Relevance of Buddhist Philosophy

बौद्ध दर्शन की प्रासंगिकता

डा. रमेशचन्द्र नेगी (सहा. प्रोफेसर)

केन्द्रीय तिब्बती अध्ययन विश्वविद्यालय सारनाथ, वाराणसी

यह संसार संक्षेप में भाजन एवं सत्त्व-लोक, इन दो लोकों में विभाजित है। इसे हम सामान्य भाषा में जड़ एवं चेतन अथवा भौतिक जगत् तथा प्राणी जगत् के नाम से भी जानते हैं।  

भौतिक जगत् की व्याख्या बाह्य जगत् के रूप में होती है तथा सत्त्व जगत् की व्याख्या आन्तरिक जगत् के रूप में। आज का विज्ञान अधिकतर बाह्य पदार्थों की ही व्याख्या करता है। उन्हीं पर अनुसन्धान तथा अन्वेषण आदि करना, इन वैज्ञानिकों के प्रमुख कार्य हैं।

किन्तु यदि हम इस संसार के उपर्युक्त दोनों प्रकार के जगत् को सही रूप से समझना चाहते हैं, तब निश्चित रूप से सत्त्व अर्थात् प्राणी जगत् को भी अनिवार्य रूप से महत्त्व देना ही पड़ेगा, क्योंकि यदि विश्व में वास्तविक सुख एवं शान्ति को स्थापित करना चाहते हैं, तब बाह्य जगत् से आन्तरिक जगत् अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

कारण यह है कि शान्ति अथवा सुख-दुःख आदि आन्तरिक चित्त के ही गुण हैं, न कि बाह्य जगत् के। एक चेतन है और दूसरा जड़। इसीलिए विश्व में आज तक अध्यात्म के क्षेत्र में जो भी लोग उतरे, उन्होंने इस आन्तरिक चित्त को ही अत्यन्त महत्त्व दिया और अपना सम्पूर्ण परिश्रम इसी को समझने और समझाने में लगाया। इसीलिए आचार्य शान्तिदेव (7वीं शती)का कहना है–

इमं परिकरं सर्वं प्रज्ञार्थं हि मुनिर्जगौ ।

तस्मादुत्पादयेत् प्रज्ञां दुःखनिवृत्तिकाङ्क्षया ।।[1]

अर्थात् इन सब सामग्रियों (अर्थात् दानादि पारमिताओं) को मुनि (बुद्ध) ने प्रज्ञा (बोधि) के लिए ही कहा है। अतः दुःख की निवृत्ति की आकांक्षा से प्रज्ञा को उत्पन्न करना चाहिए।

संसार में नाना प्रकार के मत-मतान्तर सदा से रहे हैं। क्योंकि विकल्पों की संख्या अनन्त है, अतः विश्व में मत-मतान्तरों की संख्या अनन्त हो सकती है। इसीलिए जब तथागत सम्यक् सम्बुद्ध जम्बूद्वीप में उत्पन्न हुए, तब भी नाना प्रकार के सिद्धान्त यहाँ प्रचलित थे, आज भी हैं और भविष्य में भी रहेंगे।

दीघनिकाय के प्रथम सुत्त ब्रह्मजालसुत्त में 62 प्रकार की मिथ्या दृष्टियों का वर्णन मिलता है।[2] यदि इन मिथ्या दृष्टियों को संक्षिप्त करें, तब ये सब दृष्टियाँ ईश्वरवाद, कर्मवाद और भौतिकवाद अर्थात् चार्वाक का मत, इन तीनों में समाहित हो जाती हैं।

आज भी, विश्व में जितने भी धर्मानुसरण करने वाले विभिन्न सम्प्रदाय बने हैं, इन सभी में कुछ न कुछ अलग-अलग मत हमें प्राप्त होते ही हैं। यदि हम वैज्ञानिक स्तर पर इन सिद्धान्तों की जाँच करते हैं, तब विश्व के इन नाना प्रकार के सिद्धान्तों में कितने ही ऐसे सिद्धान्त मिलेंगे जो सही नहीं हैं, मिथ्या हैं और प्रत्यक्ष या गौण रूप से वे मत जगत् में अशान्ति को पैदा कर रहे हैं। समस्त जगत् के सुख और दुःख इन मिथ्यादृष्टियों के कारण ही हैं। अज्ञान, विकल्प अथवा मिथ्यादृष्टि इस दुःखापूर्ण (दुःख से पूरी तरह भरे) संसार के मूल हेतु हैं–ऐसा तथागत सम्यक् सम्बुद्ध का कहना है। 

किन्तु इस वास्तविकता को समझें कैसे?सही बात को समझने के लिए जाँच की पद्धति क्या हो?कौन से ऐसे प्रमाण अथवा परिमाण हैं, जिनके सहारे हम विश्व के अनसुलझे पहलुओं से वास्तविक रूप से अवगत हो सकते हैं?सार रूप में अज्ञान को अज्ञान रूप में जानने की वास्तविक पद्धति क्या हो?उपाय तथा मार्ग क्या हो?

बौद्धधर्म, सम्यक् धर्म अथवा सद्धर्म के विकास के लिए, उपाय रूपी यह दुःखनिरोधगामिनी प्रतिपदा आर्यसत्य रूपी मार्ग–एक प्रमुख पहलू है। इसमें दृष्टि (दर्शन) का स्थान प्रमुख है और दृष्टि के भ्रमित होने पर सम्पूर्ण मार्ग से ही दिग्भ्रमित होने का डर सदा बना रहता है।

अतः आचार्य नरोपा (1066-1100 ई0) का कहना है कि दर्शन की शुद्धि होने पर भावना की शुद्धि होती है तथा भावना की शुद्धि होने पर चर्या की शुद्धि। अतएव अष्टांगिक मार्ग के प्रतिपादन में भगवान् ने सम्यक् दृष्टि को प्रथम अंग के रूप में स्वीकार किया है तथा सम्यक् दृष्टि और सम्यक् संकल्प को प्रज्ञा का ही रूप माना है। यथा तथागत सम्यक् सम्बुद्ध ने कहा है–

यो चायं कामेसु कामसुखल्लिकानुयोगो हीनो गम्मो पोथुज्जनिको अनिरयो अनत्थसंहितो, यो चायं अत्तकिलमथानुयोगो दुक्खो अनरियो अनत्थसंहितो एते ते उभो अन्ते अनुपगम्म मज्झिमा पटिपदा तथागतेन अभिसंबुद्धा चक्खुकरणी ञाणकरणी उपसमाय अभिञ्ञाय सम्बोधाय निब्बानाय संवत्तति। अयमेव अरियो अट्ठंगिको मग्गो दुक्खनिरोधगामिनी पटिपदा सेय्यथीदं–1. सम्मादिट्ठि, 2. सम्मासंकप्पो, 3. सम्मावाचा, 4. सम्माकम्मन्तो, 5. सम्माआजीवो, 6. सम्मावायामो, 7. सम्मासति, 8. सम्ममासमाधि।[3]    

आज विश्व में जितने भी धर्म सम्प्रदाय हैं, उन सबका कहना है कि वे सब प्राणियों के सुख के लिए ही कार्य कर रहे हैं। सबकी अपनी-अपनी अलग शास्ता है तथा वे उनके बताये अनुसार चलने की कोशिश भी करते हैं। किन्तु इन सब में बुद्ध अप्रतिम हैं, यह प्रत्यक्ष ही है।

तत्कालीन भारत में जो कुरीतियाँ थी तथा धर्म के नाम पर जो हिंसा की जा रही थी, इनके निवारण के लिए बुद्ध के समान ही एक महान् पुरुष की अनिवार्यता उस समय अपेक्षित थी। अतः सौभाग्य से ई0 पू0 563 में शाक्य-मुनि बुद्ध ने जन्म लिया। यह जन्म विश्वकल्याण के लिए ही था। इसीलिए धम्मपद में कहा है–

सुखो बुद्धानां उत्पादः सुखा सद्धर्मदेशना ।

सुखा संघस्य सामग्री समग्राणां तपः सुखम् ।।[4]

बुद्धों का जन्म सुखदायक है, सद्धर्म की देशना सुखदायक है, संघ की एकता सुखदायक है और सुखकर है मिलकर तप करना।  

कुमार सिद्धार्थ ने अपने 29वें वर्ष में वैराग्य-भाव से गृहत्याग किया तथा छह वर्षों तक कठिन तपस्या की। उन्होंने तत्कालीन ज्ञान की जितनी परम्पराएँ थी, उन सबका अवलोकन किया तथा प्रयोग करने के बाद जब उन मार्गों से सन्तुष्ट नहीं हुए, तब उन्होंने एक विशेष साधना का अभ्यास किया तथा उसी के बल पर उन्होंने अपने 35वें वर्ष में बोधगया में बोधिवृक्ष के नीचे वैशाख पूर्णिमा को रात्रि के अन्तिम याम में बुद्धत्व प्राप्त किया।

उन्होंने वज्रोपम समाधि के द्वारा सम्पूर्ण विश्व की वास्तविकता का साक्षात्कार किया। प्रतीत्यसमुत्पाद को अनुलोम तथा प्रतिलोम रूप से सम्यक् अवगम कर जीवन के आवागमन को सम्पूर्ण रूप से समझा और स्वयं बोधि को प्राप्त हुए। तब वे बुद्ध बन गये। बुद्ध बनने के बाद का उनका प्रथम उद्बोधन सभी साधकों को सदा प्रेरणा देता रहा है, यथा–

अनेकजातिसंसारं सन्धाविस्सं अनिब्बिसं।

गहकारकं गवेसन्तो दुक्खा जाति पुनप्पुनं।।[5]

अर्थात् गृहकारक को ढूंढते हुए मैं अनेक जन्मों तक निरन्तर संसार में दौड़ता रहा। बारम्बार जन्म लेना दुःख है।

गहकारक! दिट्ठोसि पुन गेहं न काहसि।

सब्बा ते फासुका भग्गा गहकूटं विसङ्खितं।

विसङ्खारगतं चित्तं तण्हानं खयमज्झगा।।[6]

गृहकारक! तू दिखाई दे गया। अब दुबारा घर नहीं बना सकेगा। तेरी सब कड़ियाँ टूट गई। घर का शिखर बिखर गया। चित्त संस्कार-रहित हो गया। तृष्णाओं का क्षय हो गया। 

यह प्रतीत्यसमुत्पाद अर्थात् कर्मफल का सम्यक् प्रतिपादन ही, बुद्ध की वास्तविक विशिष्टता है। प्रासंगिकता इसी विशिष्ट पद्धति में है तथा बौद्ध दर्शन की प्रासंगिकता इसी विशेष प्रसंग में सन्निहित होती है। इस विशिष्ट पद्धति के कारण ही तथागत सम्यक् सम्बुद्ध द्वारा उपदेशित धर्म विश्व में एक अलग पहचान रखता है तथा यह बौद्धधर्म, बोधिधर्म अथवा सद्धर्म के नाम से विश्वविख्यात् है। इसीलिए जब अश्वजित से सारिपुत्र ने बुद्ध के मत का सार-

संक्षेप बताने के लिए कहा, तब उन्होंने इसी प्रतीत्यसमुत्पाद को विशिष्ट माना तथा इस प्रतीत्यसमुत्पाद-मन्त्र को उन्हें सार रूप में कहा, यथा–

ये धर्मा हेतुप्रभवा हेतुं तेषां तथागतो ह्यवदत्।

तेषां च यो निरोधः एवंवादी महाश्रमणः।।[7]

ज्ञान की प्राप्ति सम्यक् दृष्टि पर निर्भर है और यह प्रमाण की पद्धति से उत्तरोत्तर आगे बढ़ती है। चाहे बाह्य जगत् के विकास की बात हो अथवा आन्तरिक जगत् का विकास की, दोनों के लिए प्रमाण द्वारा परीक्षा अनिवार्य हो जाती है। इसीलिए तथागत सम्यक् सम्बुद्ध का कहना है–

तापाच्छेदाच्च निकषात् सुवर्णमिव पण्डितः।

परीक्ष्य भिक्षवो ग्राह्यं मद्वचो न तु गौरवात्।।[8]

जिस प्रकार शुद्ध सुवर्ण की पहचान के लिए उसे 1. जलाया जाता है, 2. काटा जाता है तथा 3. रगड़ा जाता है, ऐसे ही बुद्ध ने अपने द्वारा बताई गयी बातों को भी परीक्षा कर ही स्वीकार करने की बात कही है।

भगवान् की यह एक ऐसी उद्घोषणा है, जिसे मानव समाज की उन्नति का बहूमूल्य सूत्र कहा जा सकता है। संसार के किसी भी शास्ता ने इतनी बड़ी उद्घोषणा नहीं की है।  

परीक्षा अर्थात् जाँच-पड़ताल की क्रिया ही हमें अज्ञान रूपी अन्धकार से बाहर निकाल सकती है। और इसी प्रक्रिया के द्वारा प्रतीत्यसमुत्पाद के सही अर्थ को हम समझ सकते हैं। तथागत सम्यक् सम्बुद्ध तो समस्त अज्ञानी प्राणियों को इस दुःख रूपी संसार से तारने वाले हैं, तारक हैं, तायी हैं, शरणदाता हैं, नाथ हैं।

अतः वे कभी भी अन्धानुकरण के पक्षपाती नहीं हो सकते, अन्ध श्रद्धा के पक्षपाती नहीं हो सकते। विश्व का कल्याण धर्मों के सम्यक् प्रकाशन में छिपा है तथा सम्यक् प्रकाशन वास्तविक परीक्षा के द्वारा प्रतीत्यसमुत्पाद को समझने में है। यह शाश्वतवाद तथा उच्छेदवाद का अन्त है, जो केवल बुद्ध के उपदेश में ही परिलक्षित होता है। अतः बौद्धधर्म की प्रासंगिकता विश्व कल्याण हेतु अपनी प्रामाणिकता के कारण तीनों कालों में एक समान है।

और विशेष रूप से वर्तमान वैश्विक अशान्ति के दौर में यह आवश्यक ही नहीं, अपितु अनिवार्य जान पड़ता है।

यत्किञ्चिद् जगतो दुःखं तत् सर्वं मयि पच्यताम् ।

बोधिसत्त्वशुभैः सर्वैर्जगत् सुखितमस्तु च ।।

जगद्दुःखैकभैषज्यं सर्वसम्पत्सुखाकरम् ।

लाभसत्कारसहितं चिरं तिष्ठतु शासनम् ।।

मञ्जुघोषं नमस्यामि यत्प्रसादान्मतिः शुभे ।

कल्याणमित्रं वन्देऽहं यत्प्रसादाच्च वर्धते ।।[9]

।।भवतु सर्वमङ्गलम् ।।


[1].   बोधिचर्यावतार, 9.1

[2].   The All-Embracing Net of Views p. 65, Pub. by Buddhist Publication Society Kandy, Sri Lanka (1978)

[3].   सच्चसंगहो पृ0–35, संयुत्त निकाय का उद्धरण। प्रका0–बौद्ध भारती वाराणसी, सन् 1991 

[4].   धम्मपद, 14.16 

[5].   धम्मपद, 11.8 

[6].   धम्मपद, 11.9 

[7].   यह प्रतीत्यसमुत्पाद-मन्त्र विश्व में सबसे अधिक लिखे जाने वाले मन्त्रों में एक है और यह थेरवाद से लेकर वज्रयान परम्परा में सर्वधिक प्रचलित मन्त्र है।   

[8].   ज्ञानसारसमुच्चय, 31 

[9].   बोधिचर्यावतार, 10.56-58

Comments

4 responses to “Relevance of Buddhist Philosophy”

  1. RAMESH CHANDRA NEGI MATHAS Avatar
    RAMESH CHANDRA NEGI MATHAS

    OM AH HUNG

  2. RAMESH CHANDRA NEGI MATHAS Avatar
    RAMESH CHANDRA NEGI MATHAS

    DHAMMA IS FOR PURIFY ONES MIND.

  3. RAMESH CHANDRA NEGI MATHAS Avatar
    RAMESH CHANDRA NEGI MATHAS

    BUDDHA NATURE IS ALWAYS THERE AND IT IS BOUND TO THE REALITY.

  4. Bhante Chandrakant Avatar
    Bhante Chandrakant

    बुद्ध का धर्म ही सद्धम्म। है। सारे प्राणियो के लिए बुद्ध महाकरुणा की बात करते है। अतः बुद्ध की प्रासंगिकता स्वयं सिद्ध है। भवतु सब्ब मंगलं। 🙏🙏🙏🌹🌹🌹💖💖💖🎄🎄🎄👍👍👍👌👌👌📝📝📝📚📚📚

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