Category: Buddhist Philosophy

  • A brief introduction of Vajrayāna

    वज्रयान का संक्षिप्त परिचय

    डॉ. रमेशचन्द्र नेगी (सहा. प्रोफेसर)
    केन्द्रीय तिब्बती अध्ययन विश्वविद्यालय सारनाथ, वाराणसी

    गुरुर्बुद्धो  गुरुर्धर्मो  गुरुः संघस्तथैव  च ।
    गुरुर्वज्रधरः श्रीमान् तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।[1]

    संसार दुःख है–यहीं से समस्त त्रैकालिक बुद्धों का उपदेश प्रारम्भ होता है। इस भद्रकल्प के चतुर्थ बुद्ध, शाक्यमुनि ने भी प्रथम धर्मचक्र प्रवर्तन के माध्यम से बुद्धों की उसी परम्परा का निर्वाह किया है। यदि हम निष्पक्षतया गम्भीर रूप से परीक्षण करते हैं, तब प्राणियों में दुःख केवल स्थूल रूप में ही नहीं है, अपितु उसका सूक्ष्म, सूक्ष्मतर, सूक्ष्मतम रूप भी द्योतित होता है, जिसे हम वैज्ञानिक पद्धति के द्वारा साक्षात् कर सकते हैं। अतः बहुत से लोग जो बुद्ध के द्वारा सर्वप्रथम दुःख आर्यसत्य की स्थापना को गलत मानते हैं, उन्हें वस्तुस्थिति को समझ कर ही अपना वास्तविक मत को स्थापित करने की चेष्टा करनी चाहिए।   

    समस्त बुद्धों का एकमात्र उद्देश्य तीनों लोकों के समस्त प्राणियों को एकान्ततः दुःखमुक्त कराना है। इसके लिए उन्होंने जिन उपायों का निरुपण किया है, वे बुद्धों द्वारा उपदेशित तीन यानों अथवा तीन मार्गक्रमों के अन्तर्गत पूर्णतया संगृहीत होते हैं। परमार्थतः जिस एकयान की बातें सूत्रों में आती हैं, वह संवृति अथवा व्यवहार में खरा नहीं उतरता है, क्योंकि सत्त्व की रुचि, आशय तथा इन्द्रिय आदि में भेद प्रत्यक्ष ही है। अतः आर्य लङ्कावतारसूत्र में कहा है–

    आतुरे  आतुरे  यद्वद्  भिषग् द्रव्यं प्रयच्छति ।
    बुद्धा हि तद्वत् सत्त्वानां चित्तमात्र वदन्ति वै ।।[2]

    अतः यदि किसी भी एक ऐसे साधक को, जो वास्तव में समस्त प्राणियों के दुःखों को समूल विच्छेद करना चाहता है, उसे यान-व्यवस्था अथवा मार्गक्रम-व्यवस्था को अच्छी तरह समझना ही चाहिए। इससे हम बुद्धों द्वारा उपदेशित समस्त 84,000 धर्म-स्कन्धों को सम्यक् रूप से अच्छी तरह समझ सकते हैं। इनके द्वारा प्राणी निश्चित रूप से दुःख-मुक्ति को प्राप्त कर सकता है।  

    शाक्यमुनि बुद्ध ने 29 वर्ष की आयु में (534 ई0पू0) गृहत्याग किया तथा छह वर्षों तक कठोर तप को करते रहे। किन्तु उन्होंने देखा कि केवल तप के द्वारा चित्त के सम्पूर्ण क्लेशों का शोधन नहीं होता है, इस प्रकार उन्होंने पाया कि मध्यम-मार्ग ही एक ऐसा मार्ग है, जिसके द्वारा प्राणी अपने भीतर के समस्त क्लेशों को बाहर निकाल कर उस अन्तिम पद को प्राप्त कर सकता है, जिसे शास्त्रों में निर्वाण, परिनिर्वाण तथा महासुख आदि विभिन्न प्रकार नामों के द्वारा सम्बोधित किये गये हैं।

    इस प्रकार 35 वर्ष की आयु में (528 ई0पू0) बोधगया में बोधिवृक्ष (पीपल) के पेड़ के नीचे बैशाख पूर्णिमा को उन्होंने सम्बोधि अर्थात् बुद्धत्व को प्राप्त किया। तत्पश्चात् 49 दिनों तक बुद्ध विभिन्न वृक्षों के नीचे समाधि के सुख में तल्लीन रहे और अन्त में देवराज इन्द्र तथा ब्रह्मा के विशेष निवेदन पर संसार के समस्त प्राणियों के कल्याण हेतु उन्होंने धर्मचक्र प्रवर्तन करना स्वीकार किया।

    धर्म का अधिकार पात्रानुसार ही सम्भव होता है। अपात्र को धर्म का वाचन नहीं करना चाहिए यह सभी यानों में समान रूप से कही गई है। इसे हम लोक में भी प्रतिदिन प्रत्यक्ष रूप से देखते हैं, जिस व्यक्ति की रुचि जिस कार्य में है, वह उस कार्य को बहुत ही सुन्दर ढंग तथा सरल तरीके से पूर्ण करता है।

    अतः पात्रता की दृष्टि से उन्होंने सर्वप्रथम कौण्डिन्य आदि उन्हीं पाँच भिक्षुओं को प्रथम धर्मचक्र के उपदेश देने के लिए चुना, जो कुछ समय पूर्व ही उन्हें छोड़कर ऋषिपतन मृगदायवन, सारनाथ में आकर रहने लगे थे। इसके लिए बुद्ध, बोधगया से चलकर ऋषिपतनमृगदायवन, सारनाथ पहुँचे तथा आषाढ़ पूर्णिमा को उन्होंने प्रथम धर्मचक्र का प्रवर्तन किया, जो मुख्यतः चार आर्य सत्य से सम्बद्ध था। वह उपदेशित सूत्र धर्मचक्रप्रवर्तनसूत्र के नामसे सुप्रसिद्ध है। यह सूत्र भगवान् द्वारा उपदेशित प्रथम सूत्र है।  

    जैसे सर्वविदित है, चार आर्य सत्य, दुःख-मुक्ति का आधार स्तम्भ है। इसी आधार पर समस्त अन्य यानों की नींव पड़ी है। यदि कोई साधक चार आर्य सत्य से अवगत नहीं होता, तब वह अज्ञान से बाहर नहीं निकल सकता। बौद्ध सूत्रों और शास्त्रों में अज्ञान का वास्तविक अर्थ चार आर्य सत्य की सम्यक् जानकारी नहीं होना ही कहा गया है। अतः सत्य रूपी तत्त्व का आधारभूत ज्ञान, चार आर्य सत्य होने से इसे प्रथम धर्मचक्र के रूप में माना गया है।  

    द्वितीय धर्मचक्र-प्रवर्तन को अलक्षण-धर्मचक्र अथवा पारमितानय धर्मचक्र  नाम दिया गया है। अलक्षण अर्थात् शून्यता। समस्त धर्मों की शून्यता को ही अलक्षण नाम से सम्बोधित किया गया है। यह सर्वविदित है कि समस्त धर्म प्रतीत्यसमुत्पन्न हैं। समस्त प्रज्ञापारमितासूत्रों में इस शून्यता-भाव को बहुत ही अच्छे तरीके से प्रस्तुत किया गया है। इसलिए यह पारमितानय-धर्मचक्र, द्वितीय धर्मचक्र के नाम से सुविख्यात है।  

    महायान के मतानुसार इसका उपदेश भगवान् तथागत सम्यक् सम्बुद्ध ने प्रथम धर्मचक्र प्रवर्तन के सोलह वर्ष बाद राजगृह के गृध्रकूट पर्वत पर किया था। यह द्वितीय धर्मचक्र, चित्त के विकास का दूसरा चरण है। इसने समस्त संसार को असीम करुणा का विषय बनाया है। यथा आर्य मैत्रेयनाथ रचित अभिसमयालंकार में कहा है–

    चित्तोत्पादः परार्थाय सम्यक्सम्बोधिकामता ।
    समासव्यासतः  सा  च  यथासूत्रं स चोच्यते ।।[3]

    ऐसे ही थेरवाद के मतानुसार भी भगवान् के द्वारा उपदेशित दूसरा सूत्र अनत्तलक्खनसुत्त (अनात्मलक्षणसूत्र) कहलाता है। इसका उपदेश भगवान् ने धर्मचक्रप्रवर्तनसूत्र के उपदेश करने के पाँच दिन बाद पंचवर्गीय भिक्षुओं को किया था। अर्थ की दृष्टि से यह सूत्र भी धर्मों की शून्यता को ही प्रदर्शित करता है। यह सूत्र जो प्रश्नोत्तर रूप में प्राप्त है, एक अति संक्षिप्त सूत्र है।

    इस द्वितीय धर्मचक्र का विषय प्रज्ञापारमितासूत्र के नाम से महायानियों में अत्यन्त प्रसिद्ध है। इस क्रम में शतसाहस्रिकाप्रज्ञापारमिता नामक सूत्र अत्यन्त विस्तृत सूत्र है, जो भोटी भाषा में 12 मोटी जिल्दों में प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार पञ्चविंशतिसाहस्रिका प्रज्ञापारमितासूत्र मध्यम प्रकार का सूत्र है तथा यह तीन मोटी जिल्दों में प्राप्त होते हैं। अष्टसाहस्रिका प्रज्ञापारमितासूत्र लघु पारमितासूत्र कहलाता है और यह एक जिल्द में प्राप्त होता है। इस प्रकार कुछ अन्य लघु पारमितासूत्रों के साथ सभी को मिलाकर इनकी संख्या 17 कही गई है।   

    तृतीय धर्मचक्र प्रवर्तन तन्त्रयान से सम्बन्धित धर्मचक्र है। आर्यसन्धि-निर्मोचनसूत्र के अनुसार तृतीय धर्मचक्र–सुविभाजित धर्मचक्र माना गया है। इसे उन्होंने नीतार्थ धर्मचक्र कहा है। बुद्ध, सर्वज्ञ एवं उपायकौशल्य से युक्त है। साथ ही उनके द्वारा उपदेशित सद्धर्म समस्त विषयों की व्याख्या करता है, इसलिए वज्रयानियों का मानना है कि तन्त्रयान, मन्त्रयान अथवा वज्रयान, अन्तिम अर्थात् तृतीय धर्मचक्र है। यह तन्त्रयान विषय की दृष्टि से गम्भीर तथा विस्तृत है, ऐसा तन्त्र के व्याख्याकारों का कहना है।

    यहाँ प्रसंगवश अन्तिम धर्मचक्र तन्त्रयान, मन्त्रयान अथवा वज्रयान का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया जा रहा है।

    महायानियों में बुद्ध के उपायकौशल्य रूपी गुण की बहुत चर्चा होती है। यह उपायकौशल्य क्या है

    बुद्ध में ऐसे गुण होते हैं, जो नाना प्रकार के पुद्गलों को सम्यक् मार्ग पर क्रमशः आरूढ़ कर सकते हैं। मनुष्य धनी हो या निर्धन, छोटा हो या बड़ा, बुद्धि की दृष्टि से अति तीव्र बुद्धिवाला हो अथवा मन्द बुद्धिमान्, काला हो या गौरा, इस देश का हो या उस देश का, चर्या की दृष्टि से अत्यन्त पतित हो अथवा बहुत उठा हुआ, यहाँ तक कि पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, यूँ कहें कि समस्त ब्रह्माण्ड के सुफल के उपाय का उपदेश करना बुद्धों का कार्य है। अर्थात् उनकी वास्तविक महान्ता धर्मचक्र-प्रवर्तन ही है।

    इसलिए बुद्ध को एक यान तक सीमित करना, बुद्ध के असीमित गुणों की अनदेखी करना है–जैसे बौद्ध अथवा बौद्धेतर बहुत से विद्वान् भी बुद्ध के बारे में अपनी नासमझ के कारण बहुत बार ऐसे वक्त्व्यों को देते दिखाई देते हैं, जिसके द्वारा बुद्ध की स्तुति तो कम, किन्तु निन्दा ज्यादा होती है।

    यह सब बातें बुद्ध के बारे में सम्यक् रूप से नहीं जानने के कारण ही होती है। अतः आवश्यक है कि बुद्ध के धर्म को सम्यक् रूप से जानने के लिए मन्त्रयान, तन्त्रयान अथवा वज्रयान का सहारा लिया जाए।

    इस भद्रकल्प में जिन एक हज़ार बुद्धों आगमन हो रहा है, उनमें शाक्यमुनि बुद्ध, चतुर्थ बुद्ध हैं और पाँचवाँ बुद्ध, आर्य मैत्रेयनाथ कहा गया है। शास्त्रों में कथित है कि इन सभी बुद्धों के शासन में तन्त्रों की देशना होगी ही, यह निश्चित नहीं है। परन्तु शाक्यमुनि बुद्ध के शासन में तन्त्रयान का भी उपदेश हुआ है। इससे महोत्साहवान् भाग्यशाली सत्त्व एक ही जन्म में वज्रधर रूपी बुद्धत्व को प्राप्त कर सकता है। अतः तन्त्र कई अर्थों में नीचे के यानों से विशिष्ट है।

    समय की दृष्टि से अन्तिम होने के कारण यह समझना सरल है कि तन्त्र जैसे गम्भीर धर्म को, हम नीचे के यानों को अच्छी  तरह समझते हुए धीरे-धीरे प्राप्त करते हैं। मार्गक्रम के अनुसार भी यह समझना और सरल है कि चित्त की गम्भीरता क्रमशः आगे बढती है। यही कारण है कि मार्गक्रम सम्बन्धित ग्रन्थोंमें लघुपुरुष आदि की व्याख्या की गई है तथा इसी क्रम में सिद्धान्ततया वैभाषिक आदि चार सिद्धान्तवादियों की चर्चा भी हुई है। इसी अत महत्त्वपूर्ण विषय को हेवज्रतन्त्र बहुत ही सुन्दर रूप में व्याख्या करती है, यथा–

    पोषधं दीयते प्रथमं तदनु शिक्षापदं दशम् ।
    वैभाष्यं  तत्र  देशेत सूत्रान्तं वै पुनस्तथा ।।
    योगाचारं ततः पश्चात् तदनु मध्यमकं दिशेत् ।
    सर्वं   मन्त्रनयं   ज्ञात्वा  तदनु  हेवज्रमारभेत् ।
    गृह्णीयात्  सादरं शिष्यः सिध्यते नात्र संशयः।।[4]

    इस प्रकार तन्त्रयान का आधार भी नीचे के यान तथा दश प्रकार की शिक्षाएँ ही हैं। अतः यानों तथा सिद्धान्तों को एकान्ततः भिन्न मानना सही नहीं है। ये तो ज्ञान अथवा विद्या को प्राप्त करने के क्रम हैं, जो उपर्युक्त श्लोकों में बहुत ही स्पष्ट रूप से कही गई है। अतः कई ऐसे लोग जो तन्त्रयान की निन्दा करते फिरते हैं, उन्हें प्रथम, तन्त्रयान का एक सम्यक् गुरु से अध्ययन तथा अनुशीलन करनी चाहिए तथा तत्पश्चात् उसके खण्डन-मण्डन आदि करने का कार्य करना चाहिए।   

    जो लोग सुविभाजित धर्मचक्र को तृतीय धर्मचक्र के रूप में स्वीकार करते हैं, वे लोग इसका स्थान वैशाली आदि मानते हैं। इनका कहना है कि इसके विनेयजन श्रावक और महायानी दोनों हैं। परन्तु तृतीय क्रम में तन्त्रयान को रखते हैं, तब तन्त्रशास्त्रों के अनुसार श्रीधान्यकटक आदि वह स्थल है, जहाँ बुद्ध ने तन्त्रयान की देशना की है। सिद्ध नरोपा द्वारारचित सेकोद्देश टीका में कहा है–

    गृध्रकूटे   यथा  शास्त्रा  प्रज्ञापारमितानये ।
    तथा मन्त्रनये प्रोक्ता श्रीधान्ये धर्म्मदेशना ।।[5]

    विषय की दृष्टि से जैसे कि ऊपर कहा गया है, तन्त्रयान की देशना को समझना सरल है। किन्तु, क्योंकि तन्त्र वास्तव में अत्यधिक तीव्र बुद्धि वालों का धर्म है, इसलिए इसके शब्दों की व्याख्या गुह्य होने से सामान्य लोग नहीं कर सकते। वास्तव में तन्त्र-परम्परा को जिसने भी सही ढंग से अध्ययन तथा अनुशीलन नहीं किया है, उनके द्वारा तन्त्र की व्याख्या अधिकतर गलत ही की गई है और अन्य लोगों को भी तन्त्रमार्ग से भ्रमित किया है। अतः तन्त्र का अध्ययन इसमें पारंगत वास्तविक गुरु से ही करनी चाहिए, जो बहुत ही आवश्यक है।

    तन्त्र शब्द तनु विस्तारे और त्रै रक्षणे इन दो धातुओं से बना होने के कारण ज्ञान के गहन विस्तार तथा साथ ही चित्त की रक्षा करने के अर्थ में माना गया है। इसलिए तन्यते विस्तार्यते ज्ञानमनेन इति तन्त्रम–ऐसा कहा जाता है।

    बाह्याद्यात्म विषयों की जो वास्तविक व्याख्या हो सकती है, वह तन्त्रयान में आकर अपनी अन्तिम पद को प्राप्त कर लेती है। रूप से लेकर सर्वज्ञता तक की सम्पूर्ण यात्रा तन्त्रयान के ज्ञान विना पूर्ण नहीं होता। यहाँ पर आकर समस्त विकल्प समाप्त हो जाते हैं तथा उपाय तथा प्रज्ञा में एकरूपता स्थापित हो जाती है। इसका फल युगनद्ध अवस्था है। सरल शब्दों में कहें तो उपाय और प्रज्ञा की यात्रा युगनद्ध अवस्था के साथ अवसान को प्राप्त होती है।    

    ।। भवतु सर्वमङ्गलम् ।।[6]


    [1].   बौद्धस्तोत्रसंग्रह (गुरुरत्नत्रयस्तोत्रम्)पृष्ठ–66,प्रकाशक–मोतीलाल बनारसीदास (1994)

    [2].   लङ्कावतारसूत्र 2.123

    [3].   अभिसमयालंकार, 1.19

    [4].   हेवज्रतन्त्रम् 2.8.9-10

    [5].   सेकोद्देश टीका, पृ0–3

    [6].   अतीश

  • Relevance of Buddhist Philosophy

    बौद्ध दर्शन की प्रासंगिकता

    डा. रमेशचन्द्र नेगी (सहा. प्रोफेसर)

    केन्द्रीय तिब्बती अध्ययन विश्वविद्यालय सारनाथ, वाराणसी

    यह संसार संक्षेप में भाजन एवं सत्त्व-लोक, इन दो लोकों में विभाजित है। इसे हम सामान्य भाषा में जड़ एवं चेतन अथवा भौतिक जगत् तथा प्राणी जगत् के नाम से भी जानते हैं।  

    भौतिक जगत् की व्याख्या बाह्य जगत् के रूप में होती है तथा सत्त्व जगत् की व्याख्या आन्तरिक जगत् के रूप में। आज का विज्ञान अधिकतर बाह्य पदार्थों की ही व्याख्या करता है। उन्हीं पर अनुसन्धान तथा अन्वेषण आदि करना, इन वैज्ञानिकों के प्रमुख कार्य हैं।

    किन्तु यदि हम इस संसार के उपर्युक्त दोनों प्रकार के जगत् को सही रूप से समझना चाहते हैं, तब निश्चित रूप से सत्त्व अर्थात् प्राणी जगत् को भी अनिवार्य रूप से महत्त्व देना ही पड़ेगा, क्योंकि यदि विश्व में वास्तविक सुख एवं शान्ति को स्थापित करना चाहते हैं, तब बाह्य जगत् से आन्तरिक जगत् अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

    कारण यह है कि शान्ति अथवा सुख-दुःख आदि आन्तरिक चित्त के ही गुण हैं, न कि बाह्य जगत् के। एक चेतन है और दूसरा जड़। इसीलिए विश्व में आज तक अध्यात्म के क्षेत्र में जो भी लोग उतरे, उन्होंने इस आन्तरिक चित्त को ही अत्यन्त महत्त्व दिया और अपना सम्पूर्ण परिश्रम इसी को समझने और समझाने में लगाया। इसीलिए आचार्य शान्तिदेव (7वीं शती)का कहना है–

    इमं परिकरं सर्वं प्रज्ञार्थं हि मुनिर्जगौ ।

    तस्मादुत्पादयेत् प्रज्ञां दुःखनिवृत्तिकाङ्क्षया ।।[1]

    अर्थात् इन सब सामग्रियों (अर्थात् दानादि पारमिताओं) को मुनि (बुद्ध) ने प्रज्ञा (बोधि) के लिए ही कहा है। अतः दुःख की निवृत्ति की आकांक्षा से प्रज्ञा को उत्पन्न करना चाहिए।

    संसार में नाना प्रकार के मत-मतान्तर सदा से रहे हैं। क्योंकि विकल्पों की संख्या अनन्त है, अतः विश्व में मत-मतान्तरों की संख्या अनन्त हो सकती है। इसीलिए जब तथागत सम्यक् सम्बुद्ध जम्बूद्वीप में उत्पन्न हुए, तब भी नाना प्रकार के सिद्धान्त यहाँ प्रचलित थे, आज भी हैं और भविष्य में भी रहेंगे।

    दीघनिकाय के प्रथम सुत्त ब्रह्मजालसुत्त में 62 प्रकार की मिथ्या दृष्टियों का वर्णन मिलता है।[2] यदि इन मिथ्या दृष्टियों को संक्षिप्त करें, तब ये सब दृष्टियाँ ईश्वरवाद, कर्मवाद और भौतिकवाद अर्थात् चार्वाक का मत, इन तीनों में समाहित हो जाती हैं।

    आज भी, विश्व में जितने भी धर्मानुसरण करने वाले विभिन्न सम्प्रदाय बने हैं, इन सभी में कुछ न कुछ अलग-अलग मत हमें प्राप्त होते ही हैं। यदि हम वैज्ञानिक स्तर पर इन सिद्धान्तों की जाँच करते हैं, तब विश्व के इन नाना प्रकार के सिद्धान्तों में कितने ही ऐसे सिद्धान्त मिलेंगे जो सही नहीं हैं, मिथ्या हैं और प्रत्यक्ष या गौण रूप से वे मत जगत् में अशान्ति को पैदा कर रहे हैं। समस्त जगत् के सुख और दुःख इन मिथ्यादृष्टियों के कारण ही हैं। अज्ञान, विकल्प अथवा मिथ्यादृष्टि इस दुःखापूर्ण (दुःख से पूरी तरह भरे) संसार के मूल हेतु हैं–ऐसा तथागत सम्यक् सम्बुद्ध का कहना है। 

    किन्तु इस वास्तविकता को समझें कैसे?सही बात को समझने के लिए जाँच की पद्धति क्या हो?कौन से ऐसे प्रमाण अथवा परिमाण हैं, जिनके सहारे हम विश्व के अनसुलझे पहलुओं से वास्तविक रूप से अवगत हो सकते हैं?सार रूप में अज्ञान को अज्ञान रूप में जानने की वास्तविक पद्धति क्या हो?उपाय तथा मार्ग क्या हो?

    बौद्धधर्म, सम्यक् धर्म अथवा सद्धर्म के विकास के लिए, उपाय रूपी यह दुःखनिरोधगामिनी प्रतिपदा आर्यसत्य रूपी मार्ग–एक प्रमुख पहलू है। इसमें दृष्टि (दर्शन) का स्थान प्रमुख है और दृष्टि के भ्रमित होने पर सम्पूर्ण मार्ग से ही दिग्भ्रमित होने का डर सदा बना रहता है।

    अतः आचार्य नरोपा (1066-1100 ई0) का कहना है कि दर्शन की शुद्धि होने पर भावना की शुद्धि होती है तथा भावना की शुद्धि होने पर चर्या की शुद्धि। अतएव अष्टांगिक मार्ग के प्रतिपादन में भगवान् ने सम्यक् दृष्टि को प्रथम अंग के रूप में स्वीकार किया है तथा सम्यक् दृष्टि और सम्यक् संकल्प को प्रज्ञा का ही रूप माना है। यथा तथागत सम्यक् सम्बुद्ध ने कहा है–

    यो चायं कामेसु कामसुखल्लिकानुयोगो हीनो गम्मो पोथुज्जनिको अनिरयो अनत्थसंहितो, यो चायं अत्तकिलमथानुयोगो दुक्खो अनरियो अनत्थसंहितो एते ते उभो अन्ते अनुपगम्म मज्झिमा पटिपदा तथागतेन अभिसंबुद्धा चक्खुकरणी ञाणकरणी उपसमाय अभिञ्ञाय सम्बोधाय निब्बानाय संवत्तति। अयमेव अरियो अट्ठंगिको मग्गो दुक्खनिरोधगामिनी पटिपदा सेय्यथीदं–1. सम्मादिट्ठि, 2. सम्मासंकप्पो, 3. सम्मावाचा, 4. सम्माकम्मन्तो, 5. सम्माआजीवो, 6. सम्मावायामो, 7. सम्मासति, 8. सम्ममासमाधि।[3]    

    आज विश्व में जितने भी धर्म सम्प्रदाय हैं, उन सबका कहना है कि वे सब प्राणियों के सुख के लिए ही कार्य कर रहे हैं। सबकी अपनी-अपनी अलग शास्ता है तथा वे उनके बताये अनुसार चलने की कोशिश भी करते हैं। किन्तु इन सब में बुद्ध अप्रतिम हैं, यह प्रत्यक्ष ही है।

    तत्कालीन भारत में जो कुरीतियाँ थी तथा धर्म के नाम पर जो हिंसा की जा रही थी, इनके निवारण के लिए बुद्ध के समान ही एक महान् पुरुष की अनिवार्यता उस समय अपेक्षित थी। अतः सौभाग्य से ई0 पू0 563 में शाक्य-मुनि बुद्ध ने जन्म लिया। यह जन्म विश्वकल्याण के लिए ही था। इसीलिए धम्मपद में कहा है–

    सुखो बुद्धानां उत्पादः सुखा सद्धर्मदेशना ।

    सुखा संघस्य सामग्री समग्राणां तपः सुखम् ।।[4]

    बुद्धों का जन्म सुखदायक है, सद्धर्म की देशना सुखदायक है, संघ की एकता सुखदायक है और सुखकर है मिलकर तप करना।  

    कुमार सिद्धार्थ ने अपने 29वें वर्ष में वैराग्य-भाव से गृहत्याग किया तथा छह वर्षों तक कठिन तपस्या की। उन्होंने तत्कालीन ज्ञान की जितनी परम्पराएँ थी, उन सबका अवलोकन किया तथा प्रयोग करने के बाद जब उन मार्गों से सन्तुष्ट नहीं हुए, तब उन्होंने एक विशेष साधना का अभ्यास किया तथा उसी के बल पर उन्होंने अपने 35वें वर्ष में बोधगया में बोधिवृक्ष के नीचे वैशाख पूर्णिमा को रात्रि के अन्तिम याम में बुद्धत्व प्राप्त किया।

    उन्होंने वज्रोपम समाधि के द्वारा सम्पूर्ण विश्व की वास्तविकता का साक्षात्कार किया। प्रतीत्यसमुत्पाद को अनुलोम तथा प्रतिलोम रूप से सम्यक् अवगम कर जीवन के आवागमन को सम्पूर्ण रूप से समझा और स्वयं बोधि को प्राप्त हुए। तब वे बुद्ध बन गये। बुद्ध बनने के बाद का उनका प्रथम उद्बोधन सभी साधकों को सदा प्रेरणा देता रहा है, यथा–

    अनेकजातिसंसारं सन्धाविस्सं अनिब्बिसं।

    गहकारकं गवेसन्तो दुक्खा जाति पुनप्पुनं।।[5]

    अर्थात् गृहकारक को ढूंढते हुए मैं अनेक जन्मों तक निरन्तर संसार में दौड़ता रहा। बारम्बार जन्म लेना दुःख है।

    गहकारक! दिट्ठोसि पुन गेहं न काहसि।

    सब्बा ते फासुका भग्गा गहकूटं विसङ्खितं।

    विसङ्खारगतं चित्तं तण्हानं खयमज्झगा।।[6]

    गृहकारक! तू दिखाई दे गया। अब दुबारा घर नहीं बना सकेगा। तेरी सब कड़ियाँ टूट गई। घर का शिखर बिखर गया। चित्त संस्कार-रहित हो गया। तृष्णाओं का क्षय हो गया। 

    यह प्रतीत्यसमुत्पाद अर्थात् कर्मफल का सम्यक् प्रतिपादन ही, बुद्ध की वास्तविक विशिष्टता है। प्रासंगिकता इसी विशिष्ट पद्धति में है तथा बौद्ध दर्शन की प्रासंगिकता इसी विशेष प्रसंग में सन्निहित होती है। इस विशिष्ट पद्धति के कारण ही तथागत सम्यक् सम्बुद्ध द्वारा उपदेशित धर्म विश्व में एक अलग पहचान रखता है तथा यह बौद्धधर्म, बोधिधर्म अथवा सद्धर्म के नाम से विश्वविख्यात् है। इसीलिए जब अश्वजित से सारिपुत्र ने बुद्ध के मत का सार-

    संक्षेप बताने के लिए कहा, तब उन्होंने इसी प्रतीत्यसमुत्पाद को विशिष्ट माना तथा इस प्रतीत्यसमुत्पाद-मन्त्र को उन्हें सार रूप में कहा, यथा–

    ये धर्मा हेतुप्रभवा हेतुं तेषां तथागतो ह्यवदत्।

    तेषां च यो निरोधः एवंवादी महाश्रमणः।।[7]

    ज्ञान की प्राप्ति सम्यक् दृष्टि पर निर्भर है और यह प्रमाण की पद्धति से उत्तरोत्तर आगे बढ़ती है। चाहे बाह्य जगत् के विकास की बात हो अथवा आन्तरिक जगत् का विकास की, दोनों के लिए प्रमाण द्वारा परीक्षा अनिवार्य हो जाती है। इसीलिए तथागत सम्यक् सम्बुद्ध का कहना है–

    तापाच्छेदाच्च निकषात् सुवर्णमिव पण्डितः।

    परीक्ष्य भिक्षवो ग्राह्यं मद्वचो न तु गौरवात्।।[8]

    जिस प्रकार शुद्ध सुवर्ण की पहचान के लिए उसे 1. जलाया जाता है, 2. काटा जाता है तथा 3. रगड़ा जाता है, ऐसे ही बुद्ध ने अपने द्वारा बताई गयी बातों को भी परीक्षा कर ही स्वीकार करने की बात कही है।

    भगवान् की यह एक ऐसी उद्घोषणा है, जिसे मानव समाज की उन्नति का बहूमूल्य सूत्र कहा जा सकता है। संसार के किसी भी शास्ता ने इतनी बड़ी उद्घोषणा नहीं की है।  

    परीक्षा अर्थात् जाँच-पड़ताल की क्रिया ही हमें अज्ञान रूपी अन्धकार से बाहर निकाल सकती है। और इसी प्रक्रिया के द्वारा प्रतीत्यसमुत्पाद के सही अर्थ को हम समझ सकते हैं। तथागत सम्यक् सम्बुद्ध तो समस्त अज्ञानी प्राणियों को इस दुःख रूपी संसार से तारने वाले हैं, तारक हैं, तायी हैं, शरणदाता हैं, नाथ हैं।

    अतः वे कभी भी अन्धानुकरण के पक्षपाती नहीं हो सकते, अन्ध श्रद्धा के पक्षपाती नहीं हो सकते। विश्व का कल्याण धर्मों के सम्यक् प्रकाशन में छिपा है तथा सम्यक् प्रकाशन वास्तविक परीक्षा के द्वारा प्रतीत्यसमुत्पाद को समझने में है। यह शाश्वतवाद तथा उच्छेदवाद का अन्त है, जो केवल बुद्ध के उपदेश में ही परिलक्षित होता है। अतः बौद्धधर्म की प्रासंगिकता विश्व कल्याण हेतु अपनी प्रामाणिकता के कारण तीनों कालों में एक समान है।

    और विशेष रूप से वर्तमान वैश्विक अशान्ति के दौर में यह आवश्यक ही नहीं, अपितु अनिवार्य जान पड़ता है।

    यत्किञ्चिद् जगतो दुःखं तत् सर्वं मयि पच्यताम् ।

    बोधिसत्त्वशुभैः सर्वैर्जगत् सुखितमस्तु च ।।

    जगद्दुःखैकभैषज्यं सर्वसम्पत्सुखाकरम् ।

    लाभसत्कारसहितं चिरं तिष्ठतु शासनम् ।।

    मञ्जुघोषं नमस्यामि यत्प्रसादान्मतिः शुभे ।

    कल्याणमित्रं वन्देऽहं यत्प्रसादाच्च वर्धते ।।[9]

    ।।भवतु सर्वमङ्गलम् ।।


    [1].   बोधिचर्यावतार, 9.1

    [2].   The All-Embracing Net of Views p. 65, Pub. by Buddhist Publication Society Kandy, Sri Lanka (1978)

    [3].   सच्चसंगहो पृ0–35, संयुत्त निकाय का उद्धरण। प्रका0–बौद्ध भारती वाराणसी, सन् 1991 

    [4].   धम्मपद, 14.16 

    [5].   धम्मपद, 11.8 

    [6].   धम्मपद, 11.9 

    [7].   यह प्रतीत्यसमुत्पाद-मन्त्र विश्व में सबसे अधिक लिखे जाने वाले मन्त्रों में एक है और यह थेरवाद से लेकर वज्रयान परम्परा में सर्वधिक प्रचलित मन्त्र है।   

    [8].   ज्ञानसारसमुच्चय, 31 

    [9].   बोधिचर्यावतार, 10.56-58