Category: Vajrayan Sampradaya

  • A brief introduction of Vajrayāna

    वज्रयान का संक्षिप्त परिचय

    डॉ. रमेशचन्द्र नेगी (सहा. प्रोफेसर)
    केन्द्रीय तिब्बती अध्ययन विश्वविद्यालय सारनाथ, वाराणसी

    गुरुर्बुद्धो  गुरुर्धर्मो  गुरुः संघस्तथैव  च ।
    गुरुर्वज्रधरः श्रीमान् तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।[1]

    संसार दुःख है–यहीं से समस्त त्रैकालिक बुद्धों का उपदेश प्रारम्भ होता है। इस भद्रकल्प के चतुर्थ बुद्ध, शाक्यमुनि ने भी प्रथम धर्मचक्र प्रवर्तन के माध्यम से बुद्धों की उसी परम्परा का निर्वाह किया है। यदि हम निष्पक्षतया गम्भीर रूप से परीक्षण करते हैं, तब प्राणियों में दुःख केवल स्थूल रूप में ही नहीं है, अपितु उसका सूक्ष्म, सूक्ष्मतर, सूक्ष्मतम रूप भी द्योतित होता है, जिसे हम वैज्ञानिक पद्धति के द्वारा साक्षात् कर सकते हैं। अतः बहुत से लोग जो बुद्ध के द्वारा सर्वप्रथम दुःख आर्यसत्य की स्थापना को गलत मानते हैं, उन्हें वस्तुस्थिति को समझ कर ही अपना वास्तविक मत को स्थापित करने की चेष्टा करनी चाहिए।   

    समस्त बुद्धों का एकमात्र उद्देश्य तीनों लोकों के समस्त प्राणियों को एकान्ततः दुःखमुक्त कराना है। इसके लिए उन्होंने जिन उपायों का निरुपण किया है, वे बुद्धों द्वारा उपदेशित तीन यानों अथवा तीन मार्गक्रमों के अन्तर्गत पूर्णतया संगृहीत होते हैं। परमार्थतः जिस एकयान की बातें सूत्रों में आती हैं, वह संवृति अथवा व्यवहार में खरा नहीं उतरता है, क्योंकि सत्त्व की रुचि, आशय तथा इन्द्रिय आदि में भेद प्रत्यक्ष ही है। अतः आर्य लङ्कावतारसूत्र में कहा है–

    आतुरे  आतुरे  यद्वद्  भिषग् द्रव्यं प्रयच्छति ।
    बुद्धा हि तद्वत् सत्त्वानां चित्तमात्र वदन्ति वै ।।[2]

    अतः यदि किसी भी एक ऐसे साधक को, जो वास्तव में समस्त प्राणियों के दुःखों को समूल विच्छेद करना चाहता है, उसे यान-व्यवस्था अथवा मार्गक्रम-व्यवस्था को अच्छी तरह समझना ही चाहिए। इससे हम बुद्धों द्वारा उपदेशित समस्त 84,000 धर्म-स्कन्धों को सम्यक् रूप से अच्छी तरह समझ सकते हैं। इनके द्वारा प्राणी निश्चित रूप से दुःख-मुक्ति को प्राप्त कर सकता है।  

    शाक्यमुनि बुद्ध ने 29 वर्ष की आयु में (534 ई0पू0) गृहत्याग किया तथा छह वर्षों तक कठोर तप को करते रहे। किन्तु उन्होंने देखा कि केवल तप के द्वारा चित्त के सम्पूर्ण क्लेशों का शोधन नहीं होता है, इस प्रकार उन्होंने पाया कि मध्यम-मार्ग ही एक ऐसा मार्ग है, जिसके द्वारा प्राणी अपने भीतर के समस्त क्लेशों को बाहर निकाल कर उस अन्तिम पद को प्राप्त कर सकता है, जिसे शास्त्रों में निर्वाण, परिनिर्वाण तथा महासुख आदि विभिन्न प्रकार नामों के द्वारा सम्बोधित किये गये हैं।

    इस प्रकार 35 वर्ष की आयु में (528 ई0पू0) बोधगया में बोधिवृक्ष (पीपल) के पेड़ के नीचे बैशाख पूर्णिमा को उन्होंने सम्बोधि अर्थात् बुद्धत्व को प्राप्त किया। तत्पश्चात् 49 दिनों तक बुद्ध विभिन्न वृक्षों के नीचे समाधि के सुख में तल्लीन रहे और अन्त में देवराज इन्द्र तथा ब्रह्मा के विशेष निवेदन पर संसार के समस्त प्राणियों के कल्याण हेतु उन्होंने धर्मचक्र प्रवर्तन करना स्वीकार किया।

    धर्म का अधिकार पात्रानुसार ही सम्भव होता है। अपात्र को धर्म का वाचन नहीं करना चाहिए यह सभी यानों में समान रूप से कही गई है। इसे हम लोक में भी प्रतिदिन प्रत्यक्ष रूप से देखते हैं, जिस व्यक्ति की रुचि जिस कार्य में है, वह उस कार्य को बहुत ही सुन्दर ढंग तथा सरल तरीके से पूर्ण करता है।

    अतः पात्रता की दृष्टि से उन्होंने सर्वप्रथम कौण्डिन्य आदि उन्हीं पाँच भिक्षुओं को प्रथम धर्मचक्र के उपदेश देने के लिए चुना, जो कुछ समय पूर्व ही उन्हें छोड़कर ऋषिपतन मृगदायवन, सारनाथ में आकर रहने लगे थे। इसके लिए बुद्ध, बोधगया से चलकर ऋषिपतनमृगदायवन, सारनाथ पहुँचे तथा आषाढ़ पूर्णिमा को उन्होंने प्रथम धर्मचक्र का प्रवर्तन किया, जो मुख्यतः चार आर्य सत्य से सम्बद्ध था। वह उपदेशित सूत्र धर्मचक्रप्रवर्तनसूत्र के नामसे सुप्रसिद्ध है। यह सूत्र भगवान् द्वारा उपदेशित प्रथम सूत्र है।  

    जैसे सर्वविदित है, चार आर्य सत्य, दुःख-मुक्ति का आधार स्तम्भ है। इसी आधार पर समस्त अन्य यानों की नींव पड़ी है। यदि कोई साधक चार आर्य सत्य से अवगत नहीं होता, तब वह अज्ञान से बाहर नहीं निकल सकता। बौद्ध सूत्रों और शास्त्रों में अज्ञान का वास्तविक अर्थ चार आर्य सत्य की सम्यक् जानकारी नहीं होना ही कहा गया है। अतः सत्य रूपी तत्त्व का आधारभूत ज्ञान, चार आर्य सत्य होने से इसे प्रथम धर्मचक्र के रूप में माना गया है।  

    द्वितीय धर्मचक्र-प्रवर्तन को अलक्षण-धर्मचक्र अथवा पारमितानय धर्मचक्र  नाम दिया गया है। अलक्षण अर्थात् शून्यता। समस्त धर्मों की शून्यता को ही अलक्षण नाम से सम्बोधित किया गया है। यह सर्वविदित है कि समस्त धर्म प्रतीत्यसमुत्पन्न हैं। समस्त प्रज्ञापारमितासूत्रों में इस शून्यता-भाव को बहुत ही अच्छे तरीके से प्रस्तुत किया गया है। इसलिए यह पारमितानय-धर्मचक्र, द्वितीय धर्मचक्र के नाम से सुविख्यात है।  

    महायान के मतानुसार इसका उपदेश भगवान् तथागत सम्यक् सम्बुद्ध ने प्रथम धर्मचक्र प्रवर्तन के सोलह वर्ष बाद राजगृह के गृध्रकूट पर्वत पर किया था। यह द्वितीय धर्मचक्र, चित्त के विकास का दूसरा चरण है। इसने समस्त संसार को असीम करुणा का विषय बनाया है। यथा आर्य मैत्रेयनाथ रचित अभिसमयालंकार में कहा है–

    चित्तोत्पादः परार्थाय सम्यक्सम्बोधिकामता ।
    समासव्यासतः  सा  च  यथासूत्रं स चोच्यते ।।[3]

    ऐसे ही थेरवाद के मतानुसार भी भगवान् के द्वारा उपदेशित दूसरा सूत्र अनत्तलक्खनसुत्त (अनात्मलक्षणसूत्र) कहलाता है। इसका उपदेश भगवान् ने धर्मचक्रप्रवर्तनसूत्र के उपदेश करने के पाँच दिन बाद पंचवर्गीय भिक्षुओं को किया था। अर्थ की दृष्टि से यह सूत्र भी धर्मों की शून्यता को ही प्रदर्शित करता है। यह सूत्र जो प्रश्नोत्तर रूप में प्राप्त है, एक अति संक्षिप्त सूत्र है।

    इस द्वितीय धर्मचक्र का विषय प्रज्ञापारमितासूत्र के नाम से महायानियों में अत्यन्त प्रसिद्ध है। इस क्रम में शतसाहस्रिकाप्रज्ञापारमिता नामक सूत्र अत्यन्त विस्तृत सूत्र है, जो भोटी भाषा में 12 मोटी जिल्दों में प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार पञ्चविंशतिसाहस्रिका प्रज्ञापारमितासूत्र मध्यम प्रकार का सूत्र है तथा यह तीन मोटी जिल्दों में प्राप्त होते हैं। अष्टसाहस्रिका प्रज्ञापारमितासूत्र लघु पारमितासूत्र कहलाता है और यह एक जिल्द में प्राप्त होता है। इस प्रकार कुछ अन्य लघु पारमितासूत्रों के साथ सभी को मिलाकर इनकी संख्या 17 कही गई है।   

    तृतीय धर्मचक्र प्रवर्तन तन्त्रयान से सम्बन्धित धर्मचक्र है। आर्यसन्धि-निर्मोचनसूत्र के अनुसार तृतीय धर्मचक्र–सुविभाजित धर्मचक्र माना गया है। इसे उन्होंने नीतार्थ धर्मचक्र कहा है। बुद्ध, सर्वज्ञ एवं उपायकौशल्य से युक्त है। साथ ही उनके द्वारा उपदेशित सद्धर्म समस्त विषयों की व्याख्या करता है, इसलिए वज्रयानियों का मानना है कि तन्त्रयान, मन्त्रयान अथवा वज्रयान, अन्तिम अर्थात् तृतीय धर्मचक्र है। यह तन्त्रयान विषय की दृष्टि से गम्भीर तथा विस्तृत है, ऐसा तन्त्र के व्याख्याकारों का कहना है।

    यहाँ प्रसंगवश अन्तिम धर्मचक्र तन्त्रयान, मन्त्रयान अथवा वज्रयान का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया जा रहा है।

    महायानियों में बुद्ध के उपायकौशल्य रूपी गुण की बहुत चर्चा होती है। यह उपायकौशल्य क्या है

    बुद्ध में ऐसे गुण होते हैं, जो नाना प्रकार के पुद्गलों को सम्यक् मार्ग पर क्रमशः आरूढ़ कर सकते हैं। मनुष्य धनी हो या निर्धन, छोटा हो या बड़ा, बुद्धि की दृष्टि से अति तीव्र बुद्धिवाला हो अथवा मन्द बुद्धिमान्, काला हो या गौरा, इस देश का हो या उस देश का, चर्या की दृष्टि से अत्यन्त पतित हो अथवा बहुत उठा हुआ, यहाँ तक कि पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, यूँ कहें कि समस्त ब्रह्माण्ड के सुफल के उपाय का उपदेश करना बुद्धों का कार्य है। अर्थात् उनकी वास्तविक महान्ता धर्मचक्र-प्रवर्तन ही है।

    इसलिए बुद्ध को एक यान तक सीमित करना, बुद्ध के असीमित गुणों की अनदेखी करना है–जैसे बौद्ध अथवा बौद्धेतर बहुत से विद्वान् भी बुद्ध के बारे में अपनी नासमझ के कारण बहुत बार ऐसे वक्त्व्यों को देते दिखाई देते हैं, जिसके द्वारा बुद्ध की स्तुति तो कम, किन्तु निन्दा ज्यादा होती है।

    यह सब बातें बुद्ध के बारे में सम्यक् रूप से नहीं जानने के कारण ही होती है। अतः आवश्यक है कि बुद्ध के धर्म को सम्यक् रूप से जानने के लिए मन्त्रयान, तन्त्रयान अथवा वज्रयान का सहारा लिया जाए।

    इस भद्रकल्प में जिन एक हज़ार बुद्धों आगमन हो रहा है, उनमें शाक्यमुनि बुद्ध, चतुर्थ बुद्ध हैं और पाँचवाँ बुद्ध, आर्य मैत्रेयनाथ कहा गया है। शास्त्रों में कथित है कि इन सभी बुद्धों के शासन में तन्त्रों की देशना होगी ही, यह निश्चित नहीं है। परन्तु शाक्यमुनि बुद्ध के शासन में तन्त्रयान का भी उपदेश हुआ है। इससे महोत्साहवान् भाग्यशाली सत्त्व एक ही जन्म में वज्रधर रूपी बुद्धत्व को प्राप्त कर सकता है। अतः तन्त्र कई अर्थों में नीचे के यानों से विशिष्ट है।

    समय की दृष्टि से अन्तिम होने के कारण यह समझना सरल है कि तन्त्र जैसे गम्भीर धर्म को, हम नीचे के यानों को अच्छी  तरह समझते हुए धीरे-धीरे प्राप्त करते हैं। मार्गक्रम के अनुसार भी यह समझना और सरल है कि चित्त की गम्भीरता क्रमशः आगे बढती है। यही कारण है कि मार्गक्रम सम्बन्धित ग्रन्थोंमें लघुपुरुष आदि की व्याख्या की गई है तथा इसी क्रम में सिद्धान्ततया वैभाषिक आदि चार सिद्धान्तवादियों की चर्चा भी हुई है। इसी अत महत्त्वपूर्ण विषय को हेवज्रतन्त्र बहुत ही सुन्दर रूप में व्याख्या करती है, यथा–

    पोषधं दीयते प्रथमं तदनु शिक्षापदं दशम् ।
    वैभाष्यं  तत्र  देशेत सूत्रान्तं वै पुनस्तथा ।।
    योगाचारं ततः पश्चात् तदनु मध्यमकं दिशेत् ।
    सर्वं   मन्त्रनयं   ज्ञात्वा  तदनु  हेवज्रमारभेत् ।
    गृह्णीयात्  सादरं शिष्यः सिध्यते नात्र संशयः।।[4]

    इस प्रकार तन्त्रयान का आधार भी नीचे के यान तथा दश प्रकार की शिक्षाएँ ही हैं। अतः यानों तथा सिद्धान्तों को एकान्ततः भिन्न मानना सही नहीं है। ये तो ज्ञान अथवा विद्या को प्राप्त करने के क्रम हैं, जो उपर्युक्त श्लोकों में बहुत ही स्पष्ट रूप से कही गई है। अतः कई ऐसे लोग जो तन्त्रयान की निन्दा करते फिरते हैं, उन्हें प्रथम, तन्त्रयान का एक सम्यक् गुरु से अध्ययन तथा अनुशीलन करनी चाहिए तथा तत्पश्चात् उसके खण्डन-मण्डन आदि करने का कार्य करना चाहिए।   

    जो लोग सुविभाजित धर्मचक्र को तृतीय धर्मचक्र के रूप में स्वीकार करते हैं, वे लोग इसका स्थान वैशाली आदि मानते हैं। इनका कहना है कि इसके विनेयजन श्रावक और महायानी दोनों हैं। परन्तु तृतीय क्रम में तन्त्रयान को रखते हैं, तब तन्त्रशास्त्रों के अनुसार श्रीधान्यकटक आदि वह स्थल है, जहाँ बुद्ध ने तन्त्रयान की देशना की है। सिद्ध नरोपा द्वारारचित सेकोद्देश टीका में कहा है–

    गृध्रकूटे   यथा  शास्त्रा  प्रज्ञापारमितानये ।
    तथा मन्त्रनये प्रोक्ता श्रीधान्ये धर्म्मदेशना ।।[5]

    विषय की दृष्टि से जैसे कि ऊपर कहा गया है, तन्त्रयान की देशना को समझना सरल है। किन्तु, क्योंकि तन्त्र वास्तव में अत्यधिक तीव्र बुद्धि वालों का धर्म है, इसलिए इसके शब्दों की व्याख्या गुह्य होने से सामान्य लोग नहीं कर सकते। वास्तव में तन्त्र-परम्परा को जिसने भी सही ढंग से अध्ययन तथा अनुशीलन नहीं किया है, उनके द्वारा तन्त्र की व्याख्या अधिकतर गलत ही की गई है और अन्य लोगों को भी तन्त्रमार्ग से भ्रमित किया है। अतः तन्त्र का अध्ययन इसमें पारंगत वास्तविक गुरु से ही करनी चाहिए, जो बहुत ही आवश्यक है।

    तन्त्र शब्द तनु विस्तारे और त्रै रक्षणे इन दो धातुओं से बना होने के कारण ज्ञान के गहन विस्तार तथा साथ ही चित्त की रक्षा करने के अर्थ में माना गया है। इसलिए तन्यते विस्तार्यते ज्ञानमनेन इति तन्त्रम–ऐसा कहा जाता है।

    बाह्याद्यात्म विषयों की जो वास्तविक व्याख्या हो सकती है, वह तन्त्रयान में आकर अपनी अन्तिम पद को प्राप्त कर लेती है। रूप से लेकर सर्वज्ञता तक की सम्पूर्ण यात्रा तन्त्रयान के ज्ञान विना पूर्ण नहीं होता। यहाँ पर आकर समस्त विकल्प समाप्त हो जाते हैं तथा उपाय तथा प्रज्ञा में एकरूपता स्थापित हो जाती है। इसका फल युगनद्ध अवस्था है। सरल शब्दों में कहें तो उपाय और प्रज्ञा की यात्रा युगनद्ध अवस्था के साथ अवसान को प्राप्त होती है।    

    ।। भवतु सर्वमङ्गलम् ।।[6]


    [1].   बौद्धस्तोत्रसंग्रह (गुरुरत्नत्रयस्तोत्रम्)पृष्ठ–66,प्रकाशक–मोतीलाल बनारसीदास (1994)

    [2].   लङ्कावतारसूत्र 2.123

    [3].   अभिसमयालंकार, 1.19

    [4].   हेवज्रतन्त्रम् 2.8.9-10

    [5].   सेकोद्देश टीका, पृ0–3

    [6].   अतीश

  • Marpa, the founder of Kagyudpa

    भूमिका[1]

    भोटदेशीय बौद्धों में चार महान् सम्प्रदाय प्रसिद्ध हैं। इनमें काग्युद् सम्प्रदाय काल की दृष्टि से 11वीं शती में अस्तित्व में आया है तथा इसका क्रम दूसरा है। इस सम्प्रदाय के संस्थापक मर्-पा लो-च़ा-वा छोस्-की लो-डोस् (1012-1097 ई.)[2] हैं, जिनका च़ङ्-ञोन् हेरुक द्वारा लिखित जीवन-वृत्तान्त, यहाँ हिन्दी-अनुवाद के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

    आठवीं शती में भारतीय उपाध्याय शान्तरक्षित, आचार्य पद्म-सम्भव तथा तिब्बत के तत्कालीन धर्मराज ठिस्रोङ् देहुच़न (718-785 ई.) के समय, तिब्बत में प्रथम बार एक भव्य बौद्ध-सम्-यस् विहार[3] का निर्माण कर भोट में बौद्धधर्म की सर्वप्रथम आधार शिला रखी गई, यह प्रारम्भिक धर्म तिब्बत में ञिङ्-मा (प्राचीनक) नाम से प्रसिद्ध हुआ।  

    तीसरा सम्प्रदाय साक्या है। यह साक्या सम्प्रदाय खोन कोन्-छोग् ग्यल्-पो के द्वारा सन् 1073 ई. में वज्रासन रूपी श्रीसाक्या के महान् विद्यापीठ के निर्माण से प्रारम्भ हुआ। अतः यह सम्प्रदाय खोन् कोन्-छोग् ग्यल्-पो द्वारा स्थापित किया गया है। स-छेन कुन्-गाह् ञिङ्पो, लोब्-पोन् सोद्-नम्स च़े-मो और डग्स-पा ग्यल्-छ़न् आदि परमपावन साक्यापा के गुरुओं के द्वारा इस सम्प्रदाय का विकास सम्भव हुआ है।  

    चतुर्थ जे-च़ोङ्-ख-पा लो-ज़ङ् डग्स-पा (1357-1419 ई.) के द्वारा स्थापित धर्म गे-लुग्स नाम से प्रसिद्ध है। वैसे यह सम्प्रदाय पूर्व में का-दम्स नाम से प्रचलित था, जो आचार्य दीपङ्कर-श्रीज्ञान के गृहस्थ शिष्य डोम्-तोन्-पा ग्यल्-वई जुङ्-नस् से प्रारम्भ हुआ था। यही कारण है कि इतिहासकार, डोम्-तोन् से लेकर जे-च़ोङ्-खा-पा के पहले की परम्परा को प्राचीन का-दम्स (का-दम्स ञिङ्-पा) तथा जे-च़ोङ्-खा-पा के बाद की परम्परा, जिसे आज गे-लुग्स नाम से जाना जाता है, इसे नवीन कादम (का-दम्स सर्-मा) के नाम से अभिहित करते हैं।

    उपर्युक्त ये चार सम्प्रदाय तिब्बती बौद्धों में बहुत अच्छी तरह स्थापित हैं और इन्हीं सम्प्रदायों से निकले बहुत से उपसम्प्रदाय भी वहाँ अस्तित्व में हैं। ये सारे सम्प्रदाय किसी न किसी भारतीय आचार्य से सम्प्रसारित है और सारी परम्परायें शुद्ध भारतीय परम्परा से ही जुड़ती हैं। इसलिये कुछ लोग जो तिब्बती भोट-बौद्धधर्म में लामावाद आदि दोषों को देखने का प्रयास करते हैं, उन्हें अपने भोट-इतिहास से सम्बद्ध सामान्य ज्ञान को दुरुस्त करने का प्रयास करना चाहिये।  

    च़ङ्-ञोन् हेरुक द्वारा लिखित मरपा की इस जीवनी के अनुसार भट्टारक मरपा चार (4) बार नेपाल तथा तीन (3) बार भारत आये। इन यात्राओं में उन्होंने अपने अध्ययन को आगे बढाया तथा उसे गम्भीर अध्ययन में परिवर्तित किया। यही नहीं नेपाल और भारत में अध्ययन के बाद आपने गुह्यवज्रयान में अधिकार को प्राप्त कर लिया। इन यात्राओं में भट्टारक मरपा ने जिन विशिष्ट ग्रन्थों का अध्ययन किया उनका विवरण यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा हैᅳ

    मरपा लोच़ावा छोस्-की लो-डोस् ने तीन बार भारत की शैक्षणिक यात्रा की और तन्त्र के गम्भीर ग्रन्थों का अध्ययन ही नहीं किया, अपितु उनका अभ्यास कर अभिसमय (ज्ञान) की भी प्राप्ति की। भारत के तत्कालीन महान् गुरुओं के सान्निध्य में रहकर श्रवण-चिन्तन और मनन परम्परा में पारंगत हुये तथा साथ ही तन्त्र के उत्पन्नक्रम तथा सम्पन्नक्रम की भावना में भी पारंगतता को हासिल की।  

    भारत यात्रा के बीज का प्रकाशन उनके मन में मुख्य रूप से भोट गुरु, जो स्वयं अनुवादक ही थे, ने डाला जिनका नाम डोग्-मी लोच़ावा शाक्य येशे (992-1074) कहा गया है। भट्टारक मरपा उनके सान्निध्य में तीन (3) साल तक रहे थे और भारतीय भाषा (मुख्य रूप से संस्कृत) से सम्बन्धित अनुवाद को सीखा था।

    तन्त्र के गम्भीर ग्रन्थों को भी भट्टारक मरपा अपने अनुवादक गुरु से सीखना चाहते थे, लेकिन पूर्वकर्मों के संस्कारवश यह उनके भाग्य में नहीं लिखा था। तब गुरु को शुभ विदाई देकर भट्टारक मरपा, आर्यदेश भारत आने की तैयारी में जुट गये तथा अन्त में ञोस् लोच़ावा के साथ बाह्यतः गुरु और सेवक के रूप में भारत के लिये प्रस्थान किये।

    प्रथम बार के भारत आगमन पर नेपाल में अध्ययन किये ग्रन्थों का विवरण :

    भारत में क्योंकि काफी अधिक गर्मी पड़ती है, इसका विपरीत असर न पड़े, वे लगभग दो वर्ष पर्यन्त नेपाल, काठमाण्डु में ही बिताये। यहाँ पर उन्हें संयोगवश दो नेपाली गुरु मिले, जिनका नाम 1. चिथेरवा तथा 2. पेन्तावा कहा गया है।  

    इन दो वर्षों में वे गुरु जो अपने नेपाली शिष्यों को पढाते थे, उनमें भट्टारक मरपा सम्मिलित हुए और जो अध्यापन इन गुरुओं ने इस प्रवास के दौरान किया, उन ग्रन्थों का नामᅳगुह्यसमाज, श्रीचतुष्पीठ और संक्रमणोपदेश कहा गया है। क्योंकि ये दोनों गुरु भी भारतीय आचार्य नरोपा के ही शिष्य थे, अतः इन दो गुरुओं ने भट्टारक मरपा को पत्र सहित सही समय आने पर भारत में नरोपा के पास भेजा।

    प्रथम बार के भारत आगमन पर भट्टारक मरपा द्वारा अध्ययन किये ग्रन्थों का विवरण :

    सिद्ध नरोपा से मिलने के बाद सर्वप्रथम गुरु ने उन्हें श्रीहेवज्र-तन्त्र का अध्यापन कराया, जो नरोपा का प्रमुख साधना-ग्रन्थ हुआ करता था। तत्पश्चात् नरोपा ने ही मरपा को वज्रपञ्जर तथा सम्पुट का भी अध्यापन कराया।

    इसके पश्चात् जब मरपा ने श्रीगुह्यसमाज को अनुवादक ञोस् की प्रेरणा से पुनः पढ़ने का निश्चय किया तो इस विशेष ग्रन्थ के पढने के लिये शिष्य मरपा को इन्होंने आचार्य ज्ञानगर्भ के पास भेजा। आचार्य ज्ञानगर्भ ने इन्हें सम्पूर्ण गुह्यसमाज को बहुत अच्छी तरह पढाया और मरपा तब इस विषय में अनुवादक ञोस् से भी आगे बढ़ गये।

    नरोपा की ही प्रेरणा से मरपा आचार्य शान्तभद्र अथवा कुकुरिपा के पास चले आये और उनसे महामाया का भी अध्ययन किया। इसके साथ ही कुकुरिपा ने मरपा को महामूकता तथा लघुमूकता आदि विशेष साधनाओं का भी अभ्यास कराया। बाद में नरोपा से भी एक बार महामाया का अध्ययन करने की बात ठग्-थुङ् ग्यल्-पो रचित जीवनी में कही गई है।  

    आचार्य शान्तभद्र तथा भट्टारक नरोपा के अध्यापन में अर्थ की दृष्टि से बहुत बड़ा अन्तर नहीं होने पर भी नरोपा के अध्ययन में शब्दों का विस्तार अधिक था। तब मर्-पा ने नरोपा से कहा कि ʽआप इतने पारंगत होते हुए भी महामाया के लिये उस (सुदूर) समुद्री द्वीप में भेजकर इतना कष्ट क्यों दिया?ʼ तब नरोपा का कहना थाᅳʽवे मातृतन्त्र के अधिपति हैं। अतः उपदेश में नियत-बुद्धि तथा स्रोत की प्रामाणिकता के लिये भेजा था।ʼ[4]

    तत्पश्चात् मरपा दक्षिण से वापस लौटे और इसके बाद नरोपा ने गुरु मरपा को मैत्रीपा के दर्शन की अनुमति दी। आचार्य मैत्रीपा ने सर्वप्रथम इन्हें महामुद्रा का उपदेश दिया। इसके बाद आर्यमञ्जुश्री-नाम-संगीति का भी अध्यापन किया। सम्पूर्ण बौद्ध शास्त्रों में यही एक ऐसा ग्रन्थ है, जिसके पाठ मात्र से पुद्गल अन्तिम अवस्था अर्थात् बोधि को प्राप्त कर सकता है।

    कहा जाता है कि तिब्बत के 11वीं शती के ही बहुत बड़े अनुवादक लोच़ावा रिन्छेन ज़ङपो (958-1055 ई.) ने इस नामसंगीति का भोटी और संस्कृत दोनों में एक-एक लाख बार पाठ किया था। इस अवसर पर मैत्रीपा ने स्वयं के द्वारा रचित द्वादशो-पदेश-वज्रगीत का भी मरपा को अध्ययन कराया।

    इसी क्रम में ज्ञानड़ाकिनी से चतुष्पीठ को पढने की बात भी इस मरपा-वृत्तान्त में स्पष्ट हुआ है और मरपा स्वयं के द्वारा गाये गये

    एक गीति में एक रात स्वप्न में सिद्ध सरहपाद से अमनस्कार[5]

    भावना को श्रवण करने की बात भी कही है।  

    बाद में नरोपा ने मरपा को अपने छह धर्मों (नरोपा का षड्योग)[6] का भी अध्यापन तथा अभ्यास कराया। इस अवसर पर भट्टारक मरपा ने प्रकृति स्वरूप सहज ज्ञान-मुद्रा से भी परिचय प्राप्त किया तथा चण्डाली भावना में विशेष रूप से अधिकार प्राप्त किया।

    द्वितीय बार के भारत आगमन पर भट्टारक मरपा द्वारा अध्ययन किये ग्रन्थों का विवरण :

    भट्टारक मरपा सदा ज्ञान के प्रति समर्पित थे, अतः उन्होंने दूसरी बार भी भारत की शैक्षणिक यात्रा की। इस द्वितीय बार की भारत प्रवास के दौरान सर्वप्रथम नरोपा से हेवज्र का अभिषेक प्राप्त किया। तत्पश्चात् नरोपा ने मरपा को हेवज्रमूलतन्त्र, डाकिनी-वज्रपञ्जरतन्त्र, व्याख्यातन्त्र तथा सम्पुटतन्त्र का अध्यापन किया। बाद में पुनः नरोपा द्वारा इन्द्रभूति की परम्परा का चक्र-संवर, सरह की परम्परा का बुद्धकपाल-तन्त्र-व्याख्या-विधि, कागज़-पिण्डोपदेश, गुह्यसमाज-अद्वय-समता-विजय तथा प्रदीपो-द्योतन-नाम-टीका नामक ग्रन्थों को पढ़ाने का भी वर्णन हुआ है।

    इस द्वितीय बार की यात्रा में मरपा ने मैत्रीपा से गुह्यसमाज-अभिषेक, गुह्यसमाज-टीका, महामुद्राबिन्दुतन्त्र, मूलततन्त्र हेवज्रतन्त्र, विशिष्ट व्याख्यातन्त्र, डाकिनी वज्रगीत, सामान्य व्याख्यातन्त्र सम्पुट की टीका आदि का भी अध्ययन किया। इस यात्रा के दौरान मरपा ने विस्तृत, मध्य तथा लघु हेवज्र के अभिषेकों को भी प्राप्त किया।

    भट्टारक मरपा की शैक्षणिक यात्रा यहीं नहीं रुकी। आपने तीसरी बार भी आर्यदेश भारत की यात्रा की, क्योंकि उन्होंने अपने गुरु भट्टारक नरोपा के सम्मुख पूर्व में पुनः भारत आकर एक बार मिलने के लिये प्रतिज्ञा की थी। इस यात्रा के लिये माँ दग्-मेद्-मा एवं शिष्यों ने काफी बाधा उपस्थित की। उन लोगों का यह कहना था कि ‘अब आप वृद्ध हो चुके हैं और भारत जाना इस अवस्था में खतरे से खाली नहीं है।’ लेकिन एक सच्चे शिष्य को अपनी प्रतिज्ञा तोड़ना अत्यन्त स्वीकार नहीं था। अतः वे तीसरी बार की यात्रा के लिये भोट से भारत के लिये निकल पड़े।

    उनके इस यात्रा के दौरान आचार्य दीपङ्करश्रीज्ञान भोटदेश पधार रहे थे, अतः ऊपरी ञङ् के शेङ्स लङ्-पो-ना में उनसे मुलाकात भी हुई। आचार्य अतीश से ही उनको भट्टारक नरोपा के विशेष चर्या में जाने की बात मालूम हुई और इसी कारण भट्टारक मरपा से मिलने में कठिनाई को जानते हुए उन्होंने भट्टारक मरपा को अपने अनुवादक के रूप में भोट वापस चलने के लिये कहा। क्योंकि भट्टारक मरपा ने अपने गुरु के सम्मुख एक बार पुनः दर्शन करने की प्रतिज्ञा की थी, इसी प्रतिज्ञा के स्मरण के कारण उन्होंने अनुवादक के रूप में आने में असमर्थता व्यक्त की और अपनी तीसरी बार की भारत यात्रा को जारी रखा।

    भारत पहुँचने के बाद भट्टारक मरपा ने गुरु के दर्शन के लिये अपना प्रयास जारी रखा और इस दौरान उन्होंने विशेष गणचक्र-पूजाओं सहित गुरु-अध्येषणा-अभ्यास के साथ गुरु के अन्वेषण में लगे रहे। इस दौरान उन्हें जो आभास प्रकट हुये वे सभी मार्ग की उच्च अवस्था प्राप्त को ही सम्भव होते हैं और हर विशेष अध्येषणा के बाद उनके अभिसमय में विशेष बढ़ोत्तरी भी होती रही और अन्त में आठ (8) महीने बाद गुरु ने उनको कृपापूर्वक अपना दर्शन दिया। इसी दौरान विशेष वार्ता में भट्टारक नरोपा द्वारा भट्टारक मि-ला रस्-पा के प्रति अपना विशेष नमन करने की बात का ज़िक्र भी इस प्रसंग में हुआ है।

    तत्पश्चात् भट्टारक नरोपा ने भट्टारक मरपा को पूर्व में किसी में भी अप्रचलित विशेषता वाले संवर-डाकिनी-कर्णतन्त्र का उपदेश किया। इस तृतीय बार के उपदेश का ज़िक्र इसी ग्रन्थ में निम्न प्रकार से उक्त है, यथाᅳ

    ʽʽद्वाषष्टि संवर,[7] त्रयोदशी, पञ्चमी-देव तथा सहज आदि का अभिषेक धूलि-वर्ण-मण्डल के माध्यम से प्रदान किया। गुरु के काय-वाक्-चित्त-मण्डल के आश्रय से संकेत-अभिषेक और उपदेशों को पूर्णतया प्रदान कर नरोपा ने कहाᅳ‛इन विशिष्ट उपदेशों को देखते हो तो तुम्हें जो पूर्व में उपदेश दिए गए थे, वह सब बाहरी छिलके के समान हैं।[8] सारों का सार रूपी यह श्रेष्ठ उपदेश तेरह (13) सन्ततियों तक एक परम्परा हेतु ही अनुमति प्राप्त है। तुम इसे थोस्-पा-गाह् नामक उस विनेयजन को दे देना। इससे कर्म का विस्तार होगा। क्या यह पूर्व से भिन्न है या नहीं?ʼʼ

    इस तीसरी बार की यात्रा के दौरान नरोपा के द्वारा धर्म के कई मर्म भट्टारक मरपा से कहे गये तथा षड्-धर्म का मर्म (नामक) वज्रगीत एवं भविष्यवाणी गीत आदि का भी भट्टारक नरोपा ने भट्टारक मरपा के सम्मुख वर्णन किया है, वे वास्तव में ही अपूर्व हैं। इसके बाद अनुवादक मरपा, नेपाल होते हुये तिब्बत सकुशल लौटे और मार्ग में भी कई वज्रगीत अपने समान परम्परा वालों के लिये गाये जो एक सम्यक् वज्रयानी गुरु के लक्षण को दर्शाते हैं।  

    ।। भवतु सर्वमङ्गलम् ।।


    [1]. इस हिन्दी भूमिका में प्रमुख रूप से भट्टारक मरपा ने किन-किन गुरुओं के सान्निध्य में रहकर किन-किन विशिष्ट तान्त्रिक ग्रन्थों का अध्ययन किया था, यहाँ इस पर विशेष रूप से प्रकाश डालने का प्रयास किया जा रहा है। यान की दृष्टि से वज्रयान अन्तिम यान है, अतः मरपा द्वारा अध्ययन किये ग्रन्थों से तन्त्रग्रन्थों के अध्ययन-क्रम सहित तत्कालीन अध्ययन-परम्परा का भी हम लोग अनुमान लगा सकते हैं।  

    [2]. भोटदेश के अधिकतर इतिहासकार मरपा लोच़ावा की आयु उपर्युक्त तिथि को ही मानते हैं। लेकिन ठग्-थुङ् ग्यल्-पो द्वारा रचित इस हिन्दी अनूदित जीवनी (मर्-पा लो-च़ई नम्-थर, थोङ्-वा दोन्-योद्) में 1005-1093 ई. कहा गया है, जो शोध का विषय है।

    [3]. ʽʽइस प्रकार उपाध्याय शान्तरक्षित, आचार्य पद्मसम्भव और सम्राट ठि-स्रोङ् दे-च़न की परिणामना फलित हुई तथा वे सभी एक मंच पर एक ही कार्य हेतु उपस्थित हुए। सद्धर्म की दीर्घ-स्थिति के लिए प्रारूप तैयार किया गया। इसके परिणामस्वरूप सम्-यस् विहार की स्थापना की गई जो भारत के औदन्तपुरी विहार का ही दूसरा रूप था। भूमि-परीक्षण आदि कार्य उपाध्याय ने किया तथा तत्सम्बन्धित भूमि-विधि आदि को आचार्य पद्मसम्भव ने पूर्ण किया। इसकी आधारशिला मे-मो-योस् वर्ष में प्रारम्भ की गई तथा यह 13 वर्ष बाद स-मो-योस् वर्ष में बनकर तैयार हुआ।ʼʼᅳपद्ममाकरपो-विरचिता पूर्वयोग-टिप्पणी (भूमिका), पृ. 55

    [4]. पद्माकरपो-विरचिता पूर्वयोग-टिप्पणी, भूमिका, पृ. 77. प्रकाशकᅳ केन्द्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा-संस्थान, सारनाथ, वाराणसी (1996 ई.)  

    [5]. अमनस्कार का अर्थ मनस्करण नहीं करना भी है और साथ ही का अर्थ शून्यता करने पर शून्यता का मनस्करण करना भी होता है। यह दोनों ही अर्थ वास्तविक भावना के समय विरुद्ध नहीं हैं। लेकिन कुछ भोट विद्वानों ने अमनस्कार-भावना का खण्डन भी किया है। खण्डन का मुख्य कारण अमनस्कार को उच्छेदान्त के रूप में मानना है, जो कि सही नहीं है। इस खण्डन-मण्डन के लिये द्वग्सपो टशी नम्-ग्यल् द्वारा रचित छग्-छेन् दावाई होद्-ज़ेर का अवलोकन कर सकते हैं। यह महामुद्राग्रन्थ अंग्रेजी में भी अनूदित है, जो महामुद्रा नाम से ही प्रकाशित है।   

    [6]. नरोपा का षड्योगᅳ1. चण्डाली, 2. मायाकाय, 3. स्वप्न, 4. प्रभास्वर, 5. संक्रान्ति तथा 6. अन्तराभव।

    [7].     दो प्रधान युगनद्ध, चार हृदय-योगिनी, चार द्वारपालिका, चार सीमन्तिनी, चौबीस वीर एवं चौबीस वीरनी (-वीरेश्वरी)ᅳ६२ संवर।

    [8].     न किञ्चिदस्तीक्षुत्वचा हि सारः।।

    प्रियो रसोऽभ्यन्तर एव तिष्ठेत् त्वचं विमुज्येक्षुरसो नरेण।

    न शक्यते स्वादयितुं हि लब्ध्वा।

    अतीशविरचिताश्चर्यागीत्याद्यष्टग्रन्थाः (शोधप्रबन्ध), पृ०ᅳ१८०