Marpa, the founder of Kagyudpa

भूमिका[1]

भोटदेशीय बौद्धों में चार महान् सम्प्रदाय प्रसिद्ध हैं। इनमें काग्युद् सम्प्रदाय काल की दृष्टि से 11वीं शती में अस्तित्व में आया है तथा इसका क्रम दूसरा है। इस सम्प्रदाय के संस्थापक मर्-पा लो-च़ा-वा छोस्-की लो-डोस् (1012-1097 ई.)[2] हैं, जिनका च़ङ्-ञोन् हेरुक द्वारा लिखित जीवन-वृत्तान्त, यहाँ हिन्दी-अनुवाद के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

आठवीं शती में भारतीय उपाध्याय शान्तरक्षित, आचार्य पद्म-सम्भव तथा तिब्बत के तत्कालीन धर्मराज ठिस्रोङ् देहुच़न (718-785 ई.) के समय, तिब्बत में प्रथम बार एक भव्य बौद्ध-सम्-यस् विहार[3] का निर्माण कर भोट में बौद्धधर्म की सर्वप्रथम आधार शिला रखी गई, यह प्रारम्भिक धर्म तिब्बत में ञिङ्-मा (प्राचीनक) नाम से प्रसिद्ध हुआ।  

तीसरा सम्प्रदाय साक्या है। यह साक्या सम्प्रदाय खोन कोन्-छोग् ग्यल्-पो के द्वारा सन् 1073 ई. में वज्रासन रूपी श्रीसाक्या के महान् विद्यापीठ के निर्माण से प्रारम्भ हुआ। अतः यह सम्प्रदाय खोन् कोन्-छोग् ग्यल्-पो द्वारा स्थापित किया गया है। स-छेन कुन्-गाह् ञिङ्पो, लोब्-पोन् सोद्-नम्स च़े-मो और डग्स-पा ग्यल्-छ़न् आदि परमपावन साक्यापा के गुरुओं के द्वारा इस सम्प्रदाय का विकास सम्भव हुआ है।  

चतुर्थ जे-च़ोङ्-ख-पा लो-ज़ङ् डग्स-पा (1357-1419 ई.) के द्वारा स्थापित धर्म गे-लुग्स नाम से प्रसिद्ध है। वैसे यह सम्प्रदाय पूर्व में का-दम्स नाम से प्रचलित था, जो आचार्य दीपङ्कर-श्रीज्ञान के गृहस्थ शिष्य डोम्-तोन्-पा ग्यल्-वई जुङ्-नस् से प्रारम्भ हुआ था। यही कारण है कि इतिहासकार, डोम्-तोन् से लेकर जे-च़ोङ्-खा-पा के पहले की परम्परा को प्राचीन का-दम्स (का-दम्स ञिङ्-पा) तथा जे-च़ोङ्-खा-पा के बाद की परम्परा, जिसे आज गे-लुग्स नाम से जाना जाता है, इसे नवीन कादम (का-दम्स सर्-मा) के नाम से अभिहित करते हैं।

उपर्युक्त ये चार सम्प्रदाय तिब्बती बौद्धों में बहुत अच्छी तरह स्थापित हैं और इन्हीं सम्प्रदायों से निकले बहुत से उपसम्प्रदाय भी वहाँ अस्तित्व में हैं। ये सारे सम्प्रदाय किसी न किसी भारतीय आचार्य से सम्प्रसारित है और सारी परम्परायें शुद्ध भारतीय परम्परा से ही जुड़ती हैं। इसलिये कुछ लोग जो तिब्बती भोट-बौद्धधर्म में लामावाद आदि दोषों को देखने का प्रयास करते हैं, उन्हें अपने भोट-इतिहास से सम्बद्ध सामान्य ज्ञान को दुरुस्त करने का प्रयास करना चाहिये।  

च़ङ्-ञोन् हेरुक द्वारा लिखित मरपा की इस जीवनी के अनुसार भट्टारक मरपा चार (4) बार नेपाल तथा तीन (3) बार भारत आये। इन यात्राओं में उन्होंने अपने अध्ययन को आगे बढाया तथा उसे गम्भीर अध्ययन में परिवर्तित किया। यही नहीं नेपाल और भारत में अध्ययन के बाद आपने गुह्यवज्रयान में अधिकार को प्राप्त कर लिया। इन यात्राओं में भट्टारक मरपा ने जिन विशिष्ट ग्रन्थों का अध्ययन किया उनका विवरण यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा हैᅳ

मरपा लोच़ावा छोस्-की लो-डोस् ने तीन बार भारत की शैक्षणिक यात्रा की और तन्त्र के गम्भीर ग्रन्थों का अध्ययन ही नहीं किया, अपितु उनका अभ्यास कर अभिसमय (ज्ञान) की भी प्राप्ति की। भारत के तत्कालीन महान् गुरुओं के सान्निध्य में रहकर श्रवण-चिन्तन और मनन परम्परा में पारंगत हुये तथा साथ ही तन्त्र के उत्पन्नक्रम तथा सम्पन्नक्रम की भावना में भी पारंगतता को हासिल की।  

भारत यात्रा के बीज का प्रकाशन उनके मन में मुख्य रूप से भोट गुरु, जो स्वयं अनुवादक ही थे, ने डाला जिनका नाम डोग्-मी लोच़ावा शाक्य येशे (992-1074) कहा गया है। भट्टारक मरपा उनके सान्निध्य में तीन (3) साल तक रहे थे और भारतीय भाषा (मुख्य रूप से संस्कृत) से सम्बन्धित अनुवाद को सीखा था।

तन्त्र के गम्भीर ग्रन्थों को भी भट्टारक मरपा अपने अनुवादक गुरु से सीखना चाहते थे, लेकिन पूर्वकर्मों के संस्कारवश यह उनके भाग्य में नहीं लिखा था। तब गुरु को शुभ विदाई देकर भट्टारक मरपा, आर्यदेश भारत आने की तैयारी में जुट गये तथा अन्त में ञोस् लोच़ावा के साथ बाह्यतः गुरु और सेवक के रूप में भारत के लिये प्रस्थान किये।

प्रथम बार के भारत आगमन पर नेपाल में अध्ययन किये ग्रन्थों का विवरण :

भारत में क्योंकि काफी अधिक गर्मी पड़ती है, इसका विपरीत असर न पड़े, वे लगभग दो वर्ष पर्यन्त नेपाल, काठमाण्डु में ही बिताये। यहाँ पर उन्हें संयोगवश दो नेपाली गुरु मिले, जिनका नाम 1. चिथेरवा तथा 2. पेन्तावा कहा गया है।  

इन दो वर्षों में वे गुरु जो अपने नेपाली शिष्यों को पढाते थे, उनमें भट्टारक मरपा सम्मिलित हुए और जो अध्यापन इन गुरुओं ने इस प्रवास के दौरान किया, उन ग्रन्थों का नामᅳगुह्यसमाज, श्रीचतुष्पीठ और संक्रमणोपदेश कहा गया है। क्योंकि ये दोनों गुरु भी भारतीय आचार्य नरोपा के ही शिष्य थे, अतः इन दो गुरुओं ने भट्टारक मरपा को पत्र सहित सही समय आने पर भारत में नरोपा के पास भेजा।

प्रथम बार के भारत आगमन पर भट्टारक मरपा द्वारा अध्ययन किये ग्रन्थों का विवरण :

सिद्ध नरोपा से मिलने के बाद सर्वप्रथम गुरु ने उन्हें श्रीहेवज्र-तन्त्र का अध्यापन कराया, जो नरोपा का प्रमुख साधना-ग्रन्थ हुआ करता था। तत्पश्चात् नरोपा ने ही मरपा को वज्रपञ्जर तथा सम्पुट का भी अध्यापन कराया।

इसके पश्चात् जब मरपा ने श्रीगुह्यसमाज को अनुवादक ञोस् की प्रेरणा से पुनः पढ़ने का निश्चय किया तो इस विशेष ग्रन्थ के पढने के लिये शिष्य मरपा को इन्होंने आचार्य ज्ञानगर्भ के पास भेजा। आचार्य ज्ञानगर्भ ने इन्हें सम्पूर्ण गुह्यसमाज को बहुत अच्छी तरह पढाया और मरपा तब इस विषय में अनुवादक ञोस् से भी आगे बढ़ गये।

नरोपा की ही प्रेरणा से मरपा आचार्य शान्तभद्र अथवा कुकुरिपा के पास चले आये और उनसे महामाया का भी अध्ययन किया। इसके साथ ही कुकुरिपा ने मरपा को महामूकता तथा लघुमूकता आदि विशेष साधनाओं का भी अभ्यास कराया। बाद में नरोपा से भी एक बार महामाया का अध्ययन करने की बात ठग्-थुङ् ग्यल्-पो रचित जीवनी में कही गई है।  

आचार्य शान्तभद्र तथा भट्टारक नरोपा के अध्यापन में अर्थ की दृष्टि से बहुत बड़ा अन्तर नहीं होने पर भी नरोपा के अध्ययन में शब्दों का विस्तार अधिक था। तब मर्-पा ने नरोपा से कहा कि ʽआप इतने पारंगत होते हुए भी महामाया के लिये उस (सुदूर) समुद्री द्वीप में भेजकर इतना कष्ट क्यों दिया?ʼ तब नरोपा का कहना थाᅳʽवे मातृतन्त्र के अधिपति हैं। अतः उपदेश में नियत-बुद्धि तथा स्रोत की प्रामाणिकता के लिये भेजा था।ʼ[4]

तत्पश्चात् मरपा दक्षिण से वापस लौटे और इसके बाद नरोपा ने गुरु मरपा को मैत्रीपा के दर्शन की अनुमति दी। आचार्य मैत्रीपा ने सर्वप्रथम इन्हें महामुद्रा का उपदेश दिया। इसके बाद आर्यमञ्जुश्री-नाम-संगीति का भी अध्यापन किया। सम्पूर्ण बौद्ध शास्त्रों में यही एक ऐसा ग्रन्थ है, जिसके पाठ मात्र से पुद्गल अन्तिम अवस्था अर्थात् बोधि को प्राप्त कर सकता है।

कहा जाता है कि तिब्बत के 11वीं शती के ही बहुत बड़े अनुवादक लोच़ावा रिन्छेन ज़ङपो (958-1055 ई.) ने इस नामसंगीति का भोटी और संस्कृत दोनों में एक-एक लाख बार पाठ किया था। इस अवसर पर मैत्रीपा ने स्वयं के द्वारा रचित द्वादशो-पदेश-वज्रगीत का भी मरपा को अध्ययन कराया।

इसी क्रम में ज्ञानड़ाकिनी से चतुष्पीठ को पढने की बात भी इस मरपा-वृत्तान्त में स्पष्ट हुआ है और मरपा स्वयं के द्वारा गाये गये

एक गीति में एक रात स्वप्न में सिद्ध सरहपाद से अमनस्कार[5]

भावना को श्रवण करने की बात भी कही है।  

बाद में नरोपा ने मरपा को अपने छह धर्मों (नरोपा का षड्योग)[6] का भी अध्यापन तथा अभ्यास कराया। इस अवसर पर भट्टारक मरपा ने प्रकृति स्वरूप सहज ज्ञान-मुद्रा से भी परिचय प्राप्त किया तथा चण्डाली भावना में विशेष रूप से अधिकार प्राप्त किया।

द्वितीय बार के भारत आगमन पर भट्टारक मरपा द्वारा अध्ययन किये ग्रन्थों का विवरण :

भट्टारक मरपा सदा ज्ञान के प्रति समर्पित थे, अतः उन्होंने दूसरी बार भी भारत की शैक्षणिक यात्रा की। इस द्वितीय बार की भारत प्रवास के दौरान सर्वप्रथम नरोपा से हेवज्र का अभिषेक प्राप्त किया। तत्पश्चात् नरोपा ने मरपा को हेवज्रमूलतन्त्र, डाकिनी-वज्रपञ्जरतन्त्र, व्याख्यातन्त्र तथा सम्पुटतन्त्र का अध्यापन किया। बाद में पुनः नरोपा द्वारा इन्द्रभूति की परम्परा का चक्र-संवर, सरह की परम्परा का बुद्धकपाल-तन्त्र-व्याख्या-विधि, कागज़-पिण्डोपदेश, गुह्यसमाज-अद्वय-समता-विजय तथा प्रदीपो-द्योतन-नाम-टीका नामक ग्रन्थों को पढ़ाने का भी वर्णन हुआ है।

इस द्वितीय बार की यात्रा में मरपा ने मैत्रीपा से गुह्यसमाज-अभिषेक, गुह्यसमाज-टीका, महामुद्राबिन्दुतन्त्र, मूलततन्त्र हेवज्रतन्त्र, विशिष्ट व्याख्यातन्त्र, डाकिनी वज्रगीत, सामान्य व्याख्यातन्त्र सम्पुट की टीका आदि का भी अध्ययन किया। इस यात्रा के दौरान मरपा ने विस्तृत, मध्य तथा लघु हेवज्र के अभिषेकों को भी प्राप्त किया।

भट्टारक मरपा की शैक्षणिक यात्रा यहीं नहीं रुकी। आपने तीसरी बार भी आर्यदेश भारत की यात्रा की, क्योंकि उन्होंने अपने गुरु भट्टारक नरोपा के सम्मुख पूर्व में पुनः भारत आकर एक बार मिलने के लिये प्रतिज्ञा की थी। इस यात्रा के लिये माँ दग्-मेद्-मा एवं शिष्यों ने काफी बाधा उपस्थित की। उन लोगों का यह कहना था कि ‘अब आप वृद्ध हो चुके हैं और भारत जाना इस अवस्था में खतरे से खाली नहीं है।’ लेकिन एक सच्चे शिष्य को अपनी प्रतिज्ञा तोड़ना अत्यन्त स्वीकार नहीं था। अतः वे तीसरी बार की यात्रा के लिये भोट से भारत के लिये निकल पड़े।

उनके इस यात्रा के दौरान आचार्य दीपङ्करश्रीज्ञान भोटदेश पधार रहे थे, अतः ऊपरी ञङ् के शेङ्स लङ्-पो-ना में उनसे मुलाकात भी हुई। आचार्य अतीश से ही उनको भट्टारक नरोपा के विशेष चर्या में जाने की बात मालूम हुई और इसी कारण भट्टारक मरपा से मिलने में कठिनाई को जानते हुए उन्होंने भट्टारक मरपा को अपने अनुवादक के रूप में भोट वापस चलने के लिये कहा। क्योंकि भट्टारक मरपा ने अपने गुरु के सम्मुख एक बार पुनः दर्शन करने की प्रतिज्ञा की थी, इसी प्रतिज्ञा के स्मरण के कारण उन्होंने अनुवादक के रूप में आने में असमर्थता व्यक्त की और अपनी तीसरी बार की भारत यात्रा को जारी रखा।

भारत पहुँचने के बाद भट्टारक मरपा ने गुरु के दर्शन के लिये अपना प्रयास जारी रखा और इस दौरान उन्होंने विशेष गणचक्र-पूजाओं सहित गुरु-अध्येषणा-अभ्यास के साथ गुरु के अन्वेषण में लगे रहे। इस दौरान उन्हें जो आभास प्रकट हुये वे सभी मार्ग की उच्च अवस्था प्राप्त को ही सम्भव होते हैं और हर विशेष अध्येषणा के बाद उनके अभिसमय में विशेष बढ़ोत्तरी भी होती रही और अन्त में आठ (8) महीने बाद गुरु ने उनको कृपापूर्वक अपना दर्शन दिया। इसी दौरान विशेष वार्ता में भट्टारक नरोपा द्वारा भट्टारक मि-ला रस्-पा के प्रति अपना विशेष नमन करने की बात का ज़िक्र भी इस प्रसंग में हुआ है।

तत्पश्चात् भट्टारक नरोपा ने भट्टारक मरपा को पूर्व में किसी में भी अप्रचलित विशेषता वाले संवर-डाकिनी-कर्णतन्त्र का उपदेश किया। इस तृतीय बार के उपदेश का ज़िक्र इसी ग्रन्थ में निम्न प्रकार से उक्त है, यथाᅳ

ʽʽद्वाषष्टि संवर,[7] त्रयोदशी, पञ्चमी-देव तथा सहज आदि का अभिषेक धूलि-वर्ण-मण्डल के माध्यम से प्रदान किया। गुरु के काय-वाक्-चित्त-मण्डल के आश्रय से संकेत-अभिषेक और उपदेशों को पूर्णतया प्रदान कर नरोपा ने कहाᅳ‛इन विशिष्ट उपदेशों को देखते हो तो तुम्हें जो पूर्व में उपदेश दिए गए थे, वह सब बाहरी छिलके के समान हैं।[8] सारों का सार रूपी यह श्रेष्ठ उपदेश तेरह (13) सन्ततियों तक एक परम्परा हेतु ही अनुमति प्राप्त है। तुम इसे थोस्-पा-गाह् नामक उस विनेयजन को दे देना। इससे कर्म का विस्तार होगा। क्या यह पूर्व से भिन्न है या नहीं?ʼʼ

इस तीसरी बार की यात्रा के दौरान नरोपा के द्वारा धर्म के कई मर्म भट्टारक मरपा से कहे गये तथा षड्-धर्म का मर्म (नामक) वज्रगीत एवं भविष्यवाणी गीत आदि का भी भट्टारक नरोपा ने भट्टारक मरपा के सम्मुख वर्णन किया है, वे वास्तव में ही अपूर्व हैं। इसके बाद अनुवादक मरपा, नेपाल होते हुये तिब्बत सकुशल लौटे और मार्ग में भी कई वज्रगीत अपने समान परम्परा वालों के लिये गाये जो एक सम्यक् वज्रयानी गुरु के लक्षण को दर्शाते हैं।  

।। भवतु सर्वमङ्गलम् ।।


[1]. इस हिन्दी भूमिका में प्रमुख रूप से भट्टारक मरपा ने किन-किन गुरुओं के सान्निध्य में रहकर किन-किन विशिष्ट तान्त्रिक ग्रन्थों का अध्ययन किया था, यहाँ इस पर विशेष रूप से प्रकाश डालने का प्रयास किया जा रहा है। यान की दृष्टि से वज्रयान अन्तिम यान है, अतः मरपा द्वारा अध्ययन किये ग्रन्थों से तन्त्रग्रन्थों के अध्ययन-क्रम सहित तत्कालीन अध्ययन-परम्परा का भी हम लोग अनुमान लगा सकते हैं।  

[2]. भोटदेश के अधिकतर इतिहासकार मरपा लोच़ावा की आयु उपर्युक्त तिथि को ही मानते हैं। लेकिन ठग्-थुङ् ग्यल्-पो द्वारा रचित इस हिन्दी अनूदित जीवनी (मर्-पा लो-च़ई नम्-थर, थोङ्-वा दोन्-योद्) में 1005-1093 ई. कहा गया है, जो शोध का विषय है।

[3]. ʽʽइस प्रकार उपाध्याय शान्तरक्षित, आचार्य पद्मसम्भव और सम्राट ठि-स्रोङ् दे-च़न की परिणामना फलित हुई तथा वे सभी एक मंच पर एक ही कार्य हेतु उपस्थित हुए। सद्धर्म की दीर्घ-स्थिति के लिए प्रारूप तैयार किया गया। इसके परिणामस्वरूप सम्-यस् विहार की स्थापना की गई जो भारत के औदन्तपुरी विहार का ही दूसरा रूप था। भूमि-परीक्षण आदि कार्य उपाध्याय ने किया तथा तत्सम्बन्धित भूमि-विधि आदि को आचार्य पद्मसम्भव ने पूर्ण किया। इसकी आधारशिला मे-मो-योस् वर्ष में प्रारम्भ की गई तथा यह 13 वर्ष बाद स-मो-योस् वर्ष में बनकर तैयार हुआ।ʼʼᅳपद्ममाकरपो-विरचिता पूर्वयोग-टिप्पणी (भूमिका), पृ. 55

[4]. पद्माकरपो-विरचिता पूर्वयोग-टिप्पणी, भूमिका, पृ. 77. प्रकाशकᅳ केन्द्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा-संस्थान, सारनाथ, वाराणसी (1996 ई.)  

[5]. अमनस्कार का अर्थ मनस्करण नहीं करना भी है और साथ ही का अर्थ शून्यता करने पर शून्यता का मनस्करण करना भी होता है। यह दोनों ही अर्थ वास्तविक भावना के समय विरुद्ध नहीं हैं। लेकिन कुछ भोट विद्वानों ने अमनस्कार-भावना का खण्डन भी किया है। खण्डन का मुख्य कारण अमनस्कार को उच्छेदान्त के रूप में मानना है, जो कि सही नहीं है। इस खण्डन-मण्डन के लिये द्वग्सपो टशी नम्-ग्यल् द्वारा रचित छग्-छेन् दावाई होद्-ज़ेर का अवलोकन कर सकते हैं। यह महामुद्राग्रन्थ अंग्रेजी में भी अनूदित है, जो महामुद्रा नाम से ही प्रकाशित है।   

[6]. नरोपा का षड्योगᅳ1. चण्डाली, 2. मायाकाय, 3. स्वप्न, 4. प्रभास्वर, 5. संक्रान्ति तथा 6. अन्तराभव।

[7].     दो प्रधान युगनद्ध, चार हृदय-योगिनी, चार द्वारपालिका, चार सीमन्तिनी, चौबीस वीर एवं चौबीस वीरनी (-वीरेश्वरी)ᅳ६२ संवर।

[8].     न किञ्चिदस्तीक्षुत्वचा हि सारः।।

प्रियो रसोऽभ्यन्तर एव तिष्ठेत् त्वचं विमुज्येक्षुरसो नरेण।

न शक्यते स्वादयितुं हि लब्ध्वा।

अतीशविरचिताश्चर्यागीत्याद्यष्टग्रन्थाः (शोधप्रबन्ध), पृ०ᅳ१८०



Comments

2 responses to “Marpa, the founder of Kagyudpa”

  1. RAMESH CHANDRA NEGI MATHAS Avatar
    RAMESH CHANDRA NEGI MATHAS

    MARPA THE GREAT TRANSLATOR OF TIBET WAS A TREASOURE OF WISDOM.

  2. Bhante Chandrakant Avatar
    Bhante Chandrakant

    भोटदेशीय महान् अनुवादक के बारे मे अच्छी जानकारी दी गई है। बहुत बहुत धन्यावाद 🙏🙏🙏🌹🌹🌹💙💙💙💙🎄🎄🎄💖💖💖

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