तीन कहे गये हैं। ये त्रिशिक्षा के नाम से बौद्ध जगत् में अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। बोधिपथप्रदीप में कहा

    गया है, यथा–

    स्वकायवाक्चित्तविशुद्धिहेतु-

    प्रस्थानचित्तात्मयमस्थितेन ।

    त्रिशीलशिक्षा परिशिक्ष्यते चेत्

    त्रिशीलशिक्षासु महादरः स्यात् ।।[38]

    “अपने काय, वाक् और चित्त की विशुद्धि के कारणभूत प्रस्थानचित्तात्मक संवर में स्थित होकर त्रिशिक्षाओं का परिशीलन किया जाता है तो त्रिशिक्षाओं में महान् आदर होगा।”[39]

    त्रिशील शिक्षा के अन्तर्गत ही छह पारमिताओं का भी लय हो जाता है। प्रथम दान, शील एवं क्षान्ति पारमितायें अधिशील-शिक्षाओं के अन्तर्गत समाहित हो जाती हैं। ध्यान पारमिता अधिचित्त-शिक्षा है तथा प्रज्ञापारमिता अधिप्रज्ञ-शिक्षा है। वीर्यपारमिता को तो तीनों शिक्षाओं का सहयोगी माना गया है। इन शिक्षाओं का सही ज्ञान बोधिसत्त्वयान सम्बन्धित वाङ्मय के द्वारा जानने की कोशिश करनी चाहिए।

    इस प्रकार एक बोधिसत्त्व किस प्रकार बोधिचित्त को उत्पन्न करता है तथा उसकी शिक्षाएँ कैसी हैं, यह उपर्युक्त संक्षिप्त शोधपत्र के द्वारा जाना जा सकता है। संक्षेप में बोधिसत्त्व समस्त सत्त्वों के कल्याण के लिए स्वयं बुद्धत्व को प्राप्त करना चाहता है तथा समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए ही छह पारमिताओं का संचय करता है। इसी कारण वह दो सम्भारों को प्रपूर्ण करते हुए इन्ही पारमिताओं के फल रूप में त्रिकाय सम्पन्न बुद्धत्व को प्राप्त करता है। आचार्य अतीश का उपर्युक्त  बुद्धं च धर्मंञ्च गणोत्तमं च आदि पद भोटदेशीय महायानी साधकों को बोधि-सत्त्वाचरण के लिए सदियों से प्रेरणा देता रहा है और प्रत्येक बोधिसत्त्व को बोधिचित्त का सदा स्मरण कराता रहता है।

    देवो  वर्षतु  कालेन   सस्यसम्पत्तिरस्तु  च ।

    स्फीतो भवतु लोकश्च राजा भवतु धार्मिकः ।।[40]

    मेघ समय से वर्षा करें, खेत धान्य से सुसम्पन्न हों, लोक समृद्ध हों एवं राजा धर्म का आचरण करने वाला हो।

    मा कश्चिद् दुःखितः सत्त्वो मा पापी मा च रोगितः ।

    मा  हीनः  परिभूतो  वा  मा  भूत् कश्चिच्च दुर्मनाः ।।[41]

    कोई प्राणी दुःखी न हो, न पापी हो, न रोगी हो, कोई भी हीन न हो, तिरस्कृत न हो और कोई भी प्राणी दुष्ट चित्त वाला न हो।

    जगद् दुःखैकभैषज्यं सर्वसम्पत्सुखाकरम् ।

    लाभसत्कारसहितं चिरं तिष्ठतु शासनम् ।।[42]

    सत्त्वों की एकमात्र ओषधि, समस्त सुखों का आकर (कोष) लाभ-सत्कार सहित बुद्ध का शासन चिरकाल तक स्थित रहे।

    ।। भवतु सर्वमङ्गलम् ।।


    [1].   अतीशविरचिता एकादशग्रन्थाः (चित्तोत्पादसंवरविधिक्रमः), पृ0–101

    [2].   वही, पृ0–150

    [3].   वही, पृ0–103

    [4].   वही, पृ0–153

    [5].   अतीशविरचिता एकादशग्रन्थाः (शरणगमनदेशना), पृ0–126-127

    [6].   वही, पृ0–127

    [7].   वही, पृ0–127

    [8].   अभिधर्मकोश 4.32

    [9].   अभिसमयालंकार, 1.19

    [10]. बोधिपथप्रदीपः, पृ0–5, प्रका0–केन्द्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा-संस्थान सारनाथ, वाराणसी।सन् 1994 ई.

    [11]. वही, पृ0–5

    [12]. बोधिचर्यावतार, 1.15, प्रका0–केन्द्रीय बौद्ध-विद्या संस्थान लेह, लदाख।सन् 1989 ई.

    [13]. बोधिचर्यावतार, पृ0–3

    [14]. बोधिचर्यावतार, 1.16

    [15]. बोधिचर्यावतार, पृ0–3

    [16]. बोधिचर्यावतार, 2.1

    [17]. बोधिचर्यावतार, पृ0–6

    [18]. बोधिचर्यावतार, 2.28

    [19]. बोधिचर्यावतार, पृ0–9

    [20]. बोधिचर्यावतार, 2.29

    [21]. बोधिचर्यावतार, पृ0–9

    [22]. बोधिचर्यावतार, 2.30

    [23]. बोधिचर्यावतार, पृ0–9

    [24]. बोधिचर्यावतार, 2.31

    [25]. बोधिचर्यावतार, पृ0–9

    [26]. बोधिचर्यावतार, 2.64

    [27]. बोधिचर्यावतार, पृ0–12

    [28]. बोधिचर्यावतार, 2.65

    [29]. बोधिचर्यावतार, पृ0–12

    [30]. बोधिचर्यावतार, 2.66

    [31]. बोधिचर्यावतार, पृ0–12

    [32]. बोधिचर्यावतार, 3.22

    [33]. बोधिचर्यावतार, पृ0–15

    [34]. बोधिचर्यावतार, 3.23

    [35]. बोधिचर्यावतार, पृ0–15

    [36]. सद्धर्मचिन्तामणिमोक्षरत्नालङ्कार, पृ0–152, प्रका0–केन्द्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा-संस्थान सारनाथ, वाराणसी। सन् 2000ई.

    [37]. वही, पृ0–152

    [38]. बोधिपथप्रदीपः, पृ0–32,श्लो0–32

    [39]. वही, पृ0–32

    [40]. वही, 10.39

    [41]. वही, 10.41

    [42]. वही, 10.57

  • महायान में समाधि की अवधारणा : शमथ एवं विपश्यना के परिप्रेक्ष्य में

    डॉ. रमेशचन्द्र नेगी

    (सहा. प्रोफेसर / कार्यकारी प्रधान सम्पादक)

    केन्द्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान सारनाथ, वाराणसी

    मंगलाचरण :

    सर्वातीताद्यबुद्धानां  जनकत्वात्  पितरौ  तथा ।

    भक्त्या साधनधर्माश्च वाक्चित्ताभ्यां मुदा नतः ।।[1]

    या सर्वज्ञतया  नयत्युपशमं शान्तैषिणः श्रावकान्

    या मार्गज्ञतया  जगद्धित्कृतां  लोकार्थसम्पादिका ।

    सर्वाकारमिदं  वदन्ति  मुनयो  विश्वं  यया संगता-स्तस्यै श्रावकबोधिसत्त्वगणिनो बुद्धस्य मात्रे नमः ।।[2]

    भूमिका :

    बौद्ध आचार्यों ने तथागत सम्यक् सम्बुद्ध के उपदेशानुसार ही बाह्य जगत् से आन्तरिक जगत् के सुधार पर ज्यादा बल दिया है। यदि हम आभासित जगत् का सूक्ष्म विवेचन करते हैं, तब वास्तव में 1. संसार एवं 2. निर्वाण की बात सामने आती है। संसार जागतिक आभास का स्थूल रूप है, जिसे शास्त्रों में 1. संवृति कहा गया है और 2. निर्वाण (परमार्थ) इसी का सूक्ष्म रूप है, जिसे सही रूप से सम्यक् साधना के विना नहीं जाना जा सकता।

    भोटदेशीय महान् आचार्य गम्पोपा सोद्-नम्स रिन्छेन् (पुण्यरत्न) अपनी मोक्षालंकार (थर्-ग्यन्) नामक सुप्रसिद्ध ग्रन्थ की भूमिका में उपर्युक्त प्रसंग का विवरण निम्न प्रकार से सांगोपांग और बहुत ही सुन्दर रूप में प्रस्तुत करते हैं,

    यथा–

     “सामान्यतया समस्त धर्म इन दो वर्गों मे संगृहीत होते हैं–(1) संसार और (2) निर्वाण। इन दोनों के (1) स्वभाव, (2) आकार और (3) लक्षण इस प्रकार हैं। यह जो संसार है, वह स्वभाव से शून्य है, भ्रान्ति उसका आकार है और लक्षण दुःखों का उदय है। यह जो निर्वाण है, वह स्वभाव से शून्य है, समस्त भ्रान्तियों की परिनिवृत्ति उसका आकार है और लक्षण समस्त दुःखों से मुक्ति है।

    प्रश्नसंसार में कौन भ्रमित होते हैं?

    उत्तरतीनों धातुओं[3] के समस्त प्राणी भ्रमित होते हैं।

    प्रश्नकिस आधार में भ्रमित होते हैं?

    उत्तरशून्यता[4] में भ्रमित होते हैं।

    प्रश्नकिस कारण भ्रमित होते हैं?

    उत्तरमहा-अविद्या (मोह = अज्ञान) के कारण भ्रमित होते हैं।

    प्रश्नकिस प्रकार भ्रमित होते हैं?

    उत्तरछः गतियों[5] (योनियों) के विषयों में आसक्त होकर भ्रमित होते हैं।

    प्रश्नकिस दृष्टान्त की तरह भ्रमित होते हैं?

    उत्तर–निद्राकाल में स्वप्न की तरह भ्रमित होते हैं।

    प्रश्नकब से भ्रमित होते आ रहे हैं?

    उत्तरअनादिकाल से भ्रमित होते आ रहे हैं।

    प्रश्नभ्रमित होने से क्या हानि है?

    उत्तर–(प्राणी) केवल दुखों में ही विचरण करते रहते हैं।

    प्रश्नभ्रान्ति ज्ञान में कब परिवर्तित होगी (अर्थात् बदलेगी)?

    उत्तर–अनुत्तर बोधि (बुद्धत्व) की प्राप्ति के अनन्तर होगी।

    प्रश्नक्या भ्रान्ति का ज्ञानरूप में स्वतः प्रबोध संभव है?

    उत्तर–नहीं, संसार अनन्त के लिए प्रसिद्ध है।

     (अगर भ्रान्ति का स्वतः प्रबोध सम्भव होता तो संसार के समस्त प्राणी बुद्धत्व प्राप्त कर चुके होते और संसार अनन्त न रह कर अन्तवान् होता।)

    इस प्रकार यह संसार भ्रान्तिमय है, इसमें दुःख की मात्रा अधिक है, दीर्घकालिकता है और स्वतः मुक्ति सम्भव नहीं है। इसलिए अभी से ही अनुत्तर बोधि की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए।”[6]

    यह अनुत्तर बोधि अर्थात् महासुख, जिसके लिये संसार के अनन्त सत्त्व अनन्तकाल से अहोरात्र प्रयत्नशील हैं, बिना प्रयास के प्राप्त नहीं हो सकती। इसी बोधि-प्राप्ति की विधि अर्थात् उपाय को बौद्धमत में त्रिशिक्षा, षट् पार-मिता, शून्यता, शमथ, विपश्यना, समता, महामुद्रा और महासम्पन्न आदि नाना नामों से प्रकट किये गये हैं।

    इसी प्रसंग में भगवान् तथागत सम्यक् सम्बुद्ध ने सत्त्वों की वेदना के तीन स्वरूप कहे हैं, यथा–

     “तिस्सो इमा, भिक्खवे, वेदना। सुखा वेदना, दुक्खा वेदना, अदुक्खमसुखा वेदना–इमा खो, भिक्खवे, तिस्सो वेदना’ ति ।”[7]

    संक्षेप में कहें तो इन वेदनाओं का हमारे सुख-दुःख आदि से बहुत ही गम्भीर सम्बन्ध है, यथा–सुख-वेदना से राग कीउत्पत्ति होती है और ऐसे ही दुःख-वेदना से द्वेष तथा अदुःख-असुख-वेदना से मोह अर्थात् अज्ञान रूपी त्रिविषों की उत्पत्ति होती है, जिनके कारण सम्पूर्ण असंख्य क्लेश सदा सत्त्वों की चित्त-सन्तति में उत्पन्न होते रहते हैं और इस प्रकार सत्त्व सांसारिक दुःखों से छुटकारा नहीं हो पाते।  

    वास्तव में विपश्यना साधना इन्हीं तीनों वेदनाओं को सही ढंग से जानते हुए स्वयं को समता अर्थात् शून्यता में स्थापित करते हुये ज्ञान अर्थात् बोधि को प्राप्त करने की विद्या है, जिसके कारण दुःख-समुदय अर्थात् असंख्य क्लेशों का क्रमशः समूल नाश होता है और साधक क्रमिक रूप से स्रोतापत्ति-फल आदि को प्राप्त करता है, जो वास्तव में शान्त है, निर्वाण है और महासुख स्वरूप है। संक्षेप में, वास्तविक सुख को प्राप्त करने की सम्यक् विद्या अथवा उपाय का नाम ही विपश्यना साधना है।  

    या क्लेशों को जड़ों से सम्पूर्ण रूप से उखाडने की विद्या का नाम ही विपश्यना विद्या है, जिसे यहाँ विपश्यना साधना के नाम से कहा गया है।

    क्योंकि अज्ञान का विपरीत–ज्ञान है तथा अबोधि का विपरीत–बोधि है, यही कारण है कि इस विशिष्ट साधना के बल से उसे प्राप्त करने का प्रयास सभी बौद्ध परम्पराओं के साधक, अपनी-अपनी परम्परा के अनुसार करते आ रहे हैं और उसी के बल से सम्पूर्ण फलों[8] की प्राप्ति भी वर्तमान पर्यन्त साधकों में होती आ रही है, जिससे यह दुःखी संसार वास्तविक रूप से उस सुख से सम्बद्ध हो जाता है, जिसे वास्तविक सुख अर्थात् निर्वाण अथवा महासुख आदि कहा गया है।   

    तथागत सम्यक् सम्बुद्ध की सम्पूर्ण शिक्षा जो वास्तव में साधना ही है, को सही ढंग से समझने के लिये प्रथम एक बौद्ध साधक को सर्वप्रथम मार्गक्रम के बारे में सम्यक् रूप से समझने का प्रयास करना चाहिये। इसके बिना साधक नाना मार्गों में भटकता रहता है और तथागत सम्यक् सम्बुद्ध के वास्तविक आशय स्वरूप मार्ग को नहीं जान पाता।

    मार्गक्रम का अर्थ है–एक बोधि के मार्ग पर पड़ा साधक किस प्रकार के मार्गों से उत्तरोत्तर आगे बढते हुये वह अपने सम्यक् लक्ष्य संबोधि को प्राप्त करता है–इसकी सम्पूर्ण रूपरेखा।

    इस मार्गक्रम की जानकारी के लिये आर्यदेश भारत के महान् आचार्य दीपंकरश्रीज्ञान (अतीश) द्वारा विरचित बोधिपथप्रदीप से अच्छा ग्रन्थ हमें प्राप्त नहीं हो सकता। उसमें मार्गक्रम को तीन भागों में बाँटा गया है, यथा–1. लघुपुरुषमार्ग, 2. मध्यमपुरुषमार्ग तथा 3. उत्तमपुरुषमार्ग

    ये मार्गक्रम ऐसे ही हैं, जैसे एक सामान्य व्यक्ति विद्यालय में जाकर प्रथम कक्षा से अध्ययन करते हुये उच्च, उच्चतर तथा उच्चतम कक्षाओं तक पहुँच जाता है। अतः यही कारण है कि वास्तविक साधक के लिये इन मार्गों का उल्लंघन कदापि सम्भव नहीं होता। यह तो वास्तविक रूप से बीज से फल की यात्रा है।

    ऐसा कदापि नहीं होता है कि साधक लघुपुरुषमार्ग को प्राप्त न कर सीधे मध्यमपुरुषमार्ग में पहुँच जाये और ऐसे ही मध्यमपुरुषमार्ग को प्राप्त न कर उत्तमपुरुषमार्ग में पहुँच जाये।

    इन तीन प्रकार के पुरुषों के लक्षणों को आचार्य अतीश के उपर्युक्त कथित सुप्रसिद्ध ग्रन्थ में निम्न प्रकार से कहा गया है, यथा–

    लघुपुरुष का लक्षण :

    यस्य   केनाप्युपायेन   संसारसुखमात्रकम् ।

    स्वस्यैवार्थाय चाभीष्टं स ज्ञेयः पुरुषोऽधमः ।।

    मध्यमपुरुष का लक्षण :

    विरतः पापकर्मभ्यो भवसौख्यात् पराङ्मुखः ।

    आत्मोपशममात्रार्थी स उक्तो मध्यमः पुमान् ।।

    उत्तमपुरुष का लक्षण :

    स्वसन्तेर्यथा  दुःखं  दुःखं  सर्वं  हि   सर्वथा ।

    अन्यस्य हातुमिच्छेद् य उत्तमः पुरुषस्तु सः ।।[9]

    तथागत सम्यक् सम्बुद्ध की शिक्षा का स्वभाव प्रतीत्यसमुत्पाद पर आधारित है और इसी हेतुप्रत्ययवाद के आधार पर ही इस तरह वह मार्गीय पुद्गल शील से समाधि तथा इससे प्रज्ञा को प्राप्त करता हुआ अन्तिम फल बोधि को प्राप्त करता है, जो कि संसार के समस्त सत्त्वों का अन्तिम ध्येय है।

    या दूसरे शब्दों में इस प्रकार कहा जा सकता है कि शिक्षाओं का स्वरूप

    भी स्वयं में स्थूल से सूक्ष्मता की ओर जाने वाली है। अतः बोधिसत्त्वमार्ग के द्वारा जब बोधिसत्त्व बोधि (बुद्धत्व) की ओर आगे बढता है, तब वह सर्वप्रथम दानपारमिता का अभ्यास करता है और ऐसे ही क्रमशः शील, क्षान्ति, वीर्य, समाधि तथा अन्त में प्रज्ञापारमिता का सम्पूर्ण-अभ्यास करता हुआ महासुख रूपी अन्तिम लक्ष्य को प्राप्त करता है।

    विपश्यना साधना इसी अन्तिम फल को प्राप्त करने का वास्तविक उपाय है, जिसके प्रयोग से बुद्ध से लेकर वर्तमान पर्यन्त के समस्त बुद्धानुयायी लोग इन सांसारिक दुःखों से विमुक्त होकर अन्तिम फल को प्राप्त हुये हैं।

    या दूसरे शब्दों में उपर्युक्त गम्पोपा के वचनानुसार संसार से निर्वाण तक की यात्रा करने का नाम ही विपश्यना है, जिसके द्वारा सांसारिक सुख सहित लोकातीत सुखों की प्राप्ति इस साधना के द्वारा बहुत ही सरल तरीके से सम्भव हो पाती है।

    अतः सर्वप्रथम साधना के मूल विषय को स्पष्ट करने से पहले उसके क्या लाभ है? इसको समझेंगे तो निश्चित रूप से साधना में आसानी से संलग्न हो जाया जा सकता है। लाभ को देखकर कार्य में जुटना सांसारिक लक्षण है।  

    साधना की अनुशंसा :

    तो सर्वप्रथम साधना की अनुशंसा को यहाँ सर्वप्रथम स्पष्ट किया जा रहा है। भारतीय आचार्य अतीश के गुरु बोधिभद्र ने समाधि-सम्भार-परिवर्त में समाधि के गुण अर्थात् अनुशंसा का वर्णन निम्न शब्दों में किया है, यथा–

     “इस प्रकार विपक्षों का परित्याग कर समाधि के गुणों का स्मरण करे। यहाँ इसके गुण दो प्रकार के हैं–

    1. दृष्टधर्मवेदनीय (इसी जन्म में प्राप्त होने वाले) तथा इसके

    2. अतिरिक्त (अर्थात् अन्य जन्मों में प्राप्त होने वाले फल)।

    वह कैसे?

    1. (दृष्टधर्मवेदनीय गुण)

    शरीर का सुखपूर्वक रहना, वाणी का सुखपूर्वक होना, चित्त की सुखपूर्वक स्थिति, धर्मपालकों का प्रसन्न होना, उसको प्राप्त मनुष्य-काय की सार्थकता, शास्ता, माता-पिता और गुरु के प्रति कृतज्ञ होना, मनुष्येतर से हानि न होना, रोगों की कमी, दीर्घायु, मरते समय पश्चात्ताप नहीं होना, विद्वानों के द्वारा प्रशंसित होना, खान, पान, गृह, शय्या, रोग की औषधि और वस्त्रों की सरलतापूर्वक प्राप्ति तथा क्लेश और (अकुशल) कर्म का नाश, ये प्रथम के गुण हैं।”[10]  

    “2. ( अतिरिक्त अर्थात् द्वितीय गुण)

    जहाँ इच्छित (यथेच्छ) बुद्ध क्षेत्र में जन्म, तीनों दुर्गतियों का प्रहाण

    (नाश), शेष अक्षणों का प्रहाण, स्त्री रूप में जन्म की अप्राप्ति, तीक्ष्ण-इन्द्रियत्व तथा त्रिरत्न से अवियोग होता है, वहाँ पर भी समाधि का आनन्द तथा अभिसम्बोधि की प्राप्ति होती है। ये द्वितीय गुण है।”[11]

    विपक्ष एवं समाध्यंग :

    आचार्य बोधिभद्र ने समाधि के गुणों के वर्णन से पूर्व समाधि के विपक्षों के परित्याग करने की बात कही है। समाधि की उत्पत्ति में जो बातें बाधाओं के रूप में आती हैं, वही विपक्ष हैं और उनका परित्याग सम्यक् समाधि के लिये अनिवार्य मानी गई हैं। समाध्यंगों की विपरीत-अवस्था ही विपक्ष होती हैं।

    समाध्यंग एवं उनके विपक्ष का वर्णन आचार्य दीपंकरश्रीज्ञान ने बहुत ही संक्षेप एवं सरल भाषा में अपने द्वारा लिखित समाधि-सम्भार-परवर्त नामक ग्रन्थ में किया है, यथा–

     “शील की सम्पन्नता, भोगों में निरपेक्षता, क्षान्ति, दृढ निश्चय, जन-संसर्ग का परित्याग, काय-वाक्-चित्त में सम्प्रजन्यता, बुद्ध प्रतिमा में अवलम्बित स्मृति के साथ सम्यक् कायानुस्मृति, जिस समय जो कार्य करना उसमें दृढ अनुस्मृति, पञ्चावरणों का प्रहाण, भोजन मात्रा का ज्ञान, उचित आचरण, सभी (प्रकार के) लोकधर्म के प्रति चित्त में सदा उपेक्षाभाव और (उपभोग्य) सामग्रियों की अल्पता–ये (सब) समाधि के अंग हैं।

     (इनके) विपरीतावस्था विपक्ष (कहलाती) हैं।”[12]

    करुणा एवं बोधिचित्त :

    समाधि के अभ्यास के लिये सर्वप्रथम इस परम्परा में करुणामूलक बोधि-

    चित्त की भावना अनिवार्य है। आचार्य कमलशील द्वारा प्रणीत प्रथम भावना-क्रम के प्रारम्भ में ही इस बात को आर्यधर्मसंगीतिसूत्र आदि का उद्धरण देकर स्पष्ट किया गया है, यथा–

     “बुद्ध के अशेष धर्म-हेतुओं का मूल करुणा ही है, ऐसा जानकर सर्वप्रथम उसी की भावना करनी चाहिये। जैसा कि आर्यधर्मसंगीतिसूत्र में कहा गया है–तब बोधिसत्त्व, महासत्त्व आर्य-अवलोकितेश्वर ने भगवान् बुद्ध से यह कहा-भगवन्, बोधिसत्त्व को अनेक धर्मों की शिक्षा नहीं लेनी चाहिये। भगवन्, बोधिसत्त्व द्वारा एक ही धर्म को अच्छी तरह से आराधित और अच्छी तरह से प्रतिविद्ध (ज्ञात) करना चाहिये। (इससे) सभी बुद्ध-धर्म (उसके) करतल  पर विद्यमान हो जाते हैं।

    वह एक धर्म कौन है?

    वह है–महाकरुणा

    भगवन्, महाकरुणा से सभी बुद्ध-धर्म बोधिसत्त्वों के करतल पर स्थित हो जाते हैं। भगवन्, जैसे चक्रवर्ती राजा का चक्ररत्न जहाँ जाता है, वहाँ (उसका) समस्त बलकाय (सेना समूह) जाता है। भगवन्, उसी तरह जहाँ बोधिसत्त्व की करुणा जाती है, वहाँ सभी बुद्ध-धर्म चले जाते हैं। भगवन्, जैसे जीविते-न्द्रिय के रहने पर अन्य इन्द्रियों की प्रवृत्ति होती है, भगवन्, उसी तरह महाकरुणा के होने पर बोधिसत्त्वों के अन्य धर्मों की भी प्रवृत्ति होती है।”[13]

    अतः आचार्य अतीश ने भी समाधि-सम्भार-परिवर्त के प्रथम पाद में ही इस बात को बहुत ही स्पष्ट तौर पर कहा है, यथा–

     “प्रथमतया करुणा के बल से उत्पन्न संबोधिचित्त को दृढ करें। भव (सांसारिक) भोगसुखों में निर्लिप्त तथा परिग्रह से पराङ्मुख हों।

    श्रद्धा आदि धन से सम्पन्न होकर गुरु को बुद्ध के समान समझें। उन (श्रद्धेय

    गुरु) के द्वारा उपदिष्ट समयाचार (अर्थात् विशेष आचरण संहिता) के

    परिपालन करने में (सदा) उद्यत रहें।”[14]

    महायान शरणगमन एवं बोधिचित्तोत्पाद :

    समाधि के लिये करुणापूर्वक सारे कृत्य बोधिसत्त्वों को इष्ट है। इसी करुणा से प्रेरित होकर एक बोधिसत्त्व अहोरात्र कम से कम तीन बार शरणगमन एवं बोधिचित्तोत्पाद में संलग्न होता है, यथा–

    बुद्धं  च  धर्मञ्च  च गणोत्तमं च

    यावद्धि बोधिं शरणं गतोऽस्मि ।

    दानादि-कृत्यैश्च   कृतैर्मयैभिः

    बुद्धो   भवेयं   जगतो   हिताय ।।[15]

    शमथ अथवा समाधि :

    शरणगमनपूर्वक बोधिचित्तोत्पाद सहित शीलों का सम्पूर्णतया पालन करते हुये समाधि अर्थात् शमथ के अभ्यास में लग जाना चाहिये।

    समाधि के अभ्यास से ही धर्मपथ पर सम्यक् रूप से आगे बढा जा सकता है, क्योंकि 37 बोधिपक्षीय धर्मों का प्रारम्भ चार समृत्युपस्थान से ही होता है। इनके विना आगे के धर्म सम्यक्तया प्राप्त नहीं हो सकते। सम्पूर्ण गुण समाधि के बल पर ही उत्पन्न होते हैं। अतः परमपावन दलाई लामा जी बालमतिनयनोन्मीलक सुभाषित नामक ग्रन्थ में इस समाधि के प्रसंग में ऐसा कहते हैं, यथा–

     “अपनी चित्त सन्तति में सर्वप्रथम शमथ उत्पन्न करना चाहिये। और इसके बाद विपश्यना उत्पन्न करनी चाहिये। इसका कारण यह है कि श्रावक, प्रत्येकबुद्ध एवं बोधिसत्त्व इन तीनों यानों में जितने भी गुण कहे गये हैं, वे सब मूलशमथ और मूलविपश्यना भावना के फल हैं, अथवा उपचार शमथ और उपचार-विपश्यना भावना के फल हैं।”[16]

    वास्तव में मूल साधना को तो गुरुमुख से ही जाना जा सकता है, किन्तु यहाँ परिचय के रूप में शमथ एवं विपश्यना के विषय को किञ्चिद् स्पष्ट करने प्रयास किया जा रहा है।

    शमथ, समाधि, आनापान तथा एकाग्रता आदि नाम पर्याय हैं। चित्त की शम (शान्त) अवस्था में स्थापन शमथ कहलाता है। या बाह्य विषयों की ओर जाने वाले विक्षिप्त चित्तों को स्वयं में, भीतर की ओर मोड़ना या उसमें स्थित होना शमथ कहलाता है।

    समाधि का अर्थ स्वमूल में चित्त का स्थापन है।

    आनापान आलम्बनवश नामकरण किया गया है। सांस को आलम्बन में स्थापित कर चित्त-एकाग्र करने की साधना का नाम ही आनापान साधना कहलाता है।

    एकाग्रता शमथ के वास्तविक स्वरूप का आठवाँ क्षण है। या इसे वास्तविक शमथ भी कह सकते हैं, क्योंकि कुशलचित्त की एकाग्रता को ही शमथ कहा गया है। इसी को आधार कर किन्हीं परम्पराओं में एकाग्रता–यह नामकरण बहुत ही प्रचलित है।

    शमथ के विषय में आचार्य कमलशील ने भावनाक्रम में प्रज्ञापारमिता का उद्धरण देते हुए उसकी व्याख्या की है, यथा–

     “जब चित्त उसी आलम्बन में बिना प्रयत्न के जब तक चाहे तब तक प्रवृत्त होने लगे, तब शमथ निष्पन्न हो गया–ऐसे जानना चाहिये। यह सभी शमथों का सामान्य लक्षण है, क्योंकि शमथ का स्वभाव चित्त की एकाग्रता मात्र है। शमथ का आलम्बन तो अनियत ही होता है। शमथ के इस मार्ग का भगवान् ने प्रज्ञापारमिता आदि सूत्रों में निर्देश किया है, जैसा कि–“उस (आलम्बन) में चित्त को 1. स्थापित करता है, 2. संस्थापित करता है, 3. अवस्थापित करता है, 4. उपस्थापित करता है, 5. दमन करता है, 6. शान्त करता है, 7. उपशान्त करता है, 8. एकाग्र करता है, 9. समाहित करता है”–इन नौ पदों द्वारा कहा गया है।”[17]

    “वहाँ 1. स्थापयति का तात्पर्य है–आलम्बन में चित्त का बाँधता है। 2, संस्थापयति का अर्थ है–उसी आलम्बन में चित्त को धारावाहिक रूप में प्रवृत्त करता है। 3. अवस्थापयति का तात्पर्य है–विक्षेप को जानकर उसका परिहार करता है। 4. उपस्थापयति का अर्थ है–विक्षेप का परिहार करके पुनः उसी आलम्बन में आगे-आगे (चित्त) को स्थापित करता है। 5. दमयति का तात्पर्य है–(आलम्बन) में रति (रुचि) को उत्पन्न करता है। 6. शमयति का तात्पर्य है–विक्षेप में दोष देखकर अरति को उपशान्त करता है। 7. व्युपशमयति का तात्पर्य है–उत्थित स्त्यान-मिद्ध आदि (दोषों) को उपशान्त करता है। 8. एकोतीकरोति का तात्पर्य है–आलम्बन में (चित्त को) विना प्रयत्न के प्रवृत्त होते रहने के लिये प्रयास करता है। 9. समादधति का तात्पर्य है–समता प्राप्त चित्त की उपेक्षा करता है, अर्थात् समन्वाहरण करता है।”[18]

    बोधिसत्त्वभूमि के ध्याननिर्देश पटल में कहा गया है–“यह जो कुशल चित्त की एकाग्र स्थिति है, वह ध्यान का स्वभाव है।”[19]

    गम्पोपा ने ध्यान की परिभाषा इस प्रकार कहा है, यथा–शमथ पक्षीय कुशल चित्त की अन्तर्मुख एकाग्रता।

    आचार्य शान्तिदेव ने बोधिचर्यावतार में शमथ एवं विपश्यना के विषय को निम्नप्रकार से प्रतिपादित किया है, यथा–

    शमथेन विपश्यनासुयुक्तः कुरुते क्लेशविनाशमित्यवेत्य ।

    शमथः  प्रथमं गवेषणीयः स च लोके निरपेक्षयाभिरत्या ।।[20]

    इस प्रसंग में भी लोकेनिरपेक्षयाभिरत्या अर्थात् लोक के प्रति निरपेक्ष भाव में अभिरति या रुचि उत्पन्न कर–इसका वास्तविक अर्थ कुशल चित्त की एकाग्रता ही है। यहाँ पर लोक का अर्थ काय है और काय में उत्पन्न जो भी सुख-दुःख आदि वेदनायें हैं, उनके प्रति निरपेक्ष भाव अर्थात् समता चित्त उत्पन्न करने की बात आचार्य जी ने की है। साथ ही शमथ एवं विपश्यना की सुयुक्त अवस्था अर्थात् युगनद्ध अवस्था को क्लेश के विनाश का सही कारण माना है, जो समस्त बौद्ध सम्प्रदायों में समान रूप से प्रचलित है।

    अन्त में इस प्रकार के समाधि के छह दोष हैं और इनके आठ प्रतिपक्ष शास्त्रों में आये हैं। यहाँ पर भावनाक्रम का उद्धरण दिया जा रहा है, जो वास्तव में बहुत ही स्पष्ट एवं समझने योग्य है, यथा–

     “संक्षेप में सभी (प्रकार की) समाधियों के छह दोष होते हैं–1. कोसीद्य, 2. आलम्बन का सम्प्रमोष (विस्मृति), 3. लय, 4. औद्धत्य, 5. अनाभोग और 6. आभोग।

    इनके प्रतिपक्ष के (रूप में) आठ प्रहाण संस्कारों की भावना करनी चाहिये। वे (इस प्रकार) हैं–1. श्रद्धा, 2. छन्द, 3. व्यायाम, 4. प्रश्रब्धि, 5. स्मृति, 6. सम्प्रजन्य, 7. चेतना और 8. उपेक्षा।

    उन (आठ) में प्रथम चार कौसीद्य के प्रतिपक्ष हैं। …आलम्बन के सम्प्रमोष (भूल जाने) का प्रतिपक्ष स्मृति है। सम्प्रजन्य लय एवं औद्धत्य का प्रतिपक्ष है, क्योंकि उस (सम्प्रजन्य) के द्वारा लय और औद्धत्य का सम्यग् ठीक-ठीक परिज्ञान होता है। लय और औद्धत्य का प्रशमन न होने के काल में अनाभोग (प्रयत्न का अभाव) एक दोष है। उसके प्रतिपक्ष (के रूप में) चेतना की भावना करनी चाहिये। लय और औद्धत्य का प्रशमन हो जाने पर जब चित्त प्रशमवाही (अर्थात् शान्त रूप से प्रवृत्त) हो जाता है, तब आभोग (लय और औद्धत्य के प्रहाण के लिये प्रयत्न) एक दोष है, उस (आभोग दोष) के प्रतिपक्ष (के रूप) में उपेक्षा की भावना करनी चाहिये। इन आठ प्रहाण-संस्कारों से समन्वागत समाधि अत्यन्त कर्मण्य होती है और ऋद्धि आदि गुणों का निष्पादन करती है।”[21]

    विपश्यना तो यथाभूतज्ञानदर्शन को कहा जाता है, जो वस्तुओं का वास्तविक स्वरूप है। यही शून्यता है और इसी पद की प्राप्ति पर बोधि सम्पूर्ण होती है। अन्त में, समाधि और साधना ही प्रमुख है, जिसका बहुत संक्षेप में ऊपर चर्चा की गई है। चन्द्रप्रदीपसूत्र का यह अंश साधकों को बहुत ही प्रेरित करता है, अतः इसका स्मरण मोक्षभागीय साधकों को सदा अपने मन में रखना चाहिये, यथा–

    “अन्नेहि   पानेहि   च   चीवरेहि   पुष्पेहि   गन्धेहि   विलेपनेहि ।

    नोपस्थिता भोन्ति नरोत्तमा जिना यथ प्रव्रजित्वा चर्याण धर्मम् ।।5.10।।

    यश्चैव बोधिं प्रतिकाङ्क्षमाणः सत्त्वार्थ निर्विण्णु कुसंस्कृतातः ।

    रण्यामुखः  सप्तपदानि  प्रक्रमे अयं  ततः  पुण्यविशिष्ट  भोति ।।5.11।।

    खाद्य, पेय, वस्त्र, पुष्प, धूप, माला

    आदि के द्वारा बुद्ध के उपासना की

    अपेक्षा जो बोधि की कामना करके

    कलुषित संस्कृत धर्मों से विरक्त हो

    सत्त्वों के हित-सुख के लिय अरण्य में

    वास करने के विचार से सात पग भी

    बढाता है, वह उससे कही अधिक

    विशिष्ट पुण्य का अर्जन करता है।।”[22]

    ।। भवतु सर्वमङ्गलम् ।।



    [1].   अतीशविरचिता एकादशग्रन्थाः (महायानपथसाधनसङ्ग्रहाः); श्लोकसं0–1 །འདས་དང་ད་ལྟར་བདེ་གཤེགས་ཀུན། །སྐྱེད་པའི་ཡབ་དང་ཡུམ་གྱུར་པ། །སྒྲུབ་པའི་ཆོས་ལ་རབ་གུས་ཤིང། །ངག་ཡིད་དང་བས་ཕྱག་འཚལ་ལོ། །ཤོག ༢༣

    [2].   अभिसमयालंकार 1.1

    [3].   1. कामधातु, 2. रूपधातु और 3. अरूपधातु।

    [4].   शून्यता = हेतुप्रत्ययवाद = कार्यकारणतावाद = कर्मफलवाद = प्रतीत्यसमुत्पाद

    [5].   1. मनुष्यगति, 2. देवगति, 3. असुरगति, 4. नरकगति, 5. प्रेतगति एवं 6. तिर्यक्गति

    [6].   सद्धर्मचिन्तामणिमोक्षरत्नालंकार,पृष्ठ–1-2

    [7].   धम्मगीतं, पृ0–101, सङ्गहकारो–सत्य नारायण गोयन्का

    [8].   1. स्रोतापत्ति, 2. सकृदागामी और 3. अनागामी एवं 4. अर्हत्फल

    [9].   बोधिपथप्रदीप), (द्वितीय संस्करण); 3–5; पृ0 3–5

    [10].   समाधिसम्भार-परिवर्त, पृ0–118; प्रकाशक–केन्द्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान, सारनाथ, वाराणसी।द्वितीय संस्करण 2004 ई.;་ དེ་ལྟར་མི་མཐུན་པའི་ཕྱོགས་སྤང་ནས་ཏིང་ངེ་འཛིན་གྱི་ཡོན་ཏན་དྲན་པར་བྱ་སྟེ། དེ་ལ་འདིར་ཡོན་ཏན་ནི་གཉིས་ཏེ། མཐོང་བའི་ཆོས་ཉམས་སུ་མྱོང་བར་འགྱུར་བ་དང་། དེ་ལས་གཞན་པའོ། །ཇི་ལྟར་ཞེ་ན། ལུས་བདེ་བར་གནས་པ་དང་། ངག་བདེ་བར་གནས་པ་དང་། སེམས་བདེ་བར་གནས་པ་དང་། ཆོས་སྐྱོང་བ་རྣམས་དགའ་བ་དང་། དེའི་མི་ལུས་འཐོབ་པ་དོན་ཡོད་པ་དང་། སྟོན་པ་དང་། ཕ་མ་དང་། བླ་མའི་དྲིན་བསབ་པ་དང་། མི་མ་ཡིན་པས་མི་ཚུགས་པ་དང་། ནད་ཉུང་བར་འགྱུར་བ་དང་། ཚེ་རིང་བར་འགྱུར་བ་དང་། འཆི་བའི་དུས་སུ་འགྱོད་པ་མེད་པ་དང་། མཁས་པ་རྣམས་ཀྱི་བསྔགས་པ་དང་། བཟའ་བ་དང་། བཏུང་བ་དང་། གནས་མལ་དང་། ནད་ཀྱི་རྐྱེན་རྩི་དང་གོས་རྣམས་བདེ་བླག་ཏུ་རྙེད་པ་དང་། ཉོན་མོངས་པ་དང་ལས་ལ་གནོད་པར་བྱེད་པ་སྟེ། འདི་དག་ནི་དང་པོའི་ཡོན་ཏན་ནོ། །

    [11].   वही; पृ0–118; གང་དུ་འདོད་པའི་སངས་རྒྱས་ཀྱི་ཞིང་དུ་སྐྱེད་པ་དང་། ངག་སོང་གསུམ་སྤངས་པ་དང་། མི་ཁོམ་པའི་ལྷག་མ་སྤངས་པ་དང་། བུད་མེད་དུ་མི་སྐྱེ་བ་དང་། དབང་པོ་རྣོ་བ་དང་། དཀོན་མཆོག་གསུམ་དང་བྲལ་བར་མི་འགྱུར་བ་དང་། དེར་ཡང་ཏིང་ངེ་འཛིན་ལ་དགའ་བ་དང་། མངོན་པར་རྫོགས་པར་བྱང་ཆུབ་པར་འགྱུར་བ་སྟེ། འདི་ནི་ཡོན་ཏན་གཉིས་པའོ། །ཤོག ༦༠

    [12]. अतीशविरचिता एकादशग्रन्थाः (समाधि-सम्भार-परिवर्त) ; पृ0–166

    [13]. भावनाक्रमः; पृ0–275

    [14]. अतीशविरचिता एकादशग्रन्थाः (समाधि-सम्भार-परिवर्त); पृ0–165

    [15]. वही (बोधिसत्त्वादिकर्मिक-मार्गावतार-देशना); पृ0–82

    [16]. बौद्धसिद्धान्तसार; पृ0–46; द्वितीय संस्करण (सन् 1997 ई.)

    [17]. भावनाक्रमः; पृ0–292

    [18]. वही; पृ0–292

    [19]. कुशलं चित्तैकाग्र्यञ्चित्तस्थिति।; बोधिसत्त्वभूमि; पृ0–143

    [20]. बोधिचर्यावतार; 9.70

    [21]. भावनाक्रमः; पृ0–293

    [22]. सद्धर्मचिन्तामणिमोक्षरत्नालंकार; पृ0–219

  • A brief introduction of Vajrayāna

    वज्रयान का संक्षिप्त परिचय

    डॉ. रमेशचन्द्र नेगी (सहा. प्रोफेसर)
    केन्द्रीय तिब्बती अध्ययन विश्वविद्यालय सारनाथ, वाराणसी

    गुरुर्बुद्धो  गुरुर्धर्मो  गुरुः संघस्तथैव  च ।
    गुरुर्वज्रधरः श्रीमान् तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।[1]

    संसार दुःख है–यहीं से समस्त त्रैकालिक बुद्धों का उपदेश प्रारम्भ होता है। इस भद्रकल्प के चतुर्थ बुद्ध, शाक्यमुनि ने भी प्रथम धर्मचक्र प्रवर्तन के माध्यम से बुद्धों की उसी परम्परा का निर्वाह किया है। यदि हम निष्पक्षतया गम्भीर रूप से परीक्षण करते हैं, तब प्राणियों में दुःख केवल स्थूल रूप में ही नहीं है, अपितु उसका सूक्ष्म, सूक्ष्मतर, सूक्ष्मतम रूप भी द्योतित होता है, जिसे हम वैज्ञानिक पद्धति के द्वारा साक्षात् कर सकते हैं। अतः बहुत से लोग जो बुद्ध के द्वारा सर्वप्रथम दुःख आर्यसत्य की स्थापना को गलत मानते हैं, उन्हें वस्तुस्थिति को समझ कर ही अपना वास्तविक मत को स्थापित करने की चेष्टा करनी चाहिए।   

    समस्त बुद्धों का एकमात्र उद्देश्य तीनों लोकों के समस्त प्राणियों को एकान्ततः दुःखमुक्त कराना है। इसके लिए उन्होंने जिन उपायों का निरुपण किया है, वे बुद्धों द्वारा उपदेशित तीन यानों अथवा तीन मार्गक्रमों के अन्तर्गत पूर्णतया संगृहीत होते हैं। परमार्थतः जिस एकयान की बातें सूत्रों में आती हैं, वह संवृति अथवा व्यवहार में खरा नहीं उतरता है, क्योंकि सत्त्व की रुचि, आशय तथा इन्द्रिय आदि में भेद प्रत्यक्ष ही है। अतः आर्य लङ्कावतारसूत्र में कहा है–

    आतुरे  आतुरे  यद्वद्  भिषग् द्रव्यं प्रयच्छति ।
    बुद्धा हि तद्वत् सत्त्वानां चित्तमात्र वदन्ति वै ।।[2]

    अतः यदि किसी भी एक ऐसे साधक को, जो वास्तव में समस्त प्राणियों के दुःखों को समूल विच्छेद करना चाहता है, उसे यान-व्यवस्था अथवा मार्गक्रम-व्यवस्था को अच्छी तरह समझना ही चाहिए। इससे हम बुद्धों द्वारा उपदेशित समस्त 84,000 धर्म-स्कन्धों को सम्यक् रूप से अच्छी तरह समझ सकते हैं। इनके द्वारा प्राणी निश्चित रूप से दुःख-मुक्ति को प्राप्त कर सकता है।  

    शाक्यमुनि बुद्ध ने 29 वर्ष की आयु में (534 ई0पू0) गृहत्याग किया तथा छह वर्षों तक कठोर तप को करते रहे। किन्तु उन्होंने देखा कि केवल तप के द्वारा चित्त के सम्पूर्ण क्लेशों का शोधन नहीं होता है, इस प्रकार उन्होंने पाया कि मध्यम-मार्ग ही एक ऐसा मार्ग है, जिसके द्वारा प्राणी अपने भीतर के समस्त क्लेशों को बाहर निकाल कर उस अन्तिम पद को प्राप्त कर सकता है, जिसे शास्त्रों में निर्वाण, परिनिर्वाण तथा महासुख आदि विभिन्न प्रकार नामों के द्वारा सम्बोधित किये गये हैं।

    इस प्रकार 35 वर्ष की आयु में (528 ई0पू0) बोधगया में बोधिवृक्ष (पीपल) के पेड़ के नीचे बैशाख पूर्णिमा को उन्होंने सम्बोधि अर्थात् बुद्धत्व को प्राप्त किया। तत्पश्चात् 49 दिनों तक बुद्ध विभिन्न वृक्षों के नीचे समाधि के सुख में तल्लीन रहे और अन्त में देवराज इन्द्र तथा ब्रह्मा के विशेष निवेदन पर संसार के समस्त प्राणियों के कल्याण हेतु उन्होंने धर्मचक्र प्रवर्तन करना स्वीकार किया।

    धर्म का अधिकार पात्रानुसार ही सम्भव होता है। अपात्र को धर्म का वाचन नहीं करना चाहिए यह सभी यानों में समान रूप से कही गई है। इसे हम लोक में भी प्रतिदिन प्रत्यक्ष रूप से देखते हैं, जिस व्यक्ति की रुचि जिस कार्य में है, वह उस कार्य को बहुत ही सुन्दर ढंग तथा सरल तरीके से पूर्ण करता है।

    अतः पात्रता की दृष्टि से उन्होंने सर्वप्रथम कौण्डिन्य आदि उन्हीं पाँच भिक्षुओं को प्रथम धर्मचक्र के उपदेश देने के लिए चुना, जो कुछ समय पूर्व ही उन्हें छोड़कर ऋषिपतन मृगदायवन, सारनाथ में आकर रहने लगे थे। इसके लिए बुद्ध, बोधगया से चलकर ऋषिपतनमृगदायवन, सारनाथ पहुँचे तथा आषाढ़ पूर्णिमा को उन्होंने प्रथम धर्मचक्र का प्रवर्तन किया, जो मुख्यतः चार आर्य सत्य से सम्बद्ध था। वह उपदेशित सूत्र धर्मचक्रप्रवर्तनसूत्र के नामसे सुप्रसिद्ध है। यह सूत्र भगवान् द्वारा उपदेशित प्रथम सूत्र है।  

    जैसे सर्वविदित है, चार आर्य सत्य, दुःख-मुक्ति का आधार स्तम्भ है। इसी आधार पर समस्त अन्य यानों की नींव पड़ी है। यदि कोई साधक चार आर्य सत्य से अवगत नहीं होता, तब वह अज्ञान से बाहर नहीं निकल सकता। बौद्ध सूत्रों और शास्त्रों में अज्ञान का वास्तविक अर्थ चार आर्य सत्य की सम्यक् जानकारी नहीं होना ही कहा गया है। अतः सत्य रूपी तत्त्व का आधारभूत ज्ञान, चार आर्य सत्य होने से इसे प्रथम धर्मचक्र के रूप में माना गया है।  

    द्वितीय धर्मचक्र-प्रवर्तन को अलक्षण-धर्मचक्र अथवा पारमितानय धर्मचक्र  नाम दिया गया है। अलक्षण अर्थात् शून्यता। समस्त धर्मों की शून्यता को ही अलक्षण नाम से सम्बोधित किया गया है। यह सर्वविदित है कि समस्त धर्म प्रतीत्यसमुत्पन्न हैं। समस्त प्रज्ञापारमितासूत्रों में इस शून्यता-भाव को बहुत ही अच्छे तरीके से प्रस्तुत किया गया है। इसलिए यह पारमितानय-धर्मचक्र, द्वितीय धर्मचक्र के नाम से सुविख्यात है।  

    महायान के मतानुसार इसका उपदेश भगवान् तथागत सम्यक् सम्बुद्ध ने प्रथम धर्मचक्र प्रवर्तन के सोलह वर्ष बाद राजगृह के गृध्रकूट पर्वत पर किया था। यह द्वितीय धर्मचक्र, चित्त के विकास का दूसरा चरण है। इसने समस्त संसार को असीम करुणा का विषय बनाया है। यथा आर्य मैत्रेयनाथ रचित अभिसमयालंकार में कहा है–

    चित्तोत्पादः परार्थाय सम्यक्सम्बोधिकामता ।
    समासव्यासतः  सा  च  यथासूत्रं स चोच्यते ।।[3]

    ऐसे ही थेरवाद के मतानुसार भी भगवान् के द्वारा उपदेशित दूसरा सूत्र अनत्तलक्खनसुत्त (अनात्मलक्षणसूत्र) कहलाता है। इसका उपदेश भगवान् ने धर्मचक्रप्रवर्तनसूत्र के उपदेश करने के पाँच दिन बाद पंचवर्गीय भिक्षुओं को किया था। अर्थ की दृष्टि से यह सूत्र भी धर्मों की शून्यता को ही प्रदर्शित करता है। यह सूत्र जो प्रश्नोत्तर रूप में प्राप्त है, एक अति संक्षिप्त सूत्र है।

    इस द्वितीय धर्मचक्र का विषय प्रज्ञापारमितासूत्र के नाम से महायानियों में अत्यन्त प्रसिद्ध है। इस क्रम में शतसाहस्रिकाप्रज्ञापारमिता नामक सूत्र अत्यन्त विस्तृत सूत्र है, जो भोटी भाषा में 12 मोटी जिल्दों में प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार पञ्चविंशतिसाहस्रिका प्रज्ञापारमितासूत्र मध्यम प्रकार का सूत्र है तथा यह तीन मोटी जिल्दों में प्राप्त होते हैं। अष्टसाहस्रिका प्रज्ञापारमितासूत्र लघु पारमितासूत्र कहलाता है और यह एक जिल्द में प्राप्त होता है। इस प्रकार कुछ अन्य लघु पारमितासूत्रों के साथ सभी को मिलाकर इनकी संख्या 17 कही गई है।   

    तृतीय धर्मचक्र प्रवर्तन तन्त्रयान से सम्बन्धित धर्मचक्र है। आर्यसन्धि-निर्मोचनसूत्र के अनुसार तृतीय धर्मचक्र–सुविभाजित धर्मचक्र माना गया है। इसे उन्होंने नीतार्थ धर्मचक्र कहा है। बुद्ध, सर्वज्ञ एवं उपायकौशल्य से युक्त है। साथ ही उनके द्वारा उपदेशित सद्धर्म समस्त विषयों की व्याख्या करता है, इसलिए वज्रयानियों का मानना है कि तन्त्रयान, मन्त्रयान अथवा वज्रयान, अन्तिम अर्थात् तृतीय धर्मचक्र है। यह तन्त्रयान विषय की दृष्टि से गम्भीर तथा विस्तृत है, ऐसा तन्त्र के व्याख्याकारों का कहना है।

    यहाँ प्रसंगवश अन्तिम धर्मचक्र तन्त्रयान, मन्त्रयान अथवा वज्रयान का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया जा रहा है।

    महायानियों में बुद्ध के उपायकौशल्य रूपी गुण की बहुत चर्चा होती है। यह उपायकौशल्य क्या है

    बुद्ध में ऐसे गुण होते हैं, जो नाना प्रकार के पुद्गलों को सम्यक् मार्ग पर क्रमशः आरूढ़ कर सकते हैं। मनुष्य धनी हो या निर्धन, छोटा हो या बड़ा, बुद्धि की दृष्टि से अति तीव्र बुद्धिवाला हो अथवा मन्द बुद्धिमान्, काला हो या गौरा, इस देश का हो या उस देश का, चर्या की दृष्टि से अत्यन्त पतित हो अथवा बहुत उठा हुआ, यहाँ तक कि पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, यूँ कहें कि समस्त ब्रह्माण्ड के सुफल के उपाय का उपदेश करना बुद्धों का कार्य है। अर्थात् उनकी वास्तविक महान्ता धर्मचक्र-प्रवर्तन ही है।

    इसलिए बुद्ध को एक यान तक सीमित करना, बुद्ध के असीमित गुणों की अनदेखी करना है–जैसे बौद्ध अथवा बौद्धेतर बहुत से विद्वान् भी बुद्ध के बारे में अपनी नासमझ के कारण बहुत बार ऐसे वक्त्व्यों को देते दिखाई देते हैं, जिसके द्वारा बुद्ध की स्तुति तो कम, किन्तु निन्दा ज्यादा होती है।

    यह सब बातें बुद्ध के बारे में सम्यक् रूप से नहीं जानने के कारण ही होती है। अतः आवश्यक है कि बुद्ध के धर्म को सम्यक् रूप से जानने के लिए मन्त्रयान, तन्त्रयान अथवा वज्रयान का सहारा लिया जाए।

    इस भद्रकल्प में जिन एक हज़ार बुद्धों आगमन हो रहा है, उनमें शाक्यमुनि बुद्ध, चतुर्थ बुद्ध हैं और पाँचवाँ बुद्ध, आर्य मैत्रेयनाथ कहा गया है। शास्त्रों में कथित है कि इन सभी बुद्धों के शासन में तन्त्रों की देशना होगी ही, यह निश्चित नहीं है। परन्तु शाक्यमुनि बुद्ध के शासन में तन्त्रयान का भी उपदेश हुआ है। इससे महोत्साहवान् भाग्यशाली सत्त्व एक ही जन्म में वज्रधर रूपी बुद्धत्व को प्राप्त कर सकता है। अतः तन्त्र कई अर्थों में नीचे के यानों से विशिष्ट है।

    समय की दृष्टि से अन्तिम होने के कारण यह समझना सरल है कि तन्त्र जैसे गम्भीर धर्म को, हम नीचे के यानों को अच्छी  तरह समझते हुए धीरे-धीरे प्राप्त करते हैं। मार्गक्रम के अनुसार भी यह समझना और सरल है कि चित्त की गम्भीरता क्रमशः आगे बढती है। यही कारण है कि मार्गक्रम सम्बन्धित ग्रन्थोंमें लघुपुरुष आदि की व्याख्या की गई है तथा इसी क्रम में सिद्धान्ततया वैभाषिक आदि चार सिद्धान्तवादियों की चर्चा भी हुई है। इसी अत महत्त्वपूर्ण विषय को हेवज्रतन्त्र बहुत ही सुन्दर रूप में व्याख्या करती है, यथा–

    पोषधं दीयते प्रथमं तदनु शिक्षापदं दशम् ।
    वैभाष्यं  तत्र  देशेत सूत्रान्तं वै पुनस्तथा ।।
    योगाचारं ततः पश्चात् तदनु मध्यमकं दिशेत् ।
    सर्वं   मन्त्रनयं   ज्ञात्वा  तदनु  हेवज्रमारभेत् ।
    गृह्णीयात्  सादरं शिष्यः सिध्यते नात्र संशयः।।[4]

    इस प्रकार तन्त्रयान का आधार भी नीचे के यान तथा दश प्रकार की शिक्षाएँ ही हैं। अतः यानों तथा सिद्धान्तों को एकान्ततः भिन्न मानना सही नहीं है। ये तो ज्ञान अथवा विद्या को प्राप्त करने के क्रम हैं, जो उपर्युक्त श्लोकों में बहुत ही स्पष्ट रूप से कही गई है। अतः कई ऐसे लोग जो तन्त्रयान की निन्दा करते फिरते हैं, उन्हें प्रथम, तन्त्रयान का एक सम्यक् गुरु से अध्ययन तथा अनुशीलन करनी चाहिए तथा तत्पश्चात् उसके खण्डन-मण्डन आदि करने का कार्य करना चाहिए।   

    जो लोग सुविभाजित धर्मचक्र को तृतीय धर्मचक्र के रूप में स्वीकार करते हैं, वे लोग इसका स्थान वैशाली आदि मानते हैं। इनका कहना है कि इसके विनेयजन श्रावक और महायानी दोनों हैं। परन्तु तृतीय क्रम में तन्त्रयान को रखते हैं, तब तन्त्रशास्त्रों के अनुसार श्रीधान्यकटक आदि वह स्थल है, जहाँ बुद्ध ने तन्त्रयान की देशना की है। सिद्ध नरोपा द्वारारचित सेकोद्देश टीका में कहा है–

    गृध्रकूटे   यथा  शास्त्रा  प्रज्ञापारमितानये ।
    तथा मन्त्रनये प्रोक्ता श्रीधान्ये धर्म्मदेशना ।।[5]

    विषय की दृष्टि से जैसे कि ऊपर कहा गया है, तन्त्रयान की देशना को समझना सरल है। किन्तु, क्योंकि तन्त्र वास्तव में अत्यधिक तीव्र बुद्धि वालों का धर्म है, इसलिए इसके शब्दों की व्याख्या गुह्य होने से सामान्य लोग नहीं कर सकते। वास्तव में तन्त्र-परम्परा को जिसने भी सही ढंग से अध्ययन तथा अनुशीलन नहीं किया है, उनके द्वारा तन्त्र की व्याख्या अधिकतर गलत ही की गई है और अन्य लोगों को भी तन्त्रमार्ग से भ्रमित किया है। अतः तन्त्र का अध्ययन इसमें पारंगत वास्तविक गुरु से ही करनी चाहिए, जो बहुत ही आवश्यक है।

    तन्त्र शब्द तनु विस्तारे और त्रै रक्षणे इन दो धातुओं से बना होने के कारण ज्ञान के गहन विस्तार तथा साथ ही चित्त की रक्षा करने के अर्थ में माना गया है। इसलिए तन्यते विस्तार्यते ज्ञानमनेन इति तन्त्रम–ऐसा कहा जाता है।

    बाह्याद्यात्म विषयों की जो वास्तविक व्याख्या हो सकती है, वह तन्त्रयान में आकर अपनी अन्तिम पद को प्राप्त कर लेती है। रूप से लेकर सर्वज्ञता तक की सम्पूर्ण यात्रा तन्त्रयान के ज्ञान विना पूर्ण नहीं होता। यहाँ पर आकर समस्त विकल्प समाप्त हो जाते हैं तथा उपाय तथा प्रज्ञा में एकरूपता स्थापित हो जाती है। इसका फल युगनद्ध अवस्था है। सरल शब्दों में कहें तो उपाय और प्रज्ञा की यात्रा युगनद्ध अवस्था के साथ अवसान को प्राप्त होती है।    

    ।। भवतु सर्वमङ्गलम् ।।[6]


    [1].   बौद्धस्तोत्रसंग्रह (गुरुरत्नत्रयस्तोत्रम्)पृष्ठ–66,प्रकाशक–मोतीलाल बनारसीदास (1994)

    [2].   लङ्कावतारसूत्र 2.123

    [3].   अभिसमयालंकार, 1.19

    [4].   हेवज्रतन्त्रम् 2.8.9-10

    [5].   सेकोद्देश टीका, पृ0–3

    [6].   अतीश

  • Relevance of Buddhist Philosophy

    बौद्ध दर्शन की प्रासंगिकता

    डा. रमेशचन्द्र नेगी (सहा. प्रोफेसर)

    केन्द्रीय तिब्बती अध्ययन विश्वविद्यालय सारनाथ, वाराणसी

    यह संसार संक्षेप में भाजन एवं सत्त्व-लोक, इन दो लोकों में विभाजित है। इसे हम सामान्य भाषा में जड़ एवं चेतन अथवा भौतिक जगत् तथा प्राणी जगत् के नाम से भी जानते हैं।  

    भौतिक जगत् की व्याख्या बाह्य जगत् के रूप में होती है तथा सत्त्व जगत् की व्याख्या आन्तरिक जगत् के रूप में। आज का विज्ञान अधिकतर बाह्य पदार्थों की ही व्याख्या करता है। उन्हीं पर अनुसन्धान तथा अन्वेषण आदि करना, इन वैज्ञानिकों के प्रमुख कार्य हैं।

    किन्तु यदि हम इस संसार के उपर्युक्त दोनों प्रकार के जगत् को सही रूप से समझना चाहते हैं, तब निश्चित रूप से सत्त्व अर्थात् प्राणी जगत् को भी अनिवार्य रूप से महत्त्व देना ही पड़ेगा, क्योंकि यदि विश्व में वास्तविक सुख एवं शान्ति को स्थापित करना चाहते हैं, तब बाह्य जगत् से आन्तरिक जगत् अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

    कारण यह है कि शान्ति अथवा सुख-दुःख आदि आन्तरिक चित्त के ही गुण हैं, न कि बाह्य जगत् के। एक चेतन है और दूसरा जड़। इसीलिए विश्व में आज तक अध्यात्म के क्षेत्र में जो भी लोग उतरे, उन्होंने इस आन्तरिक चित्त को ही अत्यन्त महत्त्व दिया और अपना सम्पूर्ण परिश्रम इसी को समझने और समझाने में लगाया। इसीलिए आचार्य शान्तिदेव (7वीं शती)का कहना है–

    इमं परिकरं सर्वं प्रज्ञार्थं हि मुनिर्जगौ ।

    तस्मादुत्पादयेत् प्रज्ञां दुःखनिवृत्तिकाङ्क्षया ।।[1]

    अर्थात् इन सब सामग्रियों (अर्थात् दानादि पारमिताओं) को मुनि (बुद्ध) ने प्रज्ञा (बोधि) के लिए ही कहा है। अतः दुःख की निवृत्ति की आकांक्षा से प्रज्ञा को उत्पन्न करना चाहिए।

    संसार में नाना प्रकार के मत-मतान्तर सदा से रहे हैं। क्योंकि विकल्पों की संख्या अनन्त है, अतः विश्व में मत-मतान्तरों की संख्या अनन्त हो सकती है। इसीलिए जब तथागत सम्यक् सम्बुद्ध जम्बूद्वीप में उत्पन्न हुए, तब भी नाना प्रकार के सिद्धान्त यहाँ प्रचलित थे, आज भी हैं और भविष्य में भी रहेंगे।

    दीघनिकाय के प्रथम सुत्त ब्रह्मजालसुत्त में 62 प्रकार की मिथ्या दृष्टियों का वर्णन मिलता है।[2] यदि इन मिथ्या दृष्टियों को संक्षिप्त करें, तब ये सब दृष्टियाँ ईश्वरवाद, कर्मवाद और भौतिकवाद अर्थात् चार्वाक का मत, इन तीनों में समाहित हो जाती हैं।

    आज भी, विश्व में जितने भी धर्मानुसरण करने वाले विभिन्न सम्प्रदाय बने हैं, इन सभी में कुछ न कुछ अलग-अलग मत हमें प्राप्त होते ही हैं। यदि हम वैज्ञानिक स्तर पर इन सिद्धान्तों की जाँच करते हैं, तब विश्व के इन नाना प्रकार के सिद्धान्तों में कितने ही ऐसे सिद्धान्त मिलेंगे जो सही नहीं हैं, मिथ्या हैं और प्रत्यक्ष या गौण रूप से वे मत जगत् में अशान्ति को पैदा कर रहे हैं। समस्त जगत् के सुख और दुःख इन मिथ्यादृष्टियों के कारण ही हैं। अज्ञान, विकल्प अथवा मिथ्यादृष्टि इस दुःखापूर्ण (दुःख से पूरी तरह भरे) संसार के मूल हेतु हैं–ऐसा तथागत सम्यक् सम्बुद्ध का कहना है। 

    किन्तु इस वास्तविकता को समझें कैसे?सही बात को समझने के लिए जाँच की पद्धति क्या हो?कौन से ऐसे प्रमाण अथवा परिमाण हैं, जिनके सहारे हम विश्व के अनसुलझे पहलुओं से वास्तविक रूप से अवगत हो सकते हैं?सार रूप में अज्ञान को अज्ञान रूप में जानने की वास्तविक पद्धति क्या हो?उपाय तथा मार्ग क्या हो?

    बौद्धधर्म, सम्यक् धर्म अथवा सद्धर्म के विकास के लिए, उपाय रूपी यह दुःखनिरोधगामिनी प्रतिपदा आर्यसत्य रूपी मार्ग–एक प्रमुख पहलू है। इसमें दृष्टि (दर्शन) का स्थान प्रमुख है और दृष्टि के भ्रमित होने पर सम्पूर्ण मार्ग से ही दिग्भ्रमित होने का डर सदा बना रहता है।

    अतः आचार्य नरोपा (1066-1100 ई0) का कहना है कि दर्शन की शुद्धि होने पर भावना की शुद्धि होती है तथा भावना की शुद्धि होने पर चर्या की शुद्धि। अतएव अष्टांगिक मार्ग के प्रतिपादन में भगवान् ने सम्यक् दृष्टि को प्रथम अंग के रूप में स्वीकार किया है तथा सम्यक् दृष्टि और सम्यक् संकल्प को प्रज्ञा का ही रूप माना है। यथा तथागत सम्यक् सम्बुद्ध ने कहा है–

    यो चायं कामेसु कामसुखल्लिकानुयोगो हीनो गम्मो पोथुज्जनिको अनिरयो अनत्थसंहितो, यो चायं अत्तकिलमथानुयोगो दुक्खो अनरियो अनत्थसंहितो एते ते उभो अन्ते अनुपगम्म मज्झिमा पटिपदा तथागतेन अभिसंबुद्धा चक्खुकरणी ञाणकरणी उपसमाय अभिञ्ञाय सम्बोधाय निब्बानाय संवत्तति। अयमेव अरियो अट्ठंगिको मग्गो दुक्खनिरोधगामिनी पटिपदा सेय्यथीदं–1. सम्मादिट्ठि, 2. सम्मासंकप्पो, 3. सम्मावाचा, 4. सम्माकम्मन्तो, 5. सम्माआजीवो, 6. सम्मावायामो, 7. सम्मासति, 8. सम्ममासमाधि।[3]    

    आज विश्व में जितने भी धर्म सम्प्रदाय हैं, उन सबका कहना है कि वे सब प्राणियों के सुख के लिए ही कार्य कर रहे हैं। सबकी अपनी-अपनी अलग शास्ता है तथा वे उनके बताये अनुसार चलने की कोशिश भी करते हैं। किन्तु इन सब में बुद्ध अप्रतिम हैं, यह प्रत्यक्ष ही है।

    तत्कालीन भारत में जो कुरीतियाँ थी तथा धर्म के नाम पर जो हिंसा की जा रही थी, इनके निवारण के लिए बुद्ध के समान ही एक महान् पुरुष की अनिवार्यता उस समय अपेक्षित थी। अतः सौभाग्य से ई0 पू0 563 में शाक्य-मुनि बुद्ध ने जन्म लिया। यह जन्म विश्वकल्याण के लिए ही था। इसीलिए धम्मपद में कहा है–

    सुखो बुद्धानां उत्पादः सुखा सद्धर्मदेशना ।

    सुखा संघस्य सामग्री समग्राणां तपः सुखम् ।।[4]

    बुद्धों का जन्म सुखदायक है, सद्धर्म की देशना सुखदायक है, संघ की एकता सुखदायक है और सुखकर है मिलकर तप करना।  

    कुमार सिद्धार्थ ने अपने 29वें वर्ष में वैराग्य-भाव से गृहत्याग किया तथा छह वर्षों तक कठिन तपस्या की। उन्होंने तत्कालीन ज्ञान की जितनी परम्पराएँ थी, उन सबका अवलोकन किया तथा प्रयोग करने के बाद जब उन मार्गों से सन्तुष्ट नहीं हुए, तब उन्होंने एक विशेष साधना का अभ्यास किया तथा उसी के बल पर उन्होंने अपने 35वें वर्ष में बोधगया में बोधिवृक्ष के नीचे वैशाख पूर्णिमा को रात्रि के अन्तिम याम में बुद्धत्व प्राप्त किया।

    उन्होंने वज्रोपम समाधि के द्वारा सम्पूर्ण विश्व की वास्तविकता का साक्षात्कार किया। प्रतीत्यसमुत्पाद को अनुलोम तथा प्रतिलोम रूप से सम्यक् अवगम कर जीवन के आवागमन को सम्पूर्ण रूप से समझा और स्वयं बोधि को प्राप्त हुए। तब वे बुद्ध बन गये। बुद्ध बनने के बाद का उनका प्रथम उद्बोधन सभी साधकों को सदा प्रेरणा देता रहा है, यथा–

    अनेकजातिसंसारं सन्धाविस्सं अनिब्बिसं।

    गहकारकं गवेसन्तो दुक्खा जाति पुनप्पुनं।।[5]

    अर्थात् गृहकारक को ढूंढते हुए मैं अनेक जन्मों तक निरन्तर संसार में दौड़ता रहा। बारम्बार जन्म लेना दुःख है।

    गहकारक! दिट्ठोसि पुन गेहं न काहसि।

    सब्बा ते फासुका भग्गा गहकूटं विसङ्खितं।

    विसङ्खारगतं चित्तं तण्हानं खयमज्झगा।।[6]

    गृहकारक! तू दिखाई दे गया। अब दुबारा घर नहीं बना सकेगा। तेरी सब कड़ियाँ टूट गई। घर का शिखर बिखर गया। चित्त संस्कार-रहित हो गया। तृष्णाओं का क्षय हो गया। 

    यह प्रतीत्यसमुत्पाद अर्थात् कर्मफल का सम्यक् प्रतिपादन ही, बुद्ध की वास्तविक विशिष्टता है। प्रासंगिकता इसी विशिष्ट पद्धति में है तथा बौद्ध दर्शन की प्रासंगिकता इसी विशेष प्रसंग में सन्निहित होती है। इस विशिष्ट पद्धति के कारण ही तथागत सम्यक् सम्बुद्ध द्वारा उपदेशित धर्म विश्व में एक अलग पहचान रखता है तथा यह बौद्धधर्म, बोधिधर्म अथवा सद्धर्म के नाम से विश्वविख्यात् है। इसीलिए जब अश्वजित से सारिपुत्र ने बुद्ध के मत का सार-

    संक्षेप बताने के लिए कहा, तब उन्होंने इसी प्रतीत्यसमुत्पाद को विशिष्ट माना तथा इस प्रतीत्यसमुत्पाद-मन्त्र को उन्हें सार रूप में कहा, यथा–

    ये धर्मा हेतुप्रभवा हेतुं तेषां तथागतो ह्यवदत्।

    तेषां च यो निरोधः एवंवादी महाश्रमणः।।[7]

    ज्ञान की प्राप्ति सम्यक् दृष्टि पर निर्भर है और यह प्रमाण की पद्धति से उत्तरोत्तर आगे बढ़ती है। चाहे बाह्य जगत् के विकास की बात हो अथवा आन्तरिक जगत् का विकास की, दोनों के लिए प्रमाण द्वारा परीक्षा अनिवार्य हो जाती है। इसीलिए तथागत सम्यक् सम्बुद्ध का कहना है–

    तापाच्छेदाच्च निकषात् सुवर्णमिव पण्डितः।

    परीक्ष्य भिक्षवो ग्राह्यं मद्वचो न तु गौरवात्।।[8]

    जिस प्रकार शुद्ध सुवर्ण की पहचान के लिए उसे 1. जलाया जाता है, 2. काटा जाता है तथा 3. रगड़ा जाता है, ऐसे ही बुद्ध ने अपने द्वारा बताई गयी बातों को भी परीक्षा कर ही स्वीकार करने की बात कही है।

    भगवान् की यह एक ऐसी उद्घोषणा है, जिसे मानव समाज की उन्नति का बहूमूल्य सूत्र कहा जा सकता है। संसार के किसी भी शास्ता ने इतनी बड़ी उद्घोषणा नहीं की है।  

    परीक्षा अर्थात् जाँच-पड़ताल की क्रिया ही हमें अज्ञान रूपी अन्धकार से बाहर निकाल सकती है। और इसी प्रक्रिया के द्वारा प्रतीत्यसमुत्पाद के सही अर्थ को हम समझ सकते हैं। तथागत सम्यक् सम्बुद्ध तो समस्त अज्ञानी प्राणियों को इस दुःख रूपी संसार से तारने वाले हैं, तारक हैं, तायी हैं, शरणदाता हैं, नाथ हैं।

    अतः वे कभी भी अन्धानुकरण के पक्षपाती नहीं हो सकते, अन्ध श्रद्धा के पक्षपाती नहीं हो सकते। विश्व का कल्याण धर्मों के सम्यक् प्रकाशन में छिपा है तथा सम्यक् प्रकाशन वास्तविक परीक्षा के द्वारा प्रतीत्यसमुत्पाद को समझने में है। यह शाश्वतवाद तथा उच्छेदवाद का अन्त है, जो केवल बुद्ध के उपदेश में ही परिलक्षित होता है। अतः बौद्धधर्म की प्रासंगिकता विश्व कल्याण हेतु अपनी प्रामाणिकता के कारण तीनों कालों में एक समान है।

    और विशेष रूप से वर्तमान वैश्विक अशान्ति के दौर में यह आवश्यक ही नहीं, अपितु अनिवार्य जान पड़ता है।

    यत्किञ्चिद् जगतो दुःखं तत् सर्वं मयि पच्यताम् ।

    बोधिसत्त्वशुभैः सर्वैर्जगत् सुखितमस्तु च ।।

    जगद्दुःखैकभैषज्यं सर्वसम्पत्सुखाकरम् ।

    लाभसत्कारसहितं चिरं तिष्ठतु शासनम् ।।

    मञ्जुघोषं नमस्यामि यत्प्रसादान्मतिः शुभे ।

    कल्याणमित्रं वन्देऽहं यत्प्रसादाच्च वर्धते ।।[9]

    ।।भवतु सर्वमङ्गलम् ।।


    [1].   बोधिचर्यावतार, 9.1

    [2].   The All-Embracing Net of Views p. 65, Pub. by Buddhist Publication Society Kandy, Sri Lanka (1978)

    [3].   सच्चसंगहो पृ0–35, संयुत्त निकाय का उद्धरण। प्रका0–बौद्ध भारती वाराणसी, सन् 1991 

    [4].   धम्मपद, 14.16 

    [5].   धम्मपद, 11.8 

    [6].   धम्मपद, 11.9 

    [7].   यह प्रतीत्यसमुत्पाद-मन्त्र विश्व में सबसे अधिक लिखे जाने वाले मन्त्रों में एक है और यह थेरवाद से लेकर वज्रयान परम्परा में सर्वधिक प्रचलित मन्त्र है।   

    [8].   ज्ञानसारसमुच्चय, 31 

    [9].   बोधिचर्यावतार, 10.56-58

  • Marpa, the founder of Kagyudpa

    भूमिका[1]

    भोटदेशीय बौद्धों में चार महान् सम्प्रदाय प्रसिद्ध हैं। इनमें काग्युद् सम्प्रदाय काल की दृष्टि से 11वीं शती में अस्तित्व में आया है तथा इसका क्रम दूसरा है। इस सम्प्रदाय के संस्थापक मर्-पा लो-च़ा-वा छोस्-की लो-डोस् (1012-1097 ई.)[2] हैं, जिनका च़ङ्-ञोन् हेरुक द्वारा लिखित जीवन-वृत्तान्त, यहाँ हिन्दी-अनुवाद के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

    आठवीं शती में भारतीय उपाध्याय शान्तरक्षित, आचार्य पद्म-सम्भव तथा तिब्बत के तत्कालीन धर्मराज ठिस्रोङ् देहुच़न (718-785 ई.) के समय, तिब्बत में प्रथम बार एक भव्य बौद्ध-सम्-यस् विहार[3] का निर्माण कर भोट में बौद्धधर्म की सर्वप्रथम आधार शिला रखी गई, यह प्रारम्भिक धर्म तिब्बत में ञिङ्-मा (प्राचीनक) नाम से प्रसिद्ध हुआ।  

    तीसरा सम्प्रदाय साक्या है। यह साक्या सम्प्रदाय खोन कोन्-छोग् ग्यल्-पो के द्वारा सन् 1073 ई. में वज्रासन रूपी श्रीसाक्या के महान् विद्यापीठ के निर्माण से प्रारम्भ हुआ। अतः यह सम्प्रदाय खोन् कोन्-छोग् ग्यल्-पो द्वारा स्थापित किया गया है। स-छेन कुन्-गाह् ञिङ्पो, लोब्-पोन् सोद्-नम्स च़े-मो और डग्स-पा ग्यल्-छ़न् आदि परमपावन साक्यापा के गुरुओं के द्वारा इस सम्प्रदाय का विकास सम्भव हुआ है।  

    चतुर्थ जे-च़ोङ्-ख-पा लो-ज़ङ् डग्स-पा (1357-1419 ई.) के द्वारा स्थापित धर्म गे-लुग्स नाम से प्रसिद्ध है। वैसे यह सम्प्रदाय पूर्व में का-दम्स नाम से प्रचलित था, जो आचार्य दीपङ्कर-श्रीज्ञान के गृहस्थ शिष्य डोम्-तोन्-पा ग्यल्-वई जुङ्-नस् से प्रारम्भ हुआ था। यही कारण है कि इतिहासकार, डोम्-तोन् से लेकर जे-च़ोङ्-खा-पा के पहले की परम्परा को प्राचीन का-दम्स (का-दम्स ञिङ्-पा) तथा जे-च़ोङ्-खा-पा के बाद की परम्परा, जिसे आज गे-लुग्स नाम से जाना जाता है, इसे नवीन कादम (का-दम्स सर्-मा) के नाम से अभिहित करते हैं।

    उपर्युक्त ये चार सम्प्रदाय तिब्बती बौद्धों में बहुत अच्छी तरह स्थापित हैं और इन्हीं सम्प्रदायों से निकले बहुत से उपसम्प्रदाय भी वहाँ अस्तित्व में हैं। ये सारे सम्प्रदाय किसी न किसी भारतीय आचार्य से सम्प्रसारित है और सारी परम्परायें शुद्ध भारतीय परम्परा से ही जुड़ती हैं। इसलिये कुछ लोग जो तिब्बती भोट-बौद्धधर्म में लामावाद आदि दोषों को देखने का प्रयास करते हैं, उन्हें अपने भोट-इतिहास से सम्बद्ध सामान्य ज्ञान को दुरुस्त करने का प्रयास करना चाहिये।  

    च़ङ्-ञोन् हेरुक द्वारा लिखित मरपा की इस जीवनी के अनुसार भट्टारक मरपा चार (4) बार नेपाल तथा तीन (3) बार भारत आये। इन यात्राओं में उन्होंने अपने अध्ययन को आगे बढाया तथा उसे गम्भीर अध्ययन में परिवर्तित किया। यही नहीं नेपाल और भारत में अध्ययन के बाद आपने गुह्यवज्रयान में अधिकार को प्राप्त कर लिया। इन यात्राओं में भट्टारक मरपा ने जिन विशिष्ट ग्रन्थों का अध्ययन किया उनका विवरण यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा हैᅳ

    मरपा लोच़ावा छोस्-की लो-डोस् ने तीन बार भारत की शैक्षणिक यात्रा की और तन्त्र के गम्भीर ग्रन्थों का अध्ययन ही नहीं किया, अपितु उनका अभ्यास कर अभिसमय (ज्ञान) की भी प्राप्ति की। भारत के तत्कालीन महान् गुरुओं के सान्निध्य में रहकर श्रवण-चिन्तन और मनन परम्परा में पारंगत हुये तथा साथ ही तन्त्र के उत्पन्नक्रम तथा सम्पन्नक्रम की भावना में भी पारंगतता को हासिल की।  

    भारत यात्रा के बीज का प्रकाशन उनके मन में मुख्य रूप से भोट गुरु, जो स्वयं अनुवादक ही थे, ने डाला जिनका नाम डोग्-मी लोच़ावा शाक्य येशे (992-1074) कहा गया है। भट्टारक मरपा उनके सान्निध्य में तीन (3) साल तक रहे थे और भारतीय भाषा (मुख्य रूप से संस्कृत) से सम्बन्धित अनुवाद को सीखा था।

    तन्त्र के गम्भीर ग्रन्थों को भी भट्टारक मरपा अपने अनुवादक गुरु से सीखना चाहते थे, लेकिन पूर्वकर्मों के संस्कारवश यह उनके भाग्य में नहीं लिखा था। तब गुरु को शुभ विदाई देकर भट्टारक मरपा, आर्यदेश भारत आने की तैयारी में जुट गये तथा अन्त में ञोस् लोच़ावा के साथ बाह्यतः गुरु और सेवक के रूप में भारत के लिये प्रस्थान किये।

    प्रथम बार के भारत आगमन पर नेपाल में अध्ययन किये ग्रन्थों का विवरण :

    भारत में क्योंकि काफी अधिक गर्मी पड़ती है, इसका विपरीत असर न पड़े, वे लगभग दो वर्ष पर्यन्त नेपाल, काठमाण्डु में ही बिताये। यहाँ पर उन्हें संयोगवश दो नेपाली गुरु मिले, जिनका नाम 1. चिथेरवा तथा 2. पेन्तावा कहा गया है।  

    इन दो वर्षों में वे गुरु जो अपने नेपाली शिष्यों को पढाते थे, उनमें भट्टारक मरपा सम्मिलित हुए और जो अध्यापन इन गुरुओं ने इस प्रवास के दौरान किया, उन ग्रन्थों का नामᅳगुह्यसमाज, श्रीचतुष्पीठ और संक्रमणोपदेश कहा गया है। क्योंकि ये दोनों गुरु भी भारतीय आचार्य नरोपा के ही शिष्य थे, अतः इन दो गुरुओं ने भट्टारक मरपा को पत्र सहित सही समय आने पर भारत में नरोपा के पास भेजा।

    प्रथम बार के भारत आगमन पर भट्टारक मरपा द्वारा अध्ययन किये ग्रन्थों का विवरण :

    सिद्ध नरोपा से मिलने के बाद सर्वप्रथम गुरु ने उन्हें श्रीहेवज्र-तन्त्र का अध्यापन कराया, जो नरोपा का प्रमुख साधना-ग्रन्थ हुआ करता था। तत्पश्चात् नरोपा ने ही मरपा को वज्रपञ्जर तथा सम्पुट का भी अध्यापन कराया।

    इसके पश्चात् जब मरपा ने श्रीगुह्यसमाज को अनुवादक ञोस् की प्रेरणा से पुनः पढ़ने का निश्चय किया तो इस विशेष ग्रन्थ के पढने के लिये शिष्य मरपा को इन्होंने आचार्य ज्ञानगर्भ के पास भेजा। आचार्य ज्ञानगर्भ ने इन्हें सम्पूर्ण गुह्यसमाज को बहुत अच्छी तरह पढाया और मरपा तब इस विषय में अनुवादक ञोस् से भी आगे बढ़ गये।

    नरोपा की ही प्रेरणा से मरपा आचार्य शान्तभद्र अथवा कुकुरिपा के पास चले आये और उनसे महामाया का भी अध्ययन किया। इसके साथ ही कुकुरिपा ने मरपा को महामूकता तथा लघुमूकता आदि विशेष साधनाओं का भी अभ्यास कराया। बाद में नरोपा से भी एक बार महामाया का अध्ययन करने की बात ठग्-थुङ् ग्यल्-पो रचित जीवनी में कही गई है।  

    आचार्य शान्तभद्र तथा भट्टारक नरोपा के अध्यापन में अर्थ की दृष्टि से बहुत बड़ा अन्तर नहीं होने पर भी नरोपा के अध्ययन में शब्दों का विस्तार अधिक था। तब मर्-पा ने नरोपा से कहा कि ʽआप इतने पारंगत होते हुए भी महामाया के लिये उस (सुदूर) समुद्री द्वीप में भेजकर इतना कष्ट क्यों दिया?ʼ तब नरोपा का कहना थाᅳʽवे मातृतन्त्र के अधिपति हैं। अतः उपदेश में नियत-बुद्धि तथा स्रोत की प्रामाणिकता के लिये भेजा था।ʼ[4]

    तत्पश्चात् मरपा दक्षिण से वापस लौटे और इसके बाद नरोपा ने गुरु मरपा को मैत्रीपा के दर्शन की अनुमति दी। आचार्य मैत्रीपा ने सर्वप्रथम इन्हें महामुद्रा का उपदेश दिया। इसके बाद आर्यमञ्जुश्री-नाम-संगीति का भी अध्यापन किया। सम्पूर्ण बौद्ध शास्त्रों में यही एक ऐसा ग्रन्थ है, जिसके पाठ मात्र से पुद्गल अन्तिम अवस्था अर्थात् बोधि को प्राप्त कर सकता है।

    कहा जाता है कि तिब्बत के 11वीं शती के ही बहुत बड़े अनुवादक लोच़ावा रिन्छेन ज़ङपो (958-1055 ई.) ने इस नामसंगीति का भोटी और संस्कृत दोनों में एक-एक लाख बार पाठ किया था। इस अवसर पर मैत्रीपा ने स्वयं के द्वारा रचित द्वादशो-पदेश-वज्रगीत का भी मरपा को अध्ययन कराया।

    इसी क्रम में ज्ञानड़ाकिनी से चतुष्पीठ को पढने की बात भी इस मरपा-वृत्तान्त में स्पष्ट हुआ है और मरपा स्वयं के द्वारा गाये गये

    एक गीति में एक रात स्वप्न में सिद्ध सरहपाद से अमनस्कार[5]

    भावना को श्रवण करने की बात भी कही है।  

    बाद में नरोपा ने मरपा को अपने छह धर्मों (नरोपा का षड्योग)[6] का भी अध्यापन तथा अभ्यास कराया। इस अवसर पर भट्टारक मरपा ने प्रकृति स्वरूप सहज ज्ञान-मुद्रा से भी परिचय प्राप्त किया तथा चण्डाली भावना में विशेष रूप से अधिकार प्राप्त किया।

    द्वितीय बार के भारत आगमन पर भट्टारक मरपा द्वारा अध्ययन किये ग्रन्थों का विवरण :

    भट्टारक मरपा सदा ज्ञान के प्रति समर्पित थे, अतः उन्होंने दूसरी बार भी भारत की शैक्षणिक यात्रा की। इस द्वितीय बार की भारत प्रवास के दौरान सर्वप्रथम नरोपा से हेवज्र का अभिषेक प्राप्त किया। तत्पश्चात् नरोपा ने मरपा को हेवज्रमूलतन्त्र, डाकिनी-वज्रपञ्जरतन्त्र, व्याख्यातन्त्र तथा सम्पुटतन्त्र का अध्यापन किया। बाद में पुनः नरोपा द्वारा इन्द्रभूति की परम्परा का चक्र-संवर, सरह की परम्परा का बुद्धकपाल-तन्त्र-व्याख्या-विधि, कागज़-पिण्डोपदेश, गुह्यसमाज-अद्वय-समता-विजय तथा प्रदीपो-द्योतन-नाम-टीका नामक ग्रन्थों को पढ़ाने का भी वर्णन हुआ है।

    इस द्वितीय बार की यात्रा में मरपा ने मैत्रीपा से गुह्यसमाज-अभिषेक, गुह्यसमाज-टीका, महामुद्राबिन्दुतन्त्र, मूलततन्त्र हेवज्रतन्त्र, विशिष्ट व्याख्यातन्त्र, डाकिनी वज्रगीत, सामान्य व्याख्यातन्त्र सम्पुट की टीका आदि का भी अध्ययन किया। इस यात्रा के दौरान मरपा ने विस्तृत, मध्य तथा लघु हेवज्र के अभिषेकों को भी प्राप्त किया।

    भट्टारक मरपा की शैक्षणिक यात्रा यहीं नहीं रुकी। आपने तीसरी बार भी आर्यदेश भारत की यात्रा की, क्योंकि उन्होंने अपने गुरु भट्टारक नरोपा के सम्मुख पूर्व में पुनः भारत आकर एक बार मिलने के लिये प्रतिज्ञा की थी। इस यात्रा के लिये माँ दग्-मेद्-मा एवं शिष्यों ने काफी बाधा उपस्थित की। उन लोगों का यह कहना था कि ‘अब आप वृद्ध हो चुके हैं और भारत जाना इस अवस्था में खतरे से खाली नहीं है।’ लेकिन एक सच्चे शिष्य को अपनी प्रतिज्ञा तोड़ना अत्यन्त स्वीकार नहीं था। अतः वे तीसरी बार की यात्रा के लिये भोट से भारत के लिये निकल पड़े।

    उनके इस यात्रा के दौरान आचार्य दीपङ्करश्रीज्ञान भोटदेश पधार रहे थे, अतः ऊपरी ञङ् के शेङ्स लङ्-पो-ना में उनसे मुलाकात भी हुई। आचार्य अतीश से ही उनको भट्टारक नरोपा के विशेष चर्या में जाने की बात मालूम हुई और इसी कारण भट्टारक मरपा से मिलने में कठिनाई को जानते हुए उन्होंने भट्टारक मरपा को अपने अनुवादक के रूप में भोट वापस चलने के लिये कहा। क्योंकि भट्टारक मरपा ने अपने गुरु के सम्मुख एक बार पुनः दर्शन करने की प्रतिज्ञा की थी, इसी प्रतिज्ञा के स्मरण के कारण उन्होंने अनुवादक के रूप में आने में असमर्थता व्यक्त की और अपनी तीसरी बार की भारत यात्रा को जारी रखा।

    भारत पहुँचने के बाद भट्टारक मरपा ने गुरु के दर्शन के लिये अपना प्रयास जारी रखा और इस दौरान उन्होंने विशेष गणचक्र-पूजाओं सहित गुरु-अध्येषणा-अभ्यास के साथ गुरु के अन्वेषण में लगे रहे। इस दौरान उन्हें जो आभास प्रकट हुये वे सभी मार्ग की उच्च अवस्था प्राप्त को ही सम्भव होते हैं और हर विशेष अध्येषणा के बाद उनके अभिसमय में विशेष बढ़ोत्तरी भी होती रही और अन्त में आठ (8) महीने बाद गुरु ने उनको कृपापूर्वक अपना दर्शन दिया। इसी दौरान विशेष वार्ता में भट्टारक नरोपा द्वारा भट्टारक मि-ला रस्-पा के प्रति अपना विशेष नमन करने की बात का ज़िक्र भी इस प्रसंग में हुआ है।

    तत्पश्चात् भट्टारक नरोपा ने भट्टारक मरपा को पूर्व में किसी में भी अप्रचलित विशेषता वाले संवर-डाकिनी-कर्णतन्त्र का उपदेश किया। इस तृतीय बार के उपदेश का ज़िक्र इसी ग्रन्थ में निम्न प्रकार से उक्त है, यथाᅳ

    ʽʽद्वाषष्टि संवर,[7] त्रयोदशी, पञ्चमी-देव तथा सहज आदि का अभिषेक धूलि-वर्ण-मण्डल के माध्यम से प्रदान किया। गुरु के काय-वाक्-चित्त-मण्डल के आश्रय से संकेत-अभिषेक और उपदेशों को पूर्णतया प्रदान कर नरोपा ने कहाᅳ‛इन विशिष्ट उपदेशों को देखते हो तो तुम्हें जो पूर्व में उपदेश दिए गए थे, वह सब बाहरी छिलके के समान हैं।[8] सारों का सार रूपी यह श्रेष्ठ उपदेश तेरह (13) सन्ततियों तक एक परम्परा हेतु ही अनुमति प्राप्त है। तुम इसे थोस्-पा-गाह् नामक उस विनेयजन को दे देना। इससे कर्म का विस्तार होगा। क्या यह पूर्व से भिन्न है या नहीं?ʼʼ

    इस तीसरी बार की यात्रा के दौरान नरोपा के द्वारा धर्म के कई मर्म भट्टारक मरपा से कहे गये तथा षड्-धर्म का मर्म (नामक) वज्रगीत एवं भविष्यवाणी गीत आदि का भी भट्टारक नरोपा ने भट्टारक मरपा के सम्मुख वर्णन किया है, वे वास्तव में ही अपूर्व हैं। इसके बाद अनुवादक मरपा, नेपाल होते हुये तिब्बत सकुशल लौटे और मार्ग में भी कई वज्रगीत अपने समान परम्परा वालों के लिये गाये जो एक सम्यक् वज्रयानी गुरु के लक्षण को दर्शाते हैं।  

    ।। भवतु सर्वमङ्गलम् ।।


    [1]. इस हिन्दी भूमिका में प्रमुख रूप से भट्टारक मरपा ने किन-किन गुरुओं के सान्निध्य में रहकर किन-किन विशिष्ट तान्त्रिक ग्रन्थों का अध्ययन किया था, यहाँ इस पर विशेष रूप से प्रकाश डालने का प्रयास किया जा रहा है। यान की दृष्टि से वज्रयान अन्तिम यान है, अतः मरपा द्वारा अध्ययन किये ग्रन्थों से तन्त्रग्रन्थों के अध्ययन-क्रम सहित तत्कालीन अध्ययन-परम्परा का भी हम लोग अनुमान लगा सकते हैं।  

    [2]. भोटदेश के अधिकतर इतिहासकार मरपा लोच़ावा की आयु उपर्युक्त तिथि को ही मानते हैं। लेकिन ठग्-थुङ् ग्यल्-पो द्वारा रचित इस हिन्दी अनूदित जीवनी (मर्-पा लो-च़ई नम्-थर, थोङ्-वा दोन्-योद्) में 1005-1093 ई. कहा गया है, जो शोध का विषय है।

    [3]. ʽʽइस प्रकार उपाध्याय शान्तरक्षित, आचार्य पद्मसम्भव और सम्राट ठि-स्रोङ् दे-च़न की परिणामना फलित हुई तथा वे सभी एक मंच पर एक ही कार्य हेतु उपस्थित हुए। सद्धर्म की दीर्घ-स्थिति के लिए प्रारूप तैयार किया गया। इसके परिणामस्वरूप सम्-यस् विहार की स्थापना की गई जो भारत के औदन्तपुरी विहार का ही दूसरा रूप था। भूमि-परीक्षण आदि कार्य उपाध्याय ने किया तथा तत्सम्बन्धित भूमि-विधि आदि को आचार्य पद्मसम्भव ने पूर्ण किया। इसकी आधारशिला मे-मो-योस् वर्ष में प्रारम्भ की गई तथा यह 13 वर्ष बाद स-मो-योस् वर्ष में बनकर तैयार हुआ।ʼʼᅳपद्ममाकरपो-विरचिता पूर्वयोग-टिप्पणी (भूमिका), पृ. 55

    [4]. पद्माकरपो-विरचिता पूर्वयोग-टिप्पणी, भूमिका, पृ. 77. प्रकाशकᅳ केन्द्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा-संस्थान, सारनाथ, वाराणसी (1996 ई.)  

    [5]. अमनस्कार का अर्थ मनस्करण नहीं करना भी है और साथ ही का अर्थ शून्यता करने पर शून्यता का मनस्करण करना भी होता है। यह दोनों ही अर्थ वास्तविक भावना के समय विरुद्ध नहीं हैं। लेकिन कुछ भोट विद्वानों ने अमनस्कार-भावना का खण्डन भी किया है। खण्डन का मुख्य कारण अमनस्कार को उच्छेदान्त के रूप में मानना है, जो कि सही नहीं है। इस खण्डन-मण्डन के लिये द्वग्सपो टशी नम्-ग्यल् द्वारा रचित छग्-छेन् दावाई होद्-ज़ेर का अवलोकन कर सकते हैं। यह महामुद्राग्रन्थ अंग्रेजी में भी अनूदित है, जो महामुद्रा नाम से ही प्रकाशित है।   

    [6]. नरोपा का षड्योगᅳ1. चण्डाली, 2. मायाकाय, 3. स्वप्न, 4. प्रभास्वर, 5. संक्रान्ति तथा 6. अन्तराभव।

    [7].     दो प्रधान युगनद्ध, चार हृदय-योगिनी, चार द्वारपालिका, चार सीमन्तिनी, चौबीस वीर एवं चौबीस वीरनी (-वीरेश्वरी)ᅳ६२ संवर।

    [8].     न किञ्चिदस्तीक्षुत्वचा हि सारः।।

    प्रियो रसोऽभ्यन्तर एव तिष्ठेत् त्वचं विमुज्येक्षुरसो नरेण।

    न शक्यते स्वादयितुं हि लब्ध्वा।

    अतीशविरचिताश्चर्यागीत्याद्यष्टग्रन्थाः (शोधप्रबन्ध), पृ०ᅳ१८०